एनसीईआरटी की नई किताब में मुग़ल विलेन क्यों? इतिहासकार रुचिका शर्मा ने खोली सच्चाई
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एनसीईआरटी की नई कक्षा-8 इतिहास पुस्तक पर विवाद: ‘मुग़ल विलेन’ नैरेटिव को इतिहासकार रुचिका शर्मा की कड़ी चुनौती
मुस्लिम नाउ विशेष
एनसीईआरटी द्वारा कक्षा आठवीं के लिए प्रकाशित नई इतिहास पाठ्यपुस्तक पर विवाद गहराता जा रहा है। आलोचकों का आरोप है कि दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल को बच्चों के सामने एकतरफ़ा, सांप्रदायिक और तथ्य-दरिद्र ढंग से रखा गया है—मानो पूरा मध्यकाल केवल ‘अंधकार’, ‘बर्बरता’ और ‘मंदिर-विध्वंसक मुग़लों’ की कहानी हो। प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने तीखे विश्लेषणात्मक लेख (Mughals in NCERT Class VIII textbook: An inaccurate retelling with a communal twist) में इतिहासकार-शिक्षक डॉ. रुचिका शर्मा ने इस दृष्टिकोण की परतें उधेड़ते हुए तर्क दिया है कि यह न सिर्फ अकादमिक रूप से कमज़ोर है, बल्कि छात्रों की ऐतिहासिक समझ को खतरनाक रूप से विकृत करता है।
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शर्मा का केंद्रीय आरोप साफ़ है: पाठ्यपुस्तक ठोस शोध के स्थान पर चयनात्मक तथ्यों, ग़लत व्याख्याओं और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों पर टिकाई गई है। इतिहास को ‘हम बनाम वे’ की राजनीतिक रेखा में बाँटना आसान है; उसे जटिल, अंतःक्रियात्मक और बहुस्तरीय सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में पढ़ाना कठिन। एनसीईआरटी—जो राष्ट्रीय स्तर पर स्कूली इतिहास का आधार तैयार करती है—से अपेक्षा ‘कठिन’ कार्य करने की थी। शर्मा के मुताबिक, संस्था ने आसान लेकिन बौद्धिक रूप से आलसी रास्ता चुना है।
जज़िया को लेकर भ्रामक व्याख्या
शर्मा जिस पहली बड़ी चूक की ओर ध्यान खींचती हैं, वह है जज़िया (जज़ियाह) कर की प्रस्तुति। पाठ्यपुस्तक में इसे “सार्वजनिक अपमान” का औज़ार और गैर-मुस्लिम आबादी को इस्लाम स्वीकार करने के लिए “वित्तीय प्रलोभन” के रूप में चित्रित किया गया है। यह व्याख्या न तो मध्यकालीन भारतीय प्रशासनिक संरचना की समझ से मेल खाती है, न ही इस्लामी राजकीय परंपराओं के मूल स्रोतों से।
ऐतिहासिक रूप से जज़िया एक सुरक्षा-कर था, जो इस्लामी शासन के अंतर्गत रहने वाले वे गैर-मुस्लिम समुदाय अदा करते थे जो नियमित सैन्य सेवा से मुक्त रहते थे। शुरुआती ख़िलाफ़त काल—विशेषतः ख़लीफ़ा उमर (7वीं सदी) के समय—लेवंत, इराक, ईरान जैसे विजित प्रदेशों में यह राजस्व के साथ-साथ एक संविदात्मक राजनीतिक तंत्र का हिस्सा था: कर दीजिए, बदले में राज्य आपको ‘ज़िम्मी’ (धिम्मी) समुदाय के रूप में संरक्षण देगा। कर के भुगतान का धार्मिक परिवर्तन से कोई संस्थागत संबंध सिद्ध नहीं हुआ है; न इस्लामी विधिक साहित्य, न मध्यकालीन फ़तवों, न राजस्व अभिलेखों में इसे धर्मांतरण-उत्साहक करार दिया गया।
