वक़्फ़ संशोधन विधेयक: भारत के मुसलमानों के लिए एक लिटमस टेस्ट
मुस्लिम नाउ विशेष
संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) द्वारा समीक्षा के बाद वक़्फ़ संशोधन विधेयक अब लोकसभा में पेश होने जा रहा है। संसद के दोनों सदनों की वर्तमान स्थिति और जेपीसी की रिपोर्ट यह संकेत देती हैं कि यह विधेयक आसानी से पारित हो जाएगा। इस विधेयक के पारित होने के बाद वक़्फ़ कानून में महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे, जिससे भारत के मुसलमानों को वक़्फ़ संपत्तियों पर प्राप्त अधिकारों का सरकारीकरण हो जाएगा।
अब सवाल यह है कि इसके बाद वक़्फ़ संपत्तियों का क्या होगा? सरकार इन पर कैसे नियंत्रण रखेगी? वक़्फ़ से मिलने वाली सुविधाएँ, जो अब तक गरीब मुसलमानों को मिलती थीं, क्या आगे भी जारी रहेंगी, या हालात और बदतर हो जाएंगे? मस्जिदों, मदरसों, ख़ानकाहों और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के भविष्य को लेकर मुसलमानों के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा? यह सवाल केवल अनुमान नहीं, बल्कि गंभीर मंथन का विषय है।
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मुसलमानों के भविष्य को लेकर चिंतन आवश्यक
इस विधेयक के पारित होने के बाद भारतीय मुसलमानों को गहराई से सोचना होगा कि उनका भविष्य कैसा होगा? क्या वे बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति में पहुंच जाएंगे? या सांस्कृतिक युद्ध के चलते उन्हें सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया जाएगा?
यह चिंता इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से भारत में ऐसा कोई मज़बूत मुस्लिम नेतृत्व उभरकर नहीं आया है, जिसके पीछे पूरी क़ौम खड़ी हो सके। हाल के दशकों में एपीजे अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिक को राष्ट्रीय पहचान मिली थी, लेकिन मुस्लिम समाज ने उन्हें वह समर्थन नहीं दिया, जिसकी अपेक्षा की जा सकती थी। आज के अधिकांश मुस्लिम नेता अवसरवादी हैं। वे सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे उन्हीं ताकतों के साथ सौदेबाजी करते हैं, जो मुसलमानों के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास कर रही हैं।
मुस्लिम समाज को अवसरवादियों से छुटकारा पाना होगा
यदि मुसलमानों को अपने अधिकारों की रक्षा करनी है, तो सबसे पहले उन अवसरवादी नेताओं और संगठनों की पहचान करनी होगी, जो अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते समुदाय को गुमराह कर रहे हैं। ऐसे लोग पसमांदा, सूफी, कुछ मस्जिदों और मुस्लिम संस्थानों के मुखिया के रूप में मौजूद हैं। इनकी पहचान करना कठिन नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के समाचार पत्रों और राजनीतिक गतिविधियों का विश्लेषण करके यह स्पष्ट हो जाएगा कि ये लोग किन ताकतों के साथ खड़े रहे हैं।
यह सच है कि ये तत्व गहरी जड़ें जमा चुके हैं और इनके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई करने पर कानूनी और प्रशासनिक दमन का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन इसके बावजूद, मुसलमानों को नए और दूरदर्शी नेतृत्व को आगे लाने का प्रयास करना होगा। यह चुनौतीपूर्ण ज़रूर है, पर असंभव नहीं।
CAA आंदोलन से सीखे सबक
CAA आंदोलन के दौरान देशभर के कई शहरों में नए और उभरते हुए मुस्लिम चेहरे सामने आए थे। यह आंदोलन बिना किसी स्थापित मुस्लिम नेतृत्व के भी दो महीने से अधिक समय तक चला था। इस दौरान कई धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी मुसलमानों के समर्थन में आई थीं। अब इन चेहरों को पहचाना जाना चाहिए और उन्हें मज़बूत किया जाना चाहिए। यदि इस दिशा में जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो समुदाय की शेष सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरें भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगी।
मुस्लिम नेताओं पर निर्भरता छोड़नी होगी
मुसलमानों को अब यह समझना होगा कि मौजूदा मुस्लिम राजनीतिक नेताओं से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। उनके अपने एजेंडे हैं और वे केवल चुनाव के समय ही मुसलमानों की याद करते हैं। आम मुसलमानों की रोज़गार, शिक्षा और सुरक्षा के मुद्दों पर वे कभी गंभीरता नहीं दिखाते। इसका आकलन पिछले कुछ वर्षों के उनके कार्यों से आसानी से किया जा सकता है।
सशक्त नेतृत्व की तलाश और नई रणनीति की आवश्यकता
अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज अपने भीतर ऐसे नेताओं और बुद्धिजीवियों को आगे लाए, जो ईमानदार हों, दूरदर्शी हों और जो समुदाय को मज़बूती के साथ आगे बढ़ाने का माद्दा रखते हों। ऐसे सेक्युलर चेहरे भी आगे आने चाहिए, जो निष्पक्ष हों और जिन्हें खरीदा न जा सके।
मुसलमानों का सामना अब सिर्फ़ राजनीतिक और कानूनी चुनौती से नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और सामाजिक साजिश से भी है। वे शक्तियाँ, जो मुसलमानों के भीतर मतभेद पैदा कर रही हैं—शिया-सुन्नी, अशराफ-पसमांदा के नाम पर फूट डालने की कोशिश कर रही हैं—उनका मुकाबला एक संगठित और दूरदर्शी रणनीति से ही किया जा सकता है।
मुसलमानों को अब यह समझना होगा कि उनका सामना औरंगज़ेब जैसे ऐतिहासिक शासकों से नहीं, बल्कि कहीं अधिक सूक्ष्म और खतरनाक योजनाकारों से है, जो धीरे-धीरे उन्हें उनकी पहचान और अधिकारों से वंचित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। यदि समय रहते एक मज़बूत, संगठित और दूरदर्शी रणनीति नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में चुनौतियाँ और गंभीर हो जाएंगी।
काबिल ए गौर
वक़्फ़ संशोधन विधेयक केवल एक कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत के मुसलमानों के अस्तित्व और भविष्य को लेकर एक लिटमस टेस्ट है। अब यह समुदाय पर निर्भर करता है कि वह इस चुनौती को कैसे लेता है। क्या मुसलमान एकता और जागरूकता के साथ अपने अधिकारों की रक्षा करेंगे, या फिर भीतर की फूट और अवसरवाद की भेंट चढ़ जाएंगे? आने वाले समय में इस सवाल का उत्तर इतिहास तय करेगा।