होर्मुज संकट में पाकिस्तान की नई रणनीतिक भूमिका
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काहिरा/वॉशिंगटन/दुबई
होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर दुनिया की बड़ी ताकतों की राजनीति के बीच खड़ा है। ईरान और ओमान के बीच इसे लेकर बातचीत आगे बढ़ रही है। दोनों देशों के बीच एक अस्थायी समुद्री रास्ते पर सहमति बनने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन तेहरान साफ कर चुका है कि केवल ओमान के साथ समझौते से होर्मुज पूरी तरह नहीं खुलेगा।
ईरान ने इसके लिए अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं। इनमें अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करना, युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा, ईरान के खिलाफ हमले रोकना और प्रतिबंध हटाना शामिल है।
इसी बीच पाकिस्तान की भूमिका भी अचानक महत्वपूर्ण हो गई है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौता किया है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब ईरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव बेहद ऊंचे स्तर पर है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने साफ कहा है कि यह रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं है। फिर भी पश्चिम एशिया की मौजूदा राजनीति में इसके असर को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
यहां से कहानी केवल होर्मुज जलडमरूमध्य की नहीं रह जाती। इसमें पाकिस्तान की पुरानी ईरान नीति, सऊदी अरब से उसकी सुरक्षा साझेदारी और अमेरिका से उसके बदलते रिश्ते भी शामिल हो जाते हैं।
होर्मुज में फंसी दुनिया की ऊर्जा
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह संकरा रास्ता तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति के लिए बेहद अहम है।
यही वजह है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष का असर केवल तेहरान और वॉशिंगटन तक सीमित नहीं है।
एक तरफ ईरान होर्मुज पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। दूसरी तरफ अमेरिका चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय जहाज बिना किसी रुकावट के इस रास्ते से गुजरें।
ईरान के इस रुख से खाड़ी के दूसरे देशों की चिंता बढ़ी है। संयुक्त अरब अमीरात ने शनिवार को कहा कि ईरान ने उसके सरकारी तेल प्रतिष्ठान से जुड़े एक जहाज को मिसाइल से निशाना बनाया। किसी के घायल होने की खबर नहीं है। ब्रिटेन के समुद्री व्यापार निगरानी संगठन ने भी एक जहाज में आग लगने की सूचना दी। आग बाद में बुझा दी गई।
ऐसे माहौल में तेल टैंकरों की आवाजाही केवल व्यापार का सवाल नहीं रह गई है। यह सुरक्षा और सत्ता का सवाल बन गई है।
ईरान और ओमान के बीच क्या हो रहा है?
ओमान इस संकट में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में सामने आया है। उसने ईरान के साथ बातचीत को सकारात्मक और रचनात्मक बताया है।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची के मुताबिक, दोनों देश एक नए समुद्री मार्ग पर सहमति के करीब हैं। हालांकि स्थायी व्यवस्था बनने में कानूनी और तकनीकी अड़चनें हैं।
तेहरान पुराने ट्रैफिक सेपरेशन सिस्टम को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए फिलहाल अस्थायी समुद्री रास्ते पर चर्चा चल रही है।
मगर ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने इससे अलग संकेत दिया है। उसका कहना है कि होर्मुज को पूरी तरह खोलने का फैसला केवल ईरान और ओमान की बातचीत से तय नहीं होगा।
अमेरिका को ईरान की शर्तें माननी होंगी। तभी रास्ता सामान्य रूप से खुल सकता है।
यही इस पूरे विवाद की असली गांठ है।
🇸🇦🇹🇷🇵🇰 Mecca defense pact сombines biggest strengths of Saudi Arabia, Turkiye and Pakistan
— Sputnik (@SputnikInt) August 7, 2026
The newly-signed defense agreement brings together "Saudi Arabia's economic strength, Turkiye's defense technology and Pakistan's military capabilities," according to Amir Jahangir,… pic.twitter.com/v1HCXfVx9t
पाकिस्तान यहां क्यों महत्वपूर्ण है?
पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति इस संकट को उसके लिए सामान्य कूटनीतिक मामला नहीं रहने देती।
पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है। दूसरी ओर उसके सऊदी अरब से लंबे समय से गहरे सुरक्षा और आर्थिक संबंध हैं। पाकिस्तान तुर्की के साथ भी रक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ाता रहा है।
इसलिए इस समय इस्लामाबाद एक कठिन स्थिति में है।
ईरान उसका पड़ोसी है। सऊदी अरब उसका रणनीतिक साझेदार है। अमेरिका खाड़ी की सुरक्षा में बड़ी सैन्य ताकत है। तुर्की के साथ पाकिस्तान की दोस्ती भी लगातार मजबूत हुई है।
अब इन तीनों देशों के साथ पाकिस्तान के रिश्ते एक ही क्षेत्रीय संकट में सामने आ रहे हैं।
यही कारण है कि मक्का में हुआ सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का रक्षा समझौता खास महत्व रखता है। समझौते के बाद क्षेत्र में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पश्चिम एशिया अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पहले की तरह निर्भर रहेगा या नए क्षेत्रीय गठबंधन बनेंगे। विश्लेषकों ने भी इसे क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में बदलाव के संकेत के रूप में देखा है।
पाकिस्तान की पुरानी दुविधा
पाकिस्तान के लिए ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलन बनाना कोई नया काम नहीं है।
दोनों देशों के साथ उसके रिश्तों का इतिहास अलग है। ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है। दोनों देशों के बीच साझा सीमा है। सीमा पार व्यापार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी हैं।
सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान का रिश्ता धार्मिक भावनाओं से आगे जाकर रक्षा और आर्थिक सहयोग तक पहुंचता है।
पिछले साल पाकिस्तान और सऊदी अरब ने रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता किया था। उस समझौते में एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना गया। अब तुर्की के साथ त्रिपक्षीय रक्षा समझौते ने इस रिश्ते को और व्यापक बना दिया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ युद्ध में उतर गया है। तुर्की के विदेश मंत्री ने भी कहा है कि ईरान इस रक्षा समझौते का लक्ष्य नहीं है।
लेकिन राजनीति में संदेश भी महत्वपूर्ण होता है।
और इस समय संदेश यही है कि खाड़ी संकट के बीच पाकिस्तान की रणनीतिक अहमियत बढ़ रही है।
ईरान के साथ पाकिस्तान सीधे टकराव से बचना चाहता है
पाकिस्तान के लिए सबसे मुश्किल सवाल यही है कि वह सऊदी अरब के साथ अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को कैसे निभाए और ईरान के साथ टकराव से कैसे बचे।
इसका एक कारण भूगोल है।
ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है। किसी भी लंबे सैन्य संघर्ष का असर पाकिस्तान की सीमा, व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और घरेलू सुरक्षा पर पड़ सकता है।
दूसरा कारण खाड़ी में रहने वाले लाखों पाकिस्तानी नागरिक हैं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी काम करते हैं। खाड़ी में अस्थिरता का असर सीधे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और प्रवासी कामगारों पर पड़ सकता है।
तीसरा कारण ऊर्जा है।
होर्मुज से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होती है तो उसका असर केवल पश्चिमी देशों पर नहीं पड़ता। एशिया के कई देशों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।
पाकिस्तान पहले से आर्थिक दबावों से जूझता रहा है। ऐसे में महंगा तेल उसके लिए बड़ी समस्या बन सकता है।
अमेरिका की नाकाबंदी और ईरान की शर्तें
अमेरिका ने कहा है कि वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही सामान्य होने पर ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी हटाई जा सकती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, मानवीय सहायता लेकर 30 से अधिक जहाजों को रास्ता दिया गया है। वहीं कई जहाजों को रोका गया और कुछ जहाजों पर कार्रवाई की गई।
