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सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद मामला: 100 साल पुरानी मस्जिद गिराने पर यूपी में सियासी घमासान

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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली-लखनउ

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित कलेक्ट्रेट परिसर की पुरानी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। तड़के 5 बजे की गई इस प्रशासनिक कार्रवाई के बाद विपक्षी नेताओं और मुस्लिम संगठनों ने सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस मुद्दे ने पूरे राज्य में सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थलों और अतिक्रमण की कार्रवाइयों को लेकर एक नई बहस छिड़ दी है।

त्वरित सारांश और मुख्य तथ्य

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर स्थित एक ऐतिहासिक मस्जिद को जिला प्रशासन ने तड़के ध्वस्त कर दिया। प्रशासन का दावा है कि यह निर्माण सरकारी भूमि पर अवैध रूप से किया गया था। मुस्लिम पक्ष और मस्जिद कमेटी का तर्क है कि यह मस्जिद 1911 के पहले से मौजूद है और वक्फ बोर्ड में दर्ज है। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई प्रमुख नेताओं ने इस कार्रवाई पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद डिमोलिशन: पूरा मामला क्या है

सहारनपुर जिला कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को गिराने की तैयारी पहले से चल रही थी। 16 जुलाई को जिला प्रशासन ने इस निर्माण को आधिकारिक रूप से अवैध घोषित किया था। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने इस आदेश को 22 जुलाई 2026 को जिला अदालत में चुनौती दी।

जिला अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें और प्रस्तुत साक्ष्य सुने गए। सुनवाई के बाद अदालत ने माना कि यह निर्माण सरकारी जमीन पर हुआ है। अदालत के अनुसार इस मामले पर उपासना स्थल अधिनियम 1991 यानी प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है। अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने के तुरंत बाद प्रशासन ने तड़के 5 बजे भारी पुलिस बल की तैनाती के साथ मस्जिद को ध्वस्त कर दिया।

जब स्थानीय निवासी और नमाजी सुबह उठे तो मस्जिद पूरी तरह जमींदोज हो चुकी थी। इस घटना की खबर फैलते ही इलाके में तनाव और हलचल बढ़ गई। एहतियात के तौर पर पूरे क्षेत्र में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए।

मस्जिद का इतिहास और मुस्लिम पक्ष के दावे

मस्जिद कमेटी और स्थानीय मुस्लिम नेताओं का कहना है कि यह धार्मिक स्थल कलेक्ट्रेट बनने से भी पहले का है। उनका दावा है कि इस मस्जिद का अस्तित्व सन 1911 से है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कलेक्ट्रेट में काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों के लिए यह मस्जिद बनाई गई थी। उस समय कर्मचारियों को नमाज अदा करने के लिए दूर जाना पड़ता था।

मस्जिद कमेटी ने भूमि रिकॉर्ड का हवाला दिया है। उनका कहना है कि खसरा नंबर 539 में याकूब खान वहीद खान का नाम दर्ज है। इसी खसरा नंबर में कलेक्ट्रेट, मंदिर और मस्जिद सभी स्थित हैं। यह संपत्ति वक्फ बोर्ड में बाकायदा पंजीकृत है।

मुस्लिम समुदाय का तर्क है कि जब कोई धार्मिक स्थल 100 वर्षों से अधिक समय से सार्वजनिक रूप से उपयोग में हो, तो उस पर वक्फ बाय यूजर की श्रेणी लागू होती है। इसके अलावा लंबे समय से कब्जे के आधार पर कानूनी अधिकार भी बनते हैं। इस स्थिति में सरकार इसे अचानक अवैध घोषित करके बुलडोजर नहीं चला सकती है।

विपक्षी दलों और प्रमुख नेताओं की कड़ी प्रतिक्रियाएं

सहारनपुर में मस्जिद ढहाए जाने की घटना के बाद उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में बयानों की बाढ़ आ गई है। कई वरिष्ठ नेताओं ने सोशल मीडिया और प्रेस बयानों के जरिए सरकार की नीयत पर सवाल उठाए हैं।

मायावती (बसपा सुप्रिमो) का रुख

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि सहारनपुर जिला कलेक्ट्रेट मस्जिद सहित पूरे उत्तर प्रदेश में मस्जिदों को अवैध बताकर ध्वस्त करने का सरकारी अभियान सही नहीं है। सरकार को ऐसे नकारात्मक रवैये से बचना चाहिए और बातचीत से समाधान निकालना चाहिए।

मायावती ने याद दिलाया कि एक संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष सरकार का कर्तव्य सभी धर्मों के पूजा स्थलों का समान आदर और सुरक्षा करना है। उन्होंने कहा कि बिना नियम कानून का पालन किए किसी अभियुक्त का घर ढहाकर पूरे परिवार को बेघर कर देना भी गलत है। कानून द्वारा कानून का राज स्थापित होना चाहिए। उन्होंने अदालतों से भी इस ओर ध्यान देने की अपील की है।

असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम प्रमुख) के सवाल

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि सुबह 5 बजे मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। क्या मुसलमानों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार खत्म हो गया है। क्यों हमारे इबादतगाहों को बिना किसी ठोस आधार के बुलडोजर से तोड़ा जा रहा है।