भारत में भी स्थिति वैसी ही जटिल रही—समय, स्थान, सुल्तानों और मुग़ल सम्राटों की नीतियों के अनुसार कर संग्रह और छूट में उतार-चढ़ाव आया; पर उसे ‘धर्म बदलो-वर्ना कर दो’ की सरल रेखीय कहानी में समेटना ऐतिहासिक रूप से अनुचित है।
अकबर और जज़िया समाप्ति की टाइमलाइन: किताब बनाम इतिहास
एनसीईआरटी की पुस्तक में दावा किया गया है कि सम्राट अकबर ने जज़िया तभी हटाया जब उसका साम्राज्य मज़बूती से स्थापित हो गया था—मानो यह कोई रणनीतिक विलंबित उदारता रही हो। शर्मा इस कथन को समय-रेखा (टाइमलाइन) से काटती हैं।
अकबर 1556 ईस्वी में पिता हुमायूँ की मृत्यु के बाद गद्दी उत्तराधिकारी बने, प्रारंभिक वर्षों में बैरम ख़ाँ के संरक्षकत्व में कार्य करते रहे, और 1560 के दशक की शुरुआत में स्वतंत्र नियंत्रण सुदृढ़ किया। जज़िया पर निर्णायक कदम उन्होंने अपेक्षाकृत जल्दी—लगभग 1563-64 ईस्वी के आसपास—उठाया, और उसे एक भेदभावकारी कर मानते हुए समाप्त कर दिया। यदि कोई पाठ्यपुस्तक इस सुधार को साम्राज्य की ‘पूर्ण स्थिरता’ के बहुत बाद की घटना बताती है, तो वह छात्रों को नीति-निर्माण की प्रक्रिया, समय और नैतिकता की समझ से वंचित कर रही है।
‘अंधकार युग’ का पुनरागमन: परित्यक्त लेबलों की वापसी
शर्मा नोट करती हैं कि नई पुस्तक सल्तनत-मुग़ल काल को निरूपित करने के लिए “इतिहास का अंधकारमय काल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है। यह दिक्कत सिर्फ़ भाषा की संवेदनशीलता भर नहीं; यह एक बौद्धिक स्लिप है। ‘डार्क एज’ शब्दावली यूरोपीय इतिहास-लेखन की प्रारंभिक सीमाओं से जन्मी—जहाँ लिखित स्रोतों की कमी, राजनीतिक विघटन और सांस्कृतिक पतन की अतिशयोक्त छवि ने प्रारंभिक मध्य युग को अंधकार में धकेल दिया। समकालीन इतिहासलेखन ने इस सरलीकरण को दशकों पहले खारिज कर दिया है। इसे भारतीय मध्यकाल पर चस्पां कर देना छात्रों को यह संकेत देता है कि लगभग पाँच-सात सौ वर्षों का बहु-धार्मिक, स्थापत्य, साहित्यिक, प्रशासनिक और तकनीकी उत्कर्ष किसी ‘गिरावट’ का दौर था। यह न केवल भ्रामक बल्कि बौद्धिक रूप से दिशाहीन करना है।
‘क्रूर’ का चयनात्मक लेबल और युद्ध की सामान्यीकृत हिंसा
किताब में अकबर के शासन को “क्रूरता और सहिष्णुता के मिश्रण” के रूप में वर्णित किया गया है, और 1567 की चित्तौड़ घेराबंदी—जहाँ कथित रूप से 30,000 नागरिक मारे गए—को आधार बनाकर उन्हें ‘क्रूर’ कहा गया। शर्मा पूछती हैं: क्या इतिहास में हिंसक घेराबंदी और नागरिक क्षति केवल मुग़ल शासन की विशेषता थी? यदि नहीं, तो फिर लेबलिंग केवल यहाँ क्यों?
