यादें : पाकिस्तान की सियासत से निकली शाहरुख खान की अनकही कहानी
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नौशाद अख्तर
क्या पाकिस्तान की सियासत ने अनजाने में बॉलीवुड को शाहरुख खान दिया? सवाल सुनने में अजीब लगता है। लेकिन शाहरुख खान के पिता ताज मोहम्मद से जुड़ी एक पुरानी कहानी इस सवाल को जन्म देती है। यह कहानी भारत पाकिस्तान बंटवारे, पेशावर की राजनीति, कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सत्ता के लिए बदलती राजनीतिक वफादारियों से होकर गुजरती है।
शाहरुख खान आज दुनिया भर में भारतीय सिनेमा के सबसे पहचाने जाने वाले चेहरों में हैं। उन्हें बॉलीवुड का बादशाह कहा जाता है। मगर उनकी कहानी सिर्फ मुंबई की फिल्मी दुनिया से शुरू नहीं होती। इसके पीछे पेशावर का एक दौर है। वह दौर जब भारत की आजादी की लड़ाई चल रही थी और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत, जिसे आज खैबर पख्तूनख्वा कहा जाता है, भी राजनीतिक उथल पुथल से गुजर रहा था।
इसी दौर में ताज मोहम्मद, बिलौर दीन और डॉ. अब्दुल कयूम खान तीन ऐसे नौजवान थे, जिनकी दोस्ती और राजनीतिक सक्रियता का जिक्र मिलता है। तीनों आजादी के आंदोलन से प्रभावित थे। वे कांग्रेस और खान अब्दुल गफ्फार खान, यानी बाचा खान, के खुदाई खिदमतगार आंदोलन से जुड़े हुए थे।
यह वह समय था जब राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं थी। विचारधारा भी मायने रखती थी। आजादी का सपना था। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष था। और लोगों के बीच यह सवाल भी था कि आजादी के बाद देश का भविष्य कैसा होगा।

दोस्ती से शुरू हुई कहानी, सियासत ने बदल दिया रास्ता
ताज मोहम्मद और उनके साथियों की जिंदगी में 1947 एक बड़ा मोड़ लेकर आया। भारत का विभाजन हुआ। पाकिस्तान अस्तित्व में आया। इसके साथ ही उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत की राजनीति में भी बड़ा बदलाव आया।
मुस्लिम लीग का प्रभाव तेजी से बढ़ा। इसी राजनीतिक बदलाव के बीच डॉ. अब्दुल कयूम खान की राजनीति ने भी नया रास्ता पकड़ा। वे पहले कांग्रेस और बाचा खान के आंदोलन से जुड़े हुए थे। बाद में उन्होंने मुस्लिम लीग का साथ दिया। पाकिस्तान बनने के बाद वे खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री बने।
यहीं से कहानी का सबसे विवादित और दिलचस्प हिस्सा सामने आता है।
पुस्तक ‘मैं क्यों नहीं टूटा?’ में डॉ. मोहम्मद सुहैल खान ने हाजी गुलाम अहमद बिलौर के साथ हुई लंबी बातचीत और रिकॉर्डिंग्स के आधार पर इस दौर से जुड़ी घटनाओं को सामने रखा है। किताब में ताज मोहम्मद, बिलौर दीन और डॉ. अब्दुल कयूम खान की पुरानी दोस्ती तथा बाद में पैदा हुए राजनीतिक मतभेदों का उल्लेख है।
कहानी के मुताबिक, ताज मोहम्मद पर मुस्लिम लीग में शामिल होने का दबाव बनाया गया। लेकिन उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच से समझौता नहीं किया। इसके बाद उनके लिए मुश्किलें बढ़ती गईं।
पाकिस्तान की राजनीति में विरोधियों से बदला लेने का सिलसिला
पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास को देखें तो सत्ता और विरोध के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है। देश बनने के बाद से ही राजनीतिक अस्थिरता पाकिस्तान की पहचान का हिस्सा रही है। सरकारें बदलीं। सैन्य शासन आया। निर्वाचित सरकारें बर्खास्त हुईं। नेताओं पर मुकदमे चले। कई नेताओं को जेल जाना पड़ा। कुछ को देश से बाहर रहना पड़ा।

