News

बनारसी बुनाई का परचम: वाराणसी के बुनकरों को राष्ट्रपति सम्मान

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली-वाराणसी

वाराणसी की सदियों पुरानी हथकरघा परंपरा को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा सम्मान मिला है। 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उत्कृष्ट हस्तशिल्प और बुनाई कला के लिए देश के अग्रणी बुनकरों को सम्मानित किया। इस भव्य कार्यक्रम में वाराणसी के दो प्रमुख बुनकरों, शाह मुहम्मद अंसारी और जमालुद्दीन अंसारी ने उत्तर प्रदेश का नाम रोशन किया है।

इस उपलब्धि पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दोनों बुनकरों को बधाई दी। उन्होंने लिखा कि बनारसी बुनाई कला के संरक्षण और नई पीढ़ी के प्रशिक्षण में इन कारीगरों का योगदान पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणास्रोत है।


शाह मुहम्मद अंसारी को राष्ट्रीय संत कबीर पुरस्कार

वाराणसी के चोलापुर क्षेत्र के रहने वाले वरिष्ठ बुनकर शाह मुहम्मद अंसारी को वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले सर्वोच्च संत कबीर हथकरघा पुरस्कार (2025) से नवाजा गया। उन्हें यह सम्मान लुप्तप्राय बुनाई श्रेणी के तहत प्रदान किया गया।

शाह मुहम्मद अंसारी ने अपनी विशेष कलाकृति ज़रबफ्त श्वेतांबरी अवध जामदानी साड़ी के माध्यम से पारंपरिक बुनाई तकनीक को फिर से जीवित किया है। संत कबीर पुरस्कार भारत में हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में गिना जाता है। यह पुरस्कार उन मास्टर बुनकरों को दिया जाता है जो देश की सांस्कृतिक विरासत को संजोने में निरंतर योगदान देते हैं।


जमालुद्दीन की संघर्ष से सफलता की कहानी

इसी समारोह में वाराणसी के एक और प्रतिभावान बुनकर जमालुद्दीन को भी उनकी असाधारण हस्तशिल्प कला के लिए सम्मानित किया गया। जमालुद्दीन को राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा संत कबीर राज्य पुरस्कार से पहले ही सम्मानित किया जा चुका है, जिसमें उन्हें एक लाख रुपये की नकद राशि प्रदान की गई थी।

जमालुद्दीन का यह सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है:

  • शुरुआती दौर: उन्होंने महज 14 वर्ष की उम्र में अपने पिता मोहम्मद इस्लाम के साथ बुनकरी का काम शुरू किया था।
  • हेल्पर से उस्ताद तक: कारखाने में एक साधारण मददगार के रूप में शुरुआत करके उन्होंने पारंपरिक तकनीकों में महारत हासिल की।
  • पूर्व सम्मान: उनकी असाधारण कलात्मकता के लिए उन्हें वर्ष 2009 में भी राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
  • रोजगार सृजन: आज वे कई हैंडलूम संचालित करते हैं, जहाँ लगभग 30 स्थानीय कारीगरों को नियमित रोजगार मिलता है।

90 दिनों की मेहनत और जामदानी कला

जमालुद्दीन ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने के लिए अपनी विशेष जामदानी जंगल रंगकट साड़ी पेश की। इस एक साड़ी को तैयार करने में लगभग तीन महीने या 90 दिनों का अटूट परिश्रम लगता है।

इस विशेष साड़ी की मुख्य विशेषताएं:

  • सामग्री: इसमें असली जरी, कोरा ताना और सूती बाना का उपयोग किया जाता है।
  • तकनीक: जटिल रंगकट और पारंपरिक बनारसी जामदानी बुनाई शैली।
  • आकार: साड़ी की कुल लंबाई 5.65 मीटर और साथ में 122 सेंटीमीटर का ब्लाउज पीस शामिल है।
  • मूल्य: कलात्मक गुणवत्ता और शुद्ध सामग्री के कारण इसकी अनुमानित कीमत लगभग 1.80 लाख रुपये है।

बनारसी हथकरघा का वैश्विक भविष्य

वाराणसी में बुनाई कला का इतिहास सदियों पुराना है। मुगल काल से चली आ रही यह परंपरा अपनी कटवर्क, तंचोई, कढ़ुआ और जामदानी शैलियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिलने से बनारसी साड़ियों को अंतरराष्ट्रीय पहचान तो मिली है, लेकिन पावरलूम और कृत्रिम धागों के बढ़ते चलन से पारंपरिक हथकरघा उद्योग को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

सम्मान प्राप्त करने के बाद बुनकर जमालुद्दीन और शाह मुहम्मद अंसारी ने कहा कि यह पुरस्कार केवल उनका नहीं, बल्कि बनारस के हर उस बुनकर का है जो दिन-रात धागों से कलाकृतियां बुनता है। उनका मुख्य लक्ष्य अब बनारसी हथकरघा को सीधे वैश्विक बाजारों से जोड़ना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस पुश्तैनी हुनर को अपनाकर गर्व महसूस कर सकें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *