शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च हो : जमाअत ए इस्लामी हिन्द
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नई दिल्ली
देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं। सरकारी स्कूलों की स्थिति, शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी पर चिंता जताते हुए जमाअत ए इस्लामी हिन्द के केंद्रीय शैक्षिक बोर्ड ने शिक्षा क्षेत्र में बड़े सुधारों की मांग की है। संगठन का कहना है कि यदि देश को ज्ञान आधारित समाज बनाना है तो शिक्षा पर सरकारी निवेश बढ़ाना होगा और इसे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के कम से कम 6 प्रतिशत तक पहुंचाना होगा।
नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय ऑनलाइन सेमिनार में शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और संस्थानों के प्रमुखों ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। यह सेमिनार नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट “भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली गुणवत्ता में सुधार के लिए सामयिक विश्लेषण और नीतिगत रोडमैप” के अध्ययन के आधार पर आयोजित किया गया था।
शिक्षा का बढ़ता व्यापारीकरण चिंता का विषय
सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए मर्कज़ी तालीमी बोर्ड के अध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि शिक्षा धीरे धीरे एक सार्वजनिक अधिकार के बजाय व्यापारिक गतिविधि में बदलती जा रही है।
उन्होंने कहा कि सरकार की भूमिका लगातार सीमित होती दिखाई दे रही है जबकि निजी और कॉर्पोरेट संस्थानों की भागीदारी बढ़ रही है। इससे शिक्षा आम परिवारों की पहुंच से दूर हो सकती है।
उनके अनुसार शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद होती है। इसे केवल बाजार की शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी नागरिकों को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराए।
उन्होंने कहा कि स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक सार्वजनिक निवेश बढ़ाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की मांग
प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने केंद्र और राज्य सरकारों से शिक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की मांग की।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय से यह सुझाव दिया जाता रहा है कि शिक्षा पर जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत खर्च होना चाहिए। लेकिन भारत अभी भी इस लक्ष्य से पीछे है।
उनका मानना है कि यदि शिक्षा में पर्याप्त निवेश नहीं किया गया तो देश की मानव संसाधन क्षमता प्रभावित होगी और सामाजिक असमानताएं और बढ़ सकती हैं।
उच्च शिक्षा और शोध को भी मिले प्राथमिकता
सेमिनार में यह भी कहा गया कि केवल प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा ही नहीं बल्कि उच्च शिक्षा और शोध संस्थानों को भी पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना था कि गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालय, शोध प्रयोगशालाएं और डॉक्टरेट कार्यक्रम किसी भी विकसित राष्ट्र की पहचान होते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शोध और नवाचार के क्षेत्र में निवेश कम हुआ तो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने की जरूरत
शिक्षा के सामाजिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को शिक्षा प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो विविधता का सम्मान करे और छात्रों में लोकतांत्रिक सोच विकसित करे।
नीति आयोग की रिपोर्ट पर उठे सवाल
मर्कज़ी तालीमी बोर्ड के सचिव सैयद तनवीर अहमद ने नीति आयोग की रिपोर्ट का स्वागत करते हुए कहा कि रिपोर्ट ने कई समस्याओं की सही पहचान की है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट में समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त और स्पष्ट कार्ययोजना दिखाई नहीं देती।
उनका कहना था कि शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि उनके समाधान के लिए ठोस कदम सुझाए जाएं।
शिक्षकों पर गैर शैक्षणिक काम का बोझ
सेमिनार में शिक्षकों की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई।
सैयद तनवीर अहमद ने कहा कि देश के शिक्षक हर वर्ष औसतन 28 दिन विभिन्न सरकारी और प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं।
इन कार्यों में चुनाव ड्यूटी, सर्वेक्षण और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां शामिल होती हैं।
उन्होंने कहा कि जब शिक्षक कक्षा से बाहर रहेंगे तो छात्रों की पढ़ाई पर स्वाभाविक रूप से असर पड़ेगा।
चौंकाने वाले शैक्षिक आंकड़े
मर्कज़ी तालीमी बोर्ड के समन्वयक और शोधकर्ता जफर उल हक ने नीति आयोग के आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया।
उन्होंने बताया कि देश में लगभग 14.71 लाख स्कूल हैं। इनमें 24.69 करोड़ विद्यार्थी पढ़ते हैं और करीब एक करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं।
इतनी बड़ी व्यवस्था होने के बावजूद सीखने के स्तर को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं।
उन्होंने बताया कि तीसरी कक्षा के 27 प्रतिशत छात्र दूसरी कक्षा का सरल पाठ नहीं पढ़ सकते।
पांचवीं कक्षा के लगभग आधे छात्र भी दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ पढ़ने में कठिनाई महसूस करते हैं।
सातवीं कक्षा तक पहुंचने वाले 71 प्रतिशत छात्रों के सामने भी यही समस्या बनी रहती है।
गणित में भी कमजोर प्रदर्शन
केवल भाषा ही नहीं बल्कि गणित में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है।
प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार तीसरी कक्षा के 35 प्रतिशत छात्र भाग के सरल सवाल हल नहीं कर पाते।
पांचवीं कक्षा में यह संख्या 30 प्रतिशत है।
आठवीं कक्षा में भी 45 प्रतिशत छात्र बुनियादी भाग के प्रश्नों को हल करने में कठिनाई महसूस करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
हजारों स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव
सेमिनार में स्कूलों की आधारभूत सुविधाओं को लेकर भी चिंताजनक तस्वीर सामने आई।
बताया गया कि देश के 1 लाख 19 हजार स्कूलों में बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
करीब 14 हजार स्कूलों में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है।
लगभग 98 हजार स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं हैं।
एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
करीब 8 हजार स्कूल ऐसे भी हैं जहां कोई छात्र नामांकित नहीं है।
नई शिक्षा नीति पर व्यापक विमर्श की जरूरत
वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा सुधार केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों की व्यापक भागीदारी आवश्यक है।
उनका मानना है कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर और समावेशी संवाद होना चाहिए।
व्यापक नीति दस्तावेज तैयार करेगा बोर्ड
सेमिनार के अंत में प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने घोषणा की कि मर्कज़ी तालीमी बोर्ड विभिन्न सामाजिक और शैक्षिक संगठनों के सहयोग से शिक्षा सुधारों पर एक व्यापक नीति दस्तावेज तैयार करेगा।
इस दस्तावेज में सरकारी शिक्षा को मजबूत करने, शिक्षा में समान अवसर बढ़ाने और गुणवत्ता सुधार के लिए ठोस सुझाव शामिल किए जाएंगे।
AEO Quick Answer
सवाल: मर्कज़ी तालीमी बोर्ड ने क्या मांग की है?
जवाब: बोर्ड ने शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाकर जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत करने, सरकारी शिक्षा को मजबूत बनाने और शिक्षा के बढ़ते व्यापारीकरण को रोकने की मांग की है।
मुख्य बिंदु
मांग: शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च
चिंता: शिक्षा का बढ़ता निजीकरण और केंद्रीकरण
समस्या: स्कूलों में बिजली, पानी और शौचालय की कमी
शैक्षिक चुनौती: पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता कमजोर
सुझाव: सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जाए