ईरान का कहना है कि मानवीय मदद के रास्ते अलग मुद्दा हैं। उसके मुताबिक, सामान्य व्यापार और तेल की आवाजाही तभी बहाल होगी जब अमेरिका उसकी शर्तें स्वीकार करे।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी मौजूदा समय को समझौते के लिए सही बताया है। उनका दावा है कि युद्ध के बावजूद ईरान मजबूत स्थिति में है।
दूसरी तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान जहाजों पर हमले बंद करे और होर्मुज में सामान्य अंतरराष्ट्रीय आवाजाही बहाल हो।
यही दो अलग दावे इस संकट को लंबा खींच रहे हैं।
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान की नई तिकड़ी
मक्का में हुआ रक्षा समझौता इस पूरे घटनाक्रम का सबसे नया राजनीतिक अध्याय है।
सऊदी अरब के पास पैसा और खाड़ी की रणनीतिक स्थिति है। तुर्की के पास बड़ी सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव है। पाकिस्तान के पास एक बड़ा सैन्य ढांचा और खाड़ी क्षेत्र के साथ लंबे सुरक्षा संबंध हैं।
इन तीनों का एक साथ आना पश्चिम एशिया की राजनीति में नई तस्वीर बना सकता है।
लेकिन इसे ईरान विरोधी गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी।
पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ सीधे टकराव की कीमत बहुत ज्यादा हो सकती है। तुर्की भी ईरान को इस समझौते का लक्ष्य नहीं बता रहा है। इसलिए इस समय ज्यादा सही बात यह होगी कि तीनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा में अपनी सामूहिक भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
होर्मुज खुलेगा तो क्या बदलेगा?
अगर ईरान और ओमान किसी अस्थायी व्यवस्था पर सहमत हो जाते हैं तो सबसे पहले जहाजों की आवाजाही सामान्य होने की उम्मीद होगी।
इसके बाद तेल और गैस की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। समुद्री बीमा की लागत भी घट सकती है। खाड़ी के देशों को राहत मिल सकती है।
भारत और पाकिस्तान जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी यह अच्छी खबर होगी।
लेकिन स्थायी समाधान तब तक मुश्किल है जब तक अमेरिका और ईरान के बीच मूल विवाद खत्म नहीं होता।
होर्मुज का सवाल अब सिर्फ जहाजों का सवाल नहीं है। यह ईरान और अमेरिका की ताकत की परीक्षा है। यह सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता है। यह तुर्की की नई क्षेत्रीय भूमिका है। और पाकिस्तान के लिए यह अपनी पुरानी संतुलन की राजनीति को बचाने की सबसे कठिन परीक्षा है।
इतिहास गवाह है कि पश्चिम एशिया में समुद्री रास्ते कभी केवल व्यापार के रास्ते नहीं रहे। इनके साथ सत्ता जुड़ी रही है। तेल जुड़ा रहा है। युद्ध जुड़ा रहा है।
आज होर्मुज फिर उसी इतिहास के बीच खड़ा है।
और इस बार पाकिस्तान भी उस कहानी के किनारे खड़ा दर्शक नहीं है। वह ईरान का पड़ोसी है। सऊदी अरब का सुरक्षा साझेदार है। तुर्की का सहयोगी है। और खाड़ी की स्थिरता का सीधा लाभार्थी भी।
इसलिए होर्मुज का रास्ता खुलता है या बंद रहता है, उसका असर इस्लामाबाद तक पहुंचना तय है।
AEO के लिए सीधे जवाब:
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों महत्वपूर्ण है? यह फारस की खाड़ी से दुनिया के प्रमुख ऊर्जा बाजारों तक तेल और गैस की आवाजाही का महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।
पाकिस्तान होर्मुज संकट में क्यों महत्वपूर्ण है? क्योंकि पाकिस्तान ईरान का पड़ोसी है और उसके सऊदी अरब तथा तुर्की के साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा संबंध हैं।
क्या पाकिस्तान ईरान के खिलाफ है? मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। सऊदी अरब और तुर्की के साथ नए रक्षा समझौते के बावजूद तुर्की ने स्पष्ट किया है कि ईरान इस समझौते का लक्ष्य नहीं है।
क्या ईरान और ओमान के बीच होर्मुज को लेकर समझौता हो सकता है? बातचीत को सकारात्मक बताया गया है और अमेरिका को भी जल्द समझौते की उम्मीद है, लेकिन ईरान ने स्पष्ट किया है कि केवल ओमान के साथ समझौता पर्याप्त नहीं होगा।