उदाहरण के तौर पर वह चोल सम्राट राजेन्द्र चोल (11वीं सदी) के अभिलेखीय साक्ष्य उद्धृत करती हैं। 1042 ईस्वी के एक अभिलेख में चालुक्यों पर विजय का वर्णन करते हुए कोल्लिपक्कई नगर के राख में बदल जाने और जैन मंदिरों के विनाश का उल्लेख है। करंदई प्रशस्ति में चालुक्य राजधानी मान्यखेत को जला दिए जाने तथा स्त्री-शिशुओं सहित भारी जनहानि का वर्णन मिलता है। फिर भी, इन घटनाओं के बावजूद स्कूली पाठ्यपुस्तकों में राजेन्द्र चोल को ‘क्रूर’ ठप्पा नहीं दिया गया। समस्या हिंसा को पढ़ाने में नहीं; समस्या चयनात्मक नैतिकता से नैरेटिव गढ़ने में है।
मंदिर-विध्वंस: मुग़लों तक सीमित क्यों?
सबसे संवेदनशील और अक्सर राजनीतिक रूप से गरमाया हुआ प्रश्न—मंदिर-विध्वंस—पर भी पुस्तक एकतरफ़ा है, शर्मा कहती हैं। कक्षा-8 की पुस्तक इसे लगभग पूरी तरह सल्तनत-मुग़ल काल से जोड़ती है, मानो मंदिरों पर आक्रमण, लूट या पुनर्निर्माण का इतिहास भारत में इस्लामी शासन के साथ ही शुरू हुआ हो।
जबकि पूर्व-मुग़ल काल में भी अनेक उदाहरण मिलते हैं:
- कश्मीर के राजा हर्ष (11वीं सदी): कल्हण की राजतरंगिणी में उल्लेख है कि हर्ष ने दो को छोड़कर अधिकांश मंदिरों को लूट-तोड़े जाने दिया।
- कर्नाटक में वीरशैव आन्दोलन (12वीं-13वीं सदी): अनेक जैन बसडियाँ और मंदिर तोड़े गए या रूपांतरित हुए।
- क्षेमगुप्त, मिहिरकुल, पुष्यमित्र शुंग इत्यादि शासक: विभिन्न कालखंडों में बौद्ध विहारों पर आक्रमण, लूट या दमन की परंपराएँ दर्ज हैं; कई विहार ध्वस्त हुए जहाँ बाद में ब्राह्मणical या अन्य संप्रदायों के धार्मिक ढाँचे उभरे।
इतिहास में मंदिरों का विध्वंस, पुनर्निर्माण, दान, संरक्षण और राजनीतिक वैधता अर्जित करने के औज़ार के रूप में उपयोग—ये सभी प्रक्रियाएँ बहुधा आपस में उलझी रहती थीं। यदि पाठ्यपुस्तक का दावा है कि वह “पूर्वाग्रहों से मुक्त” संशोधित संस्करण है, तो उसे व्यापक सांस्कृतिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में मंदिर-आधारित राजनीति के बहुधर्मी इतिहास को भी शामिल करना चाहिए था। चयनात्मक प्रस्तुति विद्यार्थियों के मन में यह धारणा जमाती है कि धार्मिक असहिष्णुता ‘एकतरफ़ा’ थी—जो तथ्यात्मक रूप से अपूर्ण और वैचारिक रूप से खतरनाक है।
व्यापक परिप्रेक्ष्य: केवल इतिहास नहीं, राजनीति विज्ञान में भी कटौती
रुचिका शर्मा इंगित करती हैं कि यह संकट केवल कक्षा-8 इतिहास पुस्तक तक सीमित नहीं है। हालिया संशोधनों में कक्षा 11 और 12 की राजनीति विज्ञान की पुस्तकों से भी महत्वपूर्ण समकालीन घटनाओं—बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992), बॉम्बे दंगे (1992-93), और गुजरात दंगे (2002)—के संदर्भ हटा दिए गए हैं। आधिकारिक तर्क: “सकारात्मक नागरिकता” को प्रोत्साहन। किंतु यदि ‘सकारात्मकता’ का अर्थ कठिन, विवादास्पद और साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील ऐतिहासिक सच्चाइयों से छात्रों को दूर रखना है, तो परिणाम ठीक उलटा होगा—छात्र आधी-अधूरी सूचनाओं के सहारे ध्रुवीकृत दृष्टिकोण गढ़ेंगे, आलोचनात्मक सोच कुंठित होगी, और लोकतांत्रिक विमर्श में तथ्य की जगह अफ़वाह, इतिहास की जगह मिथक लेंगे।
इतिहास पढ़ाने का उद्देश्य: असुविधाजनक प्रश्नों से बचना या उनका सामना करना?
