वक्फ संशोधन विधेयक : देश में एक बड़े मुस्लिम आंदोलन की आहट?
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो,नई दिल्ली
लोकसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पास होने के बाद यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या भारत में एक बड़ा मुस्लिम आंदोलन खड़ा होने वाला है? इस विधेयक के पारित होने के बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU) में फूट पड़ चुकी है। JDU के एक एमएलसी ने अपने बयान में स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर यह विधेयक कानून बना तो देशभर के मुसलमान उबाल खा जाएंगे और सरकार को गंभीर विरोध झेलना पड़ेगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल देश को आंदोलन की आग में झोंकना चाहता है।
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क्या नीतीश कुमार इस विधेयक के पक्ष में हैं?
JDU के उक्त एमएलसी के मुताबिक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बिल के समर्थन में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री से इस पर तीन बार राय मांगी गई है, लेकिन उन्होंने अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह संकेत देता है कि JDU के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद गहराते जा रहे हैं।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कड़ा विरोध
जब सदन में वक्फ संशोधन विधेयक पेश किया गया, तो इसके समर्थन और विरोध में बहस का सिलसिला शुरू हो गया। इस बीच, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने एक बयान जारी कर इस विधेयक को सिरे से खारिज कर दिया।
AIMPLB की ओर से कहा गया:
“यह विधेयक न केवल भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 25 और 26) के खिलाफ है, बल्कि यह पूर्ण रूप से भेदभावपूर्ण भी है। यह भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत मुसलमानों के मौलिक अधिकारों को छीना जा रहा है और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश की जा रही है। हम इस विधेयक को पूरी तरह खारिज करते हैं।”
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठी कड़ी आपत्ति
AIMPLB ने इस मुद्दे पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की, जिसमें कई प्रमुख मुस्लिम नेता और विद्वान शामिल हुए:
- मौलाना मुहम्मद फजल-उर-रहीम मुजद्दिदी (महासचिव, AIMPLB)
- डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास (प्रवक्ता, AIMPLB)
- मुहम्मद अदीब (पूर्व सांसद और AIMPLB सदस्य)
मुस्लिम तंजीमों के विरोध प्रदर्शन जारी
देशभर की विभिन्न मुस्लिम तंजीमें (संगठन) AIMPLB के नेतृत्व में लगातार धरना-प्रदर्शन कर रही हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया गया था, जिसमें विपक्षी दलों के कई बड़े नेता भी शामिल हुए थे।
क्या बीजेपी ने इस मुद्दे को हल्के में लिया?
गौरतलब है कि तीन तलाक, राम मंदिर, मस्जिदों के नीचे मंदिर खोजने, मदरसा शिक्षा, बच्चा गोद लेने के नियम, यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC), नागरिकता संशोधन कानून (CAA) जैसे मुस्लिम विरोधी माने जाने वाले मुद्दों की तरह ही बीजेपी ने वक्फ संशोधन विधेयक को भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी। AIMPLB समेत कई मुस्लिम संगठनों द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद सरकार या बीजेपी के किसी बड़े नेता ने इस पर कोई बयान देना तक जरूरी नहीं समझा।
इस बीच, कई बड़े अदालती फैसले भी मुसलमानों के खिलाफ आए, जिसे लेकर मुस्लिम संगठन सरकार और न्यायपालिका पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार एक सांस्कृतिक युद्ध के ज़रिए मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश कर रही है।
क्या किसान आंदोलन की तर्ज पर मुस्लिम आंदोलन खड़ा होगा?
जब किसानों ने एमएसपी गारंटी और नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन किया था, तो उन्होंने दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक धरना दिया। सरकार को आखिरकार झुकना पड़ा और कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा।
अब मुस्लिम संगठनों को लग रहा है कि अगर उन्होंने कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया, तो उनके खिलाफ संस्थागत भेदभाव चलता रहेगा। उनका मानना है कि:
- सूफीवाद और गंगा-जमुनी तहज़ीब का इस्तेमाल सिर्फ दिखावे के लिए किया जा रहा है।
- शिया-सुन्नी और पसमांदा जैसे मुद्दों को उछालकर मुसलमानों को आपस में बांटने की साजिश हो रही है।
- अगर मुसलमान अब नहीं उठे, तो उनकी मौलिक पहचान धीरे-धीरे मिटा दी जाएगी।
अब देखने वाली बात यह होगी कि मुस्लिम रहनुमा और सामाजिक संगठनों के ये तेवर देश को किस दिशा में लेकर जाएंगे। क्या सरकार इस विरोध को गंभीरता से लेगी या इसे नजरअंदाज करेगी?