Culture

उदयपुर फाइल्स: नफरत के प्रचार की नई कड़ी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली


भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक चिंताजनक ट्रेंड उभर रहा है – ‘प्रोपेगंडा फिल्मों’ के ज़रिए एक विशेष समुदाय को निशाना बनाना। कभी ‘केरल फाइल्स’, कभी ‘कश्मीर फाइल्स’, और अब ‘उदयपुर फाइल्स’, इन फिल्मों का उद्देश्य कला या सिनेमा नहीं बल्कि समाज में ध्रुवीकरण और नफरत फैलाना प्रतीत होता है।

सवाल यह नहीं है कि ऐसी फिल्में क्यों बनती हैं — सवाल यह है कि इन फिल्मों को कानूनी संरक्षण और राजनीतिक समर्थन क्यों मिलता है, और क्यों न्यायपालिका के सामने बार-बार ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का पर्दा डालकर सांप्रदायिक ज़हर को वैधता दी जाती है।


🎬 ‘उदयपुर फाइल्स’ का मामला: एक समुदाय को टारगेट करने की कोशिश?

जून 2022 में उदयपुर में दर्जी कन्हैयालाल की हत्या एक निंदनीय और जघन्य अपराध था, जिसे पूरे देश ने एक स्वर में गलत ठहराया। लेकिन इस घटना को आधार बनाकर एकतरफा और कट्टरता से भरी फिल्म बनाना क्या न्यायसंगत है?

‘उदयपुर फाइल्स’ इस दर्दनाक हत्या पर आधारित है, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म एक विशिष्ट समुदाय को ‘सामूहिक अपराधी’ के रूप में पेश करती है, जिससे न केवल सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भारत के सामाजिक ताने-बाने को गहरा आघात भी पहुँच सकता है।


⚖️ अदालत में बहस: नफरत बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति अनीश दयाल शामिल हैं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद सहित कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। याचिकाएं स्पष्ट रूप से कहती हैं कि यह फिल्म सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने और एकतरफा विमर्श थोपने का प्रयास है।

याचिकाओं में यह भी तर्क दिया गया है कि फिल्म का ट्रेलर, जो पहले ही YouTube पर उपलब्ध है, भड़काऊ, सांप्रदायिक और दुर्भावनापूर्ण संदेशों से भरा हुआ है। इसमें पूर्व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के विवादित बयानों को संदर्भित करते हुए उन्हें “नायक” के रूप में प्रस्तुत करने का भी आरोप है।


🛑 CBFC की भूमिका पर सवाल

जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) जैसी संस्था, जिसका काम फिल्मों को निष्पक्षता और सामाजिक जिम्मेदारी के आधार पर जाँचना है, ऐसे विषयों को बिना पूरी जांच के प्रमाणित कर देती है, तो सवाल उठते हैं कि क्या यह संस्था भी राजनीतिक दबावों में काम कर रही है?

CBFC ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने “आवश्यक कट्स” सुझाए थे और निर्माता ने उन्हें स्वीकार भी किया। लेकिन जब मूल कहानी और दृष्टिकोण ही भड़काऊ हो, तो चंद कट्स फिल्म को सांप्रदायिक एजेंडे से मुक्त नहीं कर सकते।


🛡️ कट्टर मानसिकता को संरक्षण?

सबसे गंभीर और चिंताजनक बात यह है कि जिस महिला की कट्टर बयानबाज़ी ने इस हत्या की पृष्ठभूमि तैयार की, उसे पुलिस सुरक्षा मिली हुई है। एक विशेष राजनीतिक दल और उससे जुड़े संगठनों ने उसे “अभिव्यक्ति की नायिका” बनाकर पेश किया, जबकि उसी के शब्दों ने देश को हिंसा की आग में झोंका।

इससे क्या यह संकेत नहीं जाता कि अगर आप किसी विशेष धर्म के खिलाफ ज़हर उगलेंगे, तो आपको सुरक्षा, समर्थन और सिनेमा के ज़रिए महिमामंडन भी मिलेगा?


📽️ निजी स्क्रीनिंग और कानूनी समीक्षाएं

दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए 9 जुलाई को याचिकाकर्ताओं और सरकारी पक्ष के वकीलों के लिए फिल्म और ट्रेलर की निजी स्क्रीनिंग का आदेश दिया। यह स्क्रीनिंग अदालत को निर्णय लेने में सहायक होगी कि क्या फिल्म वास्तव में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा सकती है।

अब अदालत 10 जुलाई को अगली सुनवाई करेगी, जिसमें यह तय किया जाएगा कि फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगाई जाए या नहीं।


🧭 क्या हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में नफरत को वैधता दे रहे हैं?

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर उस बहस को जीवंत कर दिया है जिसमें एक ओर कलात्मक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, तो दूसरी ओर सामाजिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक शांति की अनिवार्यता

क्या कोई भी निर्माता सांप्रदायिक नफरत फैलाकर खुद को ‘फिल्मकार’ कह सकता है? क्या अदालतें, जो हमेशा संविधान की संरक्षक रही हैं, इस बार भी उसी स्पष्टता से नफरत के एजेंडे को अस्वीकार करेंगी?


📢 निष्कर्ष: सिनेमा या सांप्रदायिकता का मंच?

‘उदयपुर फाइल्स’ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक प्रचार उपकरण है, जो धार्मिक भावनाओं को भड़काकर, देश की सामाजिक एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। इसे एक संवेदनशील समाज में सिर्फ “मनोरंजन” कहकर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस देश में जब तक कलाम, सबीह खान और इंदिरा नूयी जैसे लोग हैं, तब तक भारत की पहचान विकास, नवाचार और प्रतिभा से बनी रहेगी — न कि घृणा फैलाने वाली फिल्मों और उनके सरपरस्तों से।


“नफरत को फिल्म बनाकर पेश करना, कलात्मक स्वतंत्रता नहीं – समाज के ताने-बाने पर वार है। और ऐसे वारों के खिलाफ खड़ा होना ही सच्चा देशप्रेम है।”