स्कूल का इतिहास बच्चों को ‘हीरो बनाम विलेन’ की कहानी सुनाने का मंच नहीं; यह उन्हें अतीत के साथ संवाद की क्षमता देता है। सत्ता, धर्म, भाषा, अर्थव्यवस्था, लिंग, पर्यावरण—इन सब पर इतिहास की परतें चढ़ी हैं। जब हम छात्रों से कठिन प्रश्न छीन लेते हैं—क्यों कर वसूले जाते थे? मंदिर क्यों तोड़े या बदले गए? धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ राजसत्ता का व्यवहार कैसा था?—तो हम उन्हें लोकतांत्रिक नागरिकता के लिए तैयार नहीं कर रहे होते, बल्कि किसी प्रचार-यंत्र के लिए तैयार कर रहे होते हैं।
रुचिका शर्मा का हस्तक्षेप इसीलिए महत्वपूर्ण है कि वह विवाद को भावनात्मक शोर से उठाकर बौद्धिक विमर्श में लाती है। वह न तो मुग़लों को देवत्व देती हैं, न किसी अन्य राजवंश को खलनायक; वह बस इतना कहती हैं कि इतिहास जटिल है—और कक्षा आठ के बच्चों को यह जटिलता सीखने का अधिकार है।
आधा इतिहास, आधी नागरिकता
यदि एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें छात्रों को आलोचनात्मक रूप से सोचना, स्रोतों की जाँच करना, और बहु-दृष्टिकोण से अतीत को समझना नहीं सिखातीं, तो ‘सकारात्मक नागरिकता’ का दावा खोखला रह जाएगा। इतिहास का काम भावनाओं को भड़काना नहीं; संदर्भ देना है। जब हम संदर्भ काटते हैं, तो खाली जगह में पूर्वाग्रह उगते हैं।
शिक्षा प्रणालियाँ सभ्यताओं का दीर्घकालिक निवेश होती हैं। आज जो हम कक्षा आठ के छात्र को बताएँगे, वही कल की लोकतांत्रिक बहस, नीतिनिर्माण और सामाजिक सह-अस्तित्व का आधार बनेगा। इसलिए पाठ्यपुस्तक में हर तथ्य, हर चूक, हर लेबल—महत्त्वपूर्ण है।
रुचिका शर्मा और उनके जैसे इतिहासकारों की आवाज़ हमें यही याद दिलाती है: इतिहास को सरल करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन उसे विकृत करने की कीमत लोकतंत्र चुकाता है।

लेखक परिचय: डॉ. रुचिका शर्मा दिल्ली स्थित इतिहासकार और प्रोफ़ेसर हैं। वे भारतीय इतिहास पर केंद्रित अपने यूट्यूब चैनल EyeShadow & Ethishaas (आइशैडो एंड एतिहास) के माध्यम से लोकप्रिय इतिहास संवाद चलाती हैं। अकादमिक शोध और जनसंवाद के बीच सेतु बनाने के उनके प्रयासों ने उन्हें इतिहास की लोकप्रिय व्याख्याओं पर एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक बुद्धिजीवी बना दिया है।