ओवैसी ने कहा कि मस्जिद कमेटी ने 1911 के रिकॉर्ड पेश किए थे। वहां एक सदी से अधिक समय से नमाज पढ़ी जा रही थी। यह कानूनन वक्फ की श्रेणी में आता है। मस्जिद पहले बनी थी और कलेक्ट्रेट बाद में बना था। किसी की पसंद या नापसंद के आधार पर मस्जिद पर बुलडोजर नहीं चलाया जा सकता।

संजय सिंह (आम आदमी पार्टी) का आरोप

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भूमि रिकॉर्ड का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि खसरा नंबर 539 में मंदिर, मस्जिद और कलेक्ट्रेट तीनों दर्ज हैं। मस्जिद 1947 के पहले से बनी हुई है और वक्फ बोर्ड में दर्ज है।

संजय सिंह ने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्ड को पक्ष बनाए बिना एकतरफा फैसला सुनाकर मस्जिद गिरा दी गई। चुनाव से पहले नफरत फैलाने की राजनीति की जा रही है। उन्होंने जनता को राजनीतिक लाभ के लिए माहौल खराब करने वालों से सावधान रहने की सलाह दी।

सैयद आसिम वकार की प्रतिक्रिया

समाजवादी पार्टी से जुड़े नेता सैयद आसिम वकार ने स्थानीय प्रशासन की मंशा पर सवाल खड़े किए। उन्होंने सहारनपुर के जिलाधिकारी से सवाल किया कि क्या पूरे जिले में सिर्फ मस्जिदें ही सरकारी जमीन पर बनी हैं। क्या अन्य कोई धर्मस्थल सरकारी भूमि पर नहीं बना है।

उन्होंने कहा कि जिस संविधान की शपथ अधिकारियों ने ली है, वह आजादी से पहले बने हर धर्मस्थल के वजूद को सुरक्षा देने की बात करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास कार्यों के अभाव में धार्मिक मुद्दों का सहारा लिया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में धर्मस्थलों पर विवाद

सहारनपुर की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश के अलावा पड़ोसी राज्य हरियाणा में भी ऐसे ही मामले सामने आए हैं।

हरियाणा के गुरुग्राम जिले के सोहना इलाके में भी एक पुरानी मस्जिद को आपसी सहमति का हवाला देकर ढहा दिया गया था। इसी तरह फरीदाबाद में एक प्राचीन मस्जिद को देर रात ध्वस्त करने का आरोप लगा था।

स्थानीय नागरिक संगठनों का आरोप है कि सरकारी जमीनों, सड़कों और परिसरों पर कई अन्य धर्मस्थल भी बने हुए हैं। लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई का रुख चुनिंदा धार्मिक संरचनाओं की ओर ही दिखाई देता है। इससे विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ रही है।

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कानूनी और संवैधानिक पहलू क्या कहते हैं

इस पूरे विवाद में दो मुख्य कानूनी बिंदु सामने आ रहे हैं:

  1. उपासना स्थल अधिनियम 1991: यह कानून 15 अगस्त 1947 को मौजूद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने से रोकता है। हालांकि अदालतों ने सरकारी भूमि पर बने अवैध कब्जों के मामलों में इस कानून की सीमा तय की है।
  2. वक्फ अधिनियम और कब्जे का नियम: मुस्लिम पक्ष का मानना है कि लंबे समय से जारी उपयोग के कारण यह संपत्ति वक्फ के अंतर्गत आती है। किसी भी फैसले से पहले वक्फ ट्रिब्यूनल की सुनवाई आवश्यक होती है।

प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि वे केवल अदालत के आदेश का पालन कर रहे हैं। सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से बने ढांचों को हटाना कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मस्जिद कब तोड़ी गई?

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को जिला प्रशासन ने तड़के लगभग 5 बजे ध्वस्त किया।

2. प्रशासन ने मस्जिद गिराने का क्या कारण बताया?

प्रशासन का कहना है कि यह निर्माण सरकारी भूमि पर अवैध रूप से किया गया था और जिला अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया था।

3. मुस्लिम पक्ष का इस मस्जिद के इतिहास पर क्या दावा है?

मुस्लिम पक्ष और मस्जिद कमेटी के अनुसार यह मस्जिद सन 1911 से मौजूद है और खसरा नंबर 539 के तहत वक्फ बोर्ड में दर्ज है।

4. क्या अदालत में इस मामले पर कोई सुनवाई हुई थी?

हाँ, मुस्लिम पक्ष ने 22 जुलाई 2026 को जिला अदालत में अपील की थी। अदालत ने माना कि सरकारी भूमि पर बने अवैध निर्माण पर उपासना स्थल अधिनियम 1991 लागू नहीं होता।

5. इस मामले पर प्रमुख नेताओं ने क्या प्रतिक्रिया दी है?

मायावती, असदुद्दीन ओवैसी, संजय सिंह और सैयद आसिम वकार जैसे नेताओं ने इस कार्रवाई का विरोध किया है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है।

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