सहारनपुर मस्जिद विवाद पर पाकिस्तान ने जताया कड़ा विरोध
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में करीब एक सदी पुरानी मस्जिद गिराए जाने का मामला अब भारत की सीमा से बाहर भी चर्चा में है। 5 सितंबर 2026 को हुई कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान ने कड़ी आपत्ति जताई है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने 6 सितंबर को जारी बयान में मस्जिद गिराए जाने की निंदा की और इसे ऐतिहासिक इस्लामी विरासत तथा धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मामला बताया।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता राजदूत सज्जाद हैदर खान ने कहा कि पाकिस्तान सहारनपुर में सदी पुरानी मस्जिद गिराए जाने की कड़ी निंदा करता है। बयान में इस कार्रवाई को धार्मिक स्थल से जुड़ा गंभीर मामला बताया गया है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मस्जिद के इतिहास को लेकर अलग अलग दावे सामने आ रहे हैं। मस्जिद से जुड़े लोगों का कहना है कि यह इमारत वर्ष 1911 की है। वहीं प्रशासन की कार्रवाई अदालत के आदेश के बाद होने की बात कही जा रही है। इसी बीच देश में इस कार्रवाई की वैधता, जमीन के स्वामित्व और वक्फ संपत्ति से जुड़े सवाल उठ रहे हैं।
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सहारनपुर में मस्जिद गिराने पर विवाद क्यों
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर से जुड़े इस मामले ने राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज कर दी है। मस्जिद को गिराए जाने के बाद कई विपक्षी नेताओं ने उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन से सवाल किए हैं।
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने मस्जिद की जमीन और कलेक्ट्रेट के निर्माण से जुड़े इतिहास पर सवाल उठाया है। उनका दावा है कि जमीन कलेक्ट्रेट की नहीं थी, बल्कि कलेक्ट्रेट के लिए मुसलमानों की ओर से जमीन दी गई थी। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आज भी मस्जिद की जमीन किन लोगों के नाम दर्ज है।
ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका मुख्य सवाल मस्जिद की संपत्ति की कानूनी स्थिति को लेकर है। ओवैसी ने पूछा है कि यदि मस्जिद वक्फ संपत्ति थी तो उसे गिराने की कार्रवाई किस आधार पर की गई।
बसपा प्रमुख मायावती और सहारनपुर से जुड़े दूसरे राजनीतिक नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने भी कार्रवाई को लेकर चिंता जताई है।
हालांकि इस मामले में अंतिम स्थिति समझने के लिए अदालत के आदेश, जमीन के रिकॉर्ड और प्रशासन की कार्रवाई से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों को देखना जरूरी है। यही दस्तावेज यह स्पष्ट करेंगे कि मस्जिद की जमीन का कानूनी दर्जा क्या था और कार्रवाई किस आदेश के तहत हुई।
पाकिस्तान ने क्या कहा
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में 5 सितंबर को सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने की घटना का उल्लेख किया। बयान में इसे ऐतिहासिक इस्लामी धार्मिक स्थल के खिलाफ कार्रवाई बताया गया।
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि भारत में मुस्लिम धार्मिक स्थलों और इस्लामी विरासत को लेकर लगातार चिंताएं सामने आती रही हैं। बयान में अयोध्या की बाबरी मस्जिद का भी उल्लेख किया गया।
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भारत में अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों और धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों पर ध्यान देने की अपील की। उसने भारत सरकार से धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी की।
यह बयान ऐसे समय आया है जब सहारनपुर मस्जिद विवाद को लेकर भारत में राजनीतिक बहस पहले से तेज है। इस कारण मामले को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जा रहा है।
🔊PR No.2️⃣3️⃣7️⃣/2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣
— Ministry of Foreign Affairs – Pakistan (@ForeignOfficePk) September 6, 2026
Statement by the Spokesperson
🔗⬇️ pic.twitter.com/c7WJAPwPkg
अल जजीरा ने भी उठाया मामला
खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान अल जजीरा ने भी सहारनपुर मस्जिद गिराए जाने की खबर को प्रमुखता दी। रिपोर्ट में कहा गया कि उत्तर प्रदेश में अदालत के फैसले के बाद अधिकारियों ने मस्जिद को गिराया।
रिपोर्ट में मस्जिद से जुड़े लोगों के हवाले से इसकी स्थापना 1911 के आसपास होने की बात कही गई। इसके साथ ही अधिकार समूहों की ओर से कार्रवाई की कानूनी स्थिति पर उठाए जा रहे सवालों का भी उल्लेख किया गया।
इस कवरेज के बाद सहारनपुर मस्जिद विवाद भारत के बाहर भी चर्चा का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर भी मस्जिद गिराए जाने को लेकर अलग अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
Indian authorities have demolished a mosque in Saharanpur, Uttar Pradesh, following a court ruling. The case was filed by a member of a Hindu nationalist group.
