आरएसएस और मुस्लिम राजनीति पर वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव का बड़ा खुलासा
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नौशाद अख्तर
इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के एक विशेष कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम समुदाय के ऐतिहासिक और वर्तमान संबंधों पर गहरी रोशनी डाली है। उनके इस विश्लेषण ने भारतीय राजनीति में मुसलमानों की वर्तमान स्थिति और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दीर्घकालिक रणनीतियों को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है।
इस रिपोर्ट में 1965 के दीनदयाल उपाध्याय के बयानों से लेकर 1977 की इमरजेंसी के दौरान जमात ए इस्लामी के साथ बने संबंधों और 2014 के बाद संघ की नीतियों में आए बदलावों की परत दर परत पड़ताल की गई है।
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त्वरित सारांश और मुख्य बिंदु
- वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी द्वारा 440 में से केवल एक सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा गया। वर्तमान संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है।
- वर्ष 1965 में दीनदयाल उपाध्याय ने आंध्र प्रदेश के संघ शिविर में स्पष्ट किया था कि मुसलमानों की राजनीतिक आकांक्षाओं को पराजित करके ही उन्हें मुख्यधारा में मिलाया जा सकता है।
- आपातकाल के दौरान जेलों में आरएसएस और जमात ए इस्लामी के कार्यकर्ताओं के बीच संवाद बढ़ा था। दोनों संगठनों के साहित्य का आपस में आदान प्रदान भी हुआ था।
- वर्ष 1977 में बालासाहब देवरस के कार्यकाल के दौरान सभी समुदायों के साथ संवाद स्थापित करने की पहली आधिकारिक कोशिश शुरू हुई थी।
- वर्ष 2000 में तत्कालीन सरसंघचालक के एस सुदर्शन की पहल पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की नींव रखी गई थी।
- वर्ष 2014 के बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने पर आरएसएस की आंतरिक समन्वय बैठकों में मुस्लिम नीति पर नए सिरे से रणनीति तय की गई।
1965 का दीनदयाल उपाध्याय का भाषण और राजनीतिक पृष्ठभूमि
वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव ने 17 मई 1965 को आंध्र प्रदेश में आयोजित आरएसएस के अधिकारी शिक्षण शिविर यानी ओटीसी कैंप का उल्लेख किया। इस शिविर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने संघ के विचारकों और कार्यकर्ताओं के सामने एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाषण दिया था।
दीनदयाल उपाध्याय ने अपने भाषण में गुरु गोलवलकर और विनोबा भावे की मुलाकात का जिक्र किया था। विनोबा भावे का मानना था कि संघ मुसलमानों का विरोधी है। इसके उत्तर में गोलवलकर ने कहा था कि संघ मुसलमानों का शत्रु नहीं है। उनका मानना था कि व्यक्ति के रूप में हिंदू बुरा हो सकता है लेकिन सामूहिक रूप से अच्छा होता है। इसके विपरीत व्यक्ति के रूप में मुसलमान अच्छा हो सकता है लेकिन सामूहिक रूप से विचारणीय स्थिति बनती है।
दीनदयाल उपाध्याय ने इस भाषण में तथाकथित मुस्लिम समस्या के स्थायी समाधान का रास्ता बताया था। उन्होंने कहा था कि मुसलमानों की राजनीतिक पराजय ही इस समस्या का एकमात्र हल है। जब तक उनकी राजनीतिक आकांक्षाएं पराजित नहीं होंगी तब तक उन्हें भारतीय संस्कृति में पूरी तरह मिलाया नहीं जा सकता है।
वर्ष 1965 की उस रणनीति का असर 2024 की भारतीय संसद में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। आज देश की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक का निर्णायक प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है।
इमरजेंसी के दौरान आरएसएस और जमात ए इस्लामी का संबंध
वर्ष 1973 में गोलवलकर के निधन के बाद बालासाहब देवरस आरएसएस के सरसंघचालक बने। 1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ। यह दौर भारतीय राजनीति का एक बहुत बड़ा मोड़ साबित हुआ।
आपातकाल के समय आरएसएस और जमात ए इस्लामी दोनों संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। दोनों संगठनों के शीर्ष नेता और कार्यकर्ता जेलों में एक साथ बंद थे। जेल परिसर में आरएसएस और जमात ए इस्लामी के विचारकों के बीच गहरी बातचीत शुरू हुई।
जेल में रहने के दौरान दोनों संगठनों के बीच वैचारिक साहित्य का आदान प्रदान हुआ। इस दौरान दोनों पक्षों ने एक दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया।
मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने और प्रतिबंध हटने के बाद आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक जून 1977 में हुई। इस बैठक में पहली बार सभी धर्मों के लोगों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए एक मंच बनाने पर चर्चा हुई थी।
इसके बाद बालासाहब देवरस ने देश भर का दौरा किया। उन्होंने 1977 और 1978 के दौरान अलीगढ़ में मुस्लिम समुदाय के बीच और आगरा में ईसाई समुदाय के बीच बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम किए। हालांकि जनता पार्टी की सरकार में दोहरी सदस्यता का विवाद उठने के कारण यह संवाद आगे नहीं बढ़ सका।
1980 के दशक की राजनीति और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का गठन
वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद सरकारी कर्मचारियों के लिए नियमों को कड़ा कर दिया गया। उस दौर में सरकारी परिपत्रों में आरएसएस और जमात ए इस्लामी दोनों का नाम एक साथ दर्ज होता था। सरकारी कर्मचारियों के इन दोनों संगठनों की गतिविधियों में शामिल होने पर पूर्ण प्रतिबंध था। यह प्रतिबंध जुलाई 2024 तक जारी रहा जब गृह मंत्रालय ने नया आदेश जारी करके आरएसएस से प्रतिबंध हटाया।
1980 के दशक के मध्य में राम मंदिर आंदोलन तेज हुआ। इसके बाद देश के कई हिस्सों जैसे मेरठ, फरीदाबाद और इलाहाबाद में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा। 1992 की घटनाओं के बाद दोनों समुदायों के बीच कड़वाहट अपने चरम पर पहुंच गई थी।
वर्ष 2000 में आरएसएस के तत्कालीन प्रमुख के एस सुदर्शन ने एक नया प्रयास शुरू किया। उन्होंने विजयादशमी के अपने वार्षिक संबोधन में मुस्लिम समुदाय से सीधे जुड़ने की अपील की।
के एस सुदर्शन के प्रयासों से ही मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना हुई। इस मंच का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के भीतर संघ के विचारों का प्रचार करना और राष्ट्रवादी चेतना जगाना था।
2014 के बाद की स्थिति और संघ की नई रणनीति
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को अपने बलबूते पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। इस ऐतिहासिक जीत के बाद संघ के सामने एक नया वैचारिक प्रश्न खड़ा हुआ।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद देश की 24 करोड़ मुस्लिम आबादी के प्रति क्या नीति होनी चाहिए इस पर गंभीर चर्चा शुरू हुई। 2014 से 2016 के बीच आरएसएस की विभिन्न समन्वय बैठकों में इस विषय पर विस्तृत मंथन किया गया।
उस समय धर्मांतरण और घर वापसी जैसे मुद्दों पर काफी विवाद उत्पन्न हो रहे थे। संघ की उच्चस्तरीय बैठकों में यह निर्णय लिया गया कि विभिन्न आनुषांगिक संगठन अपने तय एजेंडे पर काम करते रहेंगे।
बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद अपने रास्ते पर चलेंगे। धर्म जागरण मंच धर्मांतरण के खिलाफ अभियान जारी रखेगा। लेकिन आरएसएस एक संगठन के रूप में मुस्लिम समाज के प्रति अपनी आधिकारिक नीति को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करेगा।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों में उसी रणनीति का प्रभाव दिखाई देता है। अब संघ सार्वजनिक मंचों से यह बात कह रहा है कि भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है।
निष्कर्ष और दूरगामी प्रभाव
वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव के इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि आरएसएस की मुस्लिम नीति अचानक नहीं बनी है। यह पिछले छह दशकों की एक सोची समझी और क्रमिक रणनीति का परिणाम है।
एक तरफ जहां राजनीतिक स्तर पर मुसलमानों के प्रभाव को सीमित करने का लक्ष्य पूरा किया गया है वहीं दूसरी तरफ सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर संवाद का द्वार खुला रखा गया है। संघ का उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को उनकी ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ना है जिसे वे मोहम्मदी हिंदू या भारतीय संस्कृति का हिस्सा मानते हैं।
वर्तमान समय में जब भारत वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना रहा है तब देश की विशाल मुस्लिम आबादी को साथ लेकर चलने की चुनौती भी बनी हुई है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संघ की यह दोहरी रणनीति भारतीय लोकतंत्र को किस दिशा में ले जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. दीनदयाल उपाध्याय ने 1965 में मुसलमानों के बारे में क्या कहा था?
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 1965 के अपने भाषण में कहा था कि मुस्लिम समस्या का समाधान उनकी राजनीतिक पराजय में निहित है। राजनीतिक आकांक्षाओं के समाप्त होने के बाद ही उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है।
2. आपातकाल के दौरान आरएसएस और जमात ए इस्लामी के बीच क्या संबंध थे?
इमरजेंसी के दौरान दोनों संगठनों के नेता एक ही जेल में बंद थे। इस दौरान उनके बीच बातचीत हुई और दोनों ने एक दूसरे के वैचारिक साहित्य का आदान प्रदान किया।
3. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना कब और किसने की?
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना वर्ष 2000 के आसपास हुई थी। इसे स्थापित करने में तत्कालीन आरएसएस प्रमुख के एस सुदर्शन ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
4. केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस में शामिल होने पर से रोक कब हटाई?
गृह मंत्रालय ने 22 जुलाई 2024 को एक आधिकारिक आदेश जारी करके सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने पर लगा प्रतिबंध हटा दिया।
5. वर्ष 2024 के चुनाव में बीजेपी ने कितने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे?
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कुल 440 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें केवल केरल की मल्लपुरम सीट से एक मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया गया था।
नोट: श्याम लाल यादव के अपने विचार हैं. मुस्लिम नाउ का इससे कोई संबंध नहीं.
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