नवाज शरीफ, परवेज मुशर्रफ, आसिफ अली जरदारी और इमरान खान जैसे नेताओं के राजनीतिक जीवन में भी सत्ता संघर्ष और प्रतिशोध के आरोप अलग अलग समय पर सामने आते रहे हैं। पाकिस्तान की राजनीति में यह धारणा मजबूत रही है कि सत्ता बदलते ही राजनीतिक विरोधियों के लिए परिस्थितियां भी बदल जाती हैं।
ताज मोहम्मद की कहानी को भी इसी राजनीतिक माहौल की पृष्ठभूमि में देखा जाता है।
किताब में किए गए दावों के अनुसार, ताज मोहम्मद पर मुकदमे दर्ज किए गए। उन्हें परेशान किया गया और जेल भी भेजा गया। उनका अपराध यही बताया जाता है कि उन्होंने राजनीतिक दबाव के आगे झुकने से इनकार किया।
यहां कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं रह जाती। यह उस दौर की राजनीति का आईना बन जाती है, जिसमें दोस्ती से ज्यादा अहम राजनीतिक निष्ठा हो गई थी।
ताज मोहम्मद ने पेशावर क्यों छोड़ा?
ताज मोहम्मद के लिए सबसे कठिन फैसला अपने शहर को छोड़ना था। पेशावर उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं था। वहां उनका बचपन था। दोस्त थे। रिश्ते थे। राजनीतिक जीवन की यादें थीं। लेकिन लगातार दबाव और कथित प्रताड़ना ने उन्हें पाकिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया।
आखिरकार उन्होंने भारत का रुख किया।
यही वह मोड़ है जहां इतिहास और बॉलीवुड की कहानी एक दूसरे से जुड़ती है।
भारत आने के बाद ताज मोहम्मद ने नई जिंदगी शुरू की। उन्होंने शादी की। इसी परिवार में आगे चलकर एक बच्चे ने जन्म लिया। नाम था शाहरुख खान।
बाद में यही बच्चा भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी हस्तियों में शामिल हुआ।
अगर ताज मोहम्मद पाकिस्तान में रहते तो?
इतिहास में ‘अगर’ का कोई निश्चित जवाब नहीं होता। फिर भी यह सवाल बेहद दिलचस्प है।
अगर ताज मोहम्मद को पेशावर छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती तो क्या शाहरुख खान का जन्म भारत में होता? शायद नहीं।
अगर शाहरुख खान भारत नहीं आते तो क्या वे हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में शामिल होते? इसका भी कोई निश्चित जवाब नहीं है।
लेकिन इतना जरूर है कि शाहरुख खान की जिंदगी में भारत आने की पारिवारिक कहानी एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
मुंबई ने उन्हें पहचान दी। हिंदी सिनेमा ने उन्हें मंच दिया। भारतीय दर्शकों ने उन्हें स्टार बनाया। फिर उनकी लोकप्रियता भारत से निकलकर दुनिया के अलग अलग हिस्सों तक पहुंची।
‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘कुछ कुछ होता है’, ‘कभी खुशी कभी गम’, ‘कल हो ना हो’, ‘वीर जारा’, ‘चक दे इंडिया’, ‘ओम शांति ओम’, ‘माई नेम इज खान’, ‘पठान’ और ‘जवान’ जैसी फिल्मों ने उनकी पहचान को और बड़ा किया।
आज शाहरुख खान सिर्फ एक अभिनेता नहीं हैं। वह भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का एक बड़ा नाम हैं।

बंटवारे की त्रासदी और एक परिवार की नई शुरुआत
भारत पाकिस्तान का बंटवारा केवल नक्शे पर खींची गई एक रेखा नहीं था। इसने करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल दी। लाखों परिवार उजड़ गए। लोगों को अपना घर, कारोबार और रिश्ते छोड़ने पड़े।
ताज मोहम्मद की कहानी भी इसी बड़े ऐतिहासिक बदलाव की एक छोटी मगर महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आती है।
एक तरफ पाकिस्तान बनने के बाद की राजनीतिक उथल पुथल थी। दूसरी तरफ भारत में नई जिंदगी शुरू करने की चुनौती। एक व्यक्ति ने अपना शहर छोड़ा। परिवार ने नई जमीन पर भविष्य तलाशा। और कई साल बाद उसी परिवार से भारतीय सिनेमा का एक ऐसा सितारा निकला, जिसकी पहचान सीमाओं से आगे चली गई।
यहां इतिहास की विडंबना दिखाई देती है।
जिस राजनीतिक दौर ने एक परिवार को अपने शहर से दूर किया, उसी बदलाव ने भारत को एक ऐसा कलाकार दिया, जिसे दुनिया शाहरुख खान के नाम से जानती है।
पाकिस्तान की सियासत और शाहरुख खान की कहानी का रिश्ता
शाहरुख खान की कहानी को केवल बॉलीवुड की सफलता की कहानी मानना अधूरा होगा। इसके पीछे विभाजन की राजनीति, पेशावर का इतिहास और पाकिस्तान की शुरुआती सत्ता राजनीति भी जुड़ी हुई है।
यह कहानी यह भी बताती है कि राजनीति के फैसलों का असर केवल नेताओं तक सीमित नहीं रहता। उसका असर परिवारों पर पड़ता है। पीढ़ियों पर पड़ता है। कभी कभी तो आने वाली पीढ़ियों की पहचान तक बदल जाती है।
ताज मोहम्मद शायद कभी यह सोच भी नहीं सकते थे कि पेशावर छोड़ने का उनका फैसला आगे चलकर उनके बेटे को भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुंचाएगा।
शाहरुख खान के लिए भारत केवल वह देश नहीं रहा जहां उन्होंने जन्म लिया। यही देश उनकी पहचान बना। यही उनकी कर्मभूमि बना। और यहीं से उनकी आवाज दुनिया तक पहुंची।
पाकिस्तान की राजनीति में सत्ता संघर्ष की लंबी कहानी है। मगर ताज मोहम्मद की कहानी उस इतिहास का एक अलग पहलू सामने रखती है। इसमें सत्ता है। दोस्ती है। विचारधारा है। बंटवारा है। विस्थापन है। और अंत में एक ऐसी कहानी है, जिसका आखिरी अध्याय बॉलीवुड के सबसे चमकदार सितारों में से एक के रूप में लिखा गया।
इतिहास कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। कई बार एक राजनीतिक फैसला किसी परिवार को उजाड़ देता है। और वही फैसला किसी दूसरी जगह एक नई कहानी की शुरुआत कर देता है।
ताज मोहम्मद ने पेशावर छोड़ा था। उनके बेटे शाहरुख खान ने भारत में अपनी दुनिया बनाई। फिर उस दुनिया ने उन्हें पूरी दुनिया का शाहरुख खान बना दिया।