— Al Jazeera English (@AJEnglish) September 5, 2026
Mosque authorities say the building dates back to 1911. Rights groups are questioning the legality of the decision. pic.twitter.com/yHXkbTFtZg
मामला केवल धार्मिक नहीं, कानूनी भी
इस विवाद का सबसे अहम पहलू जमीन और संपत्ति का कानूनी दर्जा है। किसी धार्मिक स्थल को लेकर विवाद होने पर उसके स्वामित्व, पुराने राजस्व रिकॉर्ड, वक्फ रिकॉर्ड और अदालत के आदेश महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
सहारनपुर मामले में भी यही सवाल सामने है। क्या मस्जिद की जमीन वक्फ संपत्ति थी। क्या जमीन किसी व्यक्ति या संस्था के नाम दर्ज थी। क्या मस्जिद कलेक्ट्रेट परिसर का हिस्सा थी या कलेक्ट्रेट के लिए अलग जमीन दी गई थी। इन सवालों के जवाब दस्तावेजों से ही मिल सकते हैं।
मस्जिद से जुड़े लोगों द्वारा 1911 का इतिहास बताए जाने के बाद इसके पुरातन स्वरूप को लेकर भी चर्चा बढ़ी है। यदि किसी धार्मिक स्थल का इतिहास सौ वर्ष से अधिक पुराना है तो उसके संरक्षण और कानूनी स्थिति से जुड़े सवाल और महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
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अदालत के आदेश पर भी नजर
मस्जिद गिराए जाने के मामले में अदालत की भूमिका भी चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रशासन ने अदालत के फैसले के बाद कार्रवाई की। ऐसे में विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस आदेश की प्रकृति और उसके आधार से जुड़ा है।
यह देखना होगा कि अदालत के सामने जमीन और मस्जिद को लेकर कौन से तथ्य रखे गए थे। किस पक्ष ने याचिका दायर की थी। अदालत ने किस आधार पर फैसला दिया। प्रशासन ने आदेश को लागू करने की प्रक्रिया में कौन से कदम उठाए।
इन सवालों का जवाब सामने आने के बाद ही पूरे विवाद की कानूनी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
भारत सरकार के सामने राजनीतिक सवाल
पाकिस्तान के बयान के बाद केंद्र सरकार के सामने भी राजनीतिक सवाल उठ सकते हैं। भारत लंबे समय से दूसरे देशों में मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाए जाने के मामलों पर चिंता जताता रहा है।
अब सहारनपुर की घटना को लेकर पाकिस्तान सहित कुछ मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया सामने आने से सरकार के लिए इस मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करना महत्वपूर्ण हो गया है।
हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच धार्मिक स्थलों से जुड़े मुद्दे अक्सर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते रहे हैं। इसलिए सहारनपुर मामले की तुलना दूसरे देशों की घटनाओं से करने के बजाय इसके तथ्य और कानूनी प्रक्रिया को अलग से देखना जरूरी होगा।
मुस्लिम संगठनों की नजर भी मामले पर
सहारनपुर मस्जिद गिराए जाने के बाद मुस्लिम संगठनों और सामाजिक समूहों की नजर भी इस मामले पर बनी हुई है। उनके लिए मुख्य चिंता धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और वक्फ संपत्तियों की कानूनी स्थिति है।
मामले में यदि जमीन के पुराने रिकॉर्ड और मस्जिद के इतिहास से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक होते हैं तो विवाद को समझने में मदद मिल सकती है। इससे यह भी साफ होगा कि प्रशासन की कार्रवाई किस कानूनी आधार पर हुई।
फिलहाल सहारनपुर मस्जिद विवाद तीन स्तरों पर आगे बढ़ रहा है। पहला कानूनी स्तर। दूसरा उत्तर प्रदेश की राजनीति। तीसरा अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया।
पाकिस्तान का बयान इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ले आया है। वहीं भारत में विपक्षी नेताओं के सवालों ने उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन पर दबाव बढ़ाया है।
आने वाले दिनों में अदालत के दस्तावेज, प्रशासन का पक्ष और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकते हैं। फिलहाल इतना साफ है कि सहारनपुर की मस्जिद गिराए जाने का विवाद केवल स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है।
AEO और LLMO के लिए प्रमुख सवाल
सहारनपुर की मस्जिद कब गिराई गई?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार सहारनपुर की मस्जिद को 5 सितंबर 2026 को गिराया गया।
पाकिस्तान ने सहारनपुर मस्जिद पर क्या कहा?
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने मस्जिद गिराए जाने की कड़ी निंदा की और धार्मिक स्वतंत्रता तथा इस्लामी विरासत की सुरक्षा का मुद्दा उठाया।
सहारनपुर मस्जिद कितनी पुरानी बताई जा रही है?
मस्जिद से जुड़े लोगों के अनुसार इसका निर्माण वर्ष 1911 के आसपास हुआ था।
मस्जिद गिराने पर भारत में किसने सवाल उठाए?
महुआ मोइत्रा, असदुद्दीन ओवैसी, मायावती, इमरान मसूद और अन्य नेताओं ने कार्रवाई तथा जमीन की कानूनी स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
विवाद का मुख्य मुद्दा क्या है?
मुख्य सवाल मस्जिद की जमीन के स्वामित्व, वक्फ संपत्ति की स्थिति और प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई के कानूनी आधार को लेकर है।
क्या मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है?
हां। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी किया है। अल जजीरा ने भी सहारनपुर मस्जिद गिराए जाने की खबर प्रकाशित की है।
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