Religion

दुबई में $1 मिलियन क़ुरआन अवॉर्ड के फाइनल में पहुंचे 14 वर्षीय कुवैती हाफ़िज़ अब्दुल्ला अल-बुती

“क़ुरआन से दिमाग़ फैलता है” – नन्हे कारी की बड़ी सोच ने बनाया वैश्विक मंच तक का सफर

कुवैत के 14 वर्षीय कारी अब्दुल्ला फैसल अल-बुती ने 28वें Dubai International Holy Quran Award के फाइनल में जगह बनाकर पूरी खाड़ी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक मिलियन डॉलर से अधिक की कुल पुरस्कार राशि वाले इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड को आज दुनिया का सबसे बड़ा और सम्मानित क़ुरआन प्रतियोगिता मंच माना जाता है।

अब्दुल्ला का सिद्धांत है— “क़ुरआन से दिमाग़ फैलता है और इंसान हर चीज़ को अपनाने के काबिल बनता है।” यही सोच बचपन से उनके जीवन की दिशा तय करती रही है।


बचपन से क़ुरआन की रौशनी में ढला सफर

अब्दुल्ला की तालीम की शुरुआत नौ साल की उम्र में उनकी मां ने की। उन्होंने घर पर ही उन्हें क़ुरआन के पहले दो पारों का हिफ्ज़ कराया। इसके बाद उन्हें विशेष क़ुरआन हलकों में दाखिल कराया गया, जहां उनकी प्रतिभा और निखरी।

उन्होंने कुवैत की प्रसिद्ध संस्था Al Maher Association for the Quran and Its Sciences से क़ुरआनी शिक्षा हासिल की। यह संस्था ऐसे नौजवानों को तैयार करने के लिए जानी जाती है जो सिर्फ क़ुरआन याद ही नहीं करते, बल्कि उसे समझते और अपने जीवन में लागू भी करते हैं।

परिवार का माहौल पूरी तरह क़ुरआन-केंद्रित है। घर में रोजाना हिफ्ज़ की पुनरावृत्ति की जाती है, जिससे याददाश्त मजबूत होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।


कम उम्र, बड़ी उपलब्धियां

अब्दुल्ला ने अपनी उम्र से कहीं आगे बढ़कर उपलब्धियां हासिल की हैं:

  • 2025 में फरवानिया शैक्षिक ज़िले की क़ुरआन तिलावत प्रतियोगिता में स्कूल स्तर पर पहला स्थान।
  • 2024 और 2025 में कुवैत ग्रैंड क़ुरआन हिफ्ज़ व तजवीद प्रतियोगिता में क्रमशः प्रथम और द्वितीय स्थान।
  • 2023 में शिक्षा मंत्रालय स्तर पर “सर्वश्रेष्ठ मुअज्ज़िन” का खिताब।
  • 2023 में बसायर चैरिटी एसोसिएशन की “सबसे सुंदर अज़ान” प्रतियोगिता में पहला स्थान।
  • 2024 और 2025 में मौधी बरजस अल-सुर मस्जिद प्रतियोगिता में लगातार दो बार दूसरा स्थान।

ये उपलब्धियां साबित करती हैं कि अब्दुल्ला सिर्फ एक प्रतिभागी नहीं, बल्कि एक उभरते हुए वैश्विक कारी हैं।


पढ़ाई और हिफ्ज़ के बीच संतुलन

अब्दुल्ला मानते हैं कि अकादमिक पढ़ाई और क़ुरआन हिफ्ज़ के बीच संतुलन बनाना उनकी सबसे बड़ी चुनौती रही। लेकिन उनका कहना है कि क़ुरआन की बरकत ने हर मुश्किल को आसान बना दिया।

वह रोज़ाना नियमित तिलावत और मशहूर क़ुर्रा की रिकॉर्डिंग सुनकर अपने उच्चारण (तजवीद) और मक़ामात को बेहतर बनाते हैं। उनका लक्ष्य भविष्य में प्रमाणित इजाज़त (Ijazah) हासिल कर अगली पीढ़ी को क़ुरआन की शिक्षा देना है।


खेल और शौक भी जारी

क़ुरआन की तालीम के साथ-साथ अब्दुल्ला एक संतुलित जीवन जीते हैं। उन्हें साइक्लिंग पसंद है और वह फुटबॉल व वॉलीबॉल में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।

उनके अनुसार, “क़ुरआन ने मुझे अनुशासन सिखाया। इसी अनुशासन ने खेल और पढ़ाई में भी मुझे आगे बढ़ाया।”

यह संदेश उन अभिभावकों के लिए भी अहम है जो मानते हैं कि धार्मिक शिक्षा बच्चों के अन्य विकास में बाधा बनती है। अब्दुल्ला इसका जीवंत उदाहरण हैं कि संतुलन संभव है।


दुबई मंच पर पहुंचने का सम्मान

फाइनल में पहुंचने पर अब्दुल्ला ने कहा:
“यह अल्लाह की नेमत और वर्षों की मेहनत का परिणाम है। दुबई में प्रतिस्पर्धा करना यह साबित करता है कि क़ुरआन भाषा और संस्कृति के अंतर के बावजूद दिलों को जोड़ता है।”

उनका मानना है कि यह मंच इस्लाम की वैश्विकता का जीवंत उदाहरण है, जहां दुनिया भर से प्रतिभाएं एक ही मकसद से जुड़ती हैं—अल्लाह की किताब की सेवा।


दुबई अवॉर्ड की नई विकासात्मक दृष्टि

28वें संस्करण में अवॉर्ड ने एक नई विकासात्मक दृष्टि की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य इसे और अधिक प्रभावशाली बनाना है।

कुल पुरस्कार राशि अब 1.2 करोड़ दिरहम (Dh12 मिलियन से अधिक) कर दी गई है। आयोजकों का लक्ष्य है कि यह मंच और अधिक वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करे तथा दुबई को क़ुरआन सेवाओं का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बनाए।


युवाओं के लिए संदेश: “हिफ्ज़ मुश्किल नहीं, रूह की ग़िज़ा है”

अब्दुल्ला का संदेश बेहद प्रेरक है:
“हिफ्ज़ मुश्किल नहीं है, यह रूह की ग़िज़ा है। फज्र के बाद का समय इस्तेमाल करें, रोज एक पन्ना भी निरंतरता से पढ़ें तो महारत मिलती है। क़ुरआन सुकून का पुल है और दिलों की बहार है, जो कभी फीकी नहीं पड़ती।”


खाड़ी से वैश्विक पहचान तक

कुवैत के एक साधारण परिवार से निकले इस किशोर की कहानी सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि खाड़ी क्षेत्र में क़ुरआन शिक्षा के बढ़ते प्रभाव का प्रतीक भी है।

दुबई इंटरनेशनल होली क़ुरआन अवॉर्ड जैसे मंच इस बात को मजबूत कर रहे हैं कि धार्मिक और नैतिक शिक्षा आधुनिक प्रतिस्पर्धी दुनिया में भी प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।

अब्दुल्ला अल-बुती का सफर यह दिखाता है कि जब परिवार का सहयोग, संस्थागत मार्गदर्शन और व्यक्तिगत समर्पण एक साथ आते हैं, तो वैश्विक मंच तक पहुंचना असंभव नहीं रहता।