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मुंबई ट्रेन ब्लास्ट 2006 – जमाअत-ए-इस्लामी हिंद का बयान: निर्दोषों को न्याय और असली दोषियों की तलाश जरूरी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो,नई दिल्ली

मुंबई ट्रेन विस्फोट (11 जुलाई 2006) मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सभी 12 आरोपियों को बरी किए जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती देने के निर्णय की कड़ी आलोचना जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (JIH) के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने की है। उन्होंने कहा कि 7/11 ट्रेन ब्लास्ट के असली अपराधियों को पकड़ने और निर्दोषों को न्याय दिलाने पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, न कि हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ अपील करने पर।

19 साल बाद बरी – न्याय प्रणाली पर सवाल

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को 2015 में दी गई दोषसिद्धि को पलटते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों को दोषी साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने जांच एजेंसियों की गंभीर चूकों, कमजोर साक्ष्यों और जबरन लिए गए बयानों पर तीखी टिप्पणियां कीं। इस फैसले ने देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की खामियों को उजागर कर दिया है।

जमाअत उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने मीडिया को जारी बयान में कहा,
“हम बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। 12 निर्दोष व्यक्तियों को लगभग दो दशक तक जेल में सड़ाना हमारे न्याय तंत्र की एक काली सच्चाई है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि अभियोजन पक्ष साक्ष्यों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। महाराष्ट्र एटीएस न केवल बमों के प्रकार जैसी बुनियादी बातों की पहचान में विफल रही, बल्कि संदिग्ध गवाहों और गलत तरीके से संभाले गए साक्ष्यों पर भरोसा किया। यह केवल एटीएस की विफलता नहीं, बल्कि पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली की सामूहिक नाकामी है।”

निर्दोषों के लिए मुआवज़े की मांग

मोतसिम खान ने कहा कि इन निर्दोष लोगों ने 19 साल की कैद, उत्पीड़न और सामाजिक कलंक झेला है। उनके परिवारों की ज़िंदगी बर्बाद हो गई। उन्होंने कहा,
“ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र सरकार को चाहिए कि वह अपने संसाधन असली दोषियों को पकड़ने और पीड़ितों व बरी हुए निर्दोषों को न्याय देने में लगाए। लेकिन सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील करके अदालत के निष्कर्षों की अवहेलना कर रही है।”

उन्होंने आगे कहा,
“7/11 के हमले में 11 मिनट के भीतर 7 धमाकों ने 189 निर्दोषों की जान ले ली थी और 800 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह देश के इतिहास की सबसे दर्दनाक आतंकी घटनाओं में से एक थी। 19 साल बाद भी असली अपराधी आज़ाद घूम रहे हैं, जो हमारे सुरक्षा तंत्र और जांच एजेंसियों की बड़ी असफलता है।”

पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की मांग

जमाअत उपाध्यक्ष ने महाराष्ट्र सरकार से अपील करते हुए कहा,
“हमारे लिए 7/11 ब्लास्ट में शहीद हुए और घायल लोगों के परिवारों को न्याय दिलाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। बॉम्बे हाईकोर्ट के 671 पन्नों के फैसले में साफ कहा गया है कि अभियोजन पक्ष दोष साबित नहीं कर पाया। ऐसे में सवाल यह है कि इस जघन्य अपराध के पीछे असली हाथ किसका था? सरकार को इस पर गहन पुनःजांच करनी चाहिए और दोषियों को न्याय के कटघरे में लाना चाहिए।”

जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय हो

मोतसिम खान ने कहा कि इस मामले ने हमारे जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कहा,
“अगर निर्दोषों को 19 साल बाद बरी किया जा रहा है, तो यह आतंकवाद मामलों की जांच में बार-बार हो रही विफलताओं की पोल खोलता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह की चूक दोबारा न हो। सरकार को तुरंत बरी हुए निर्दोषों को मुआवज़ा देना चाहिए और जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए।”

सरकार को क्या करना चाहिए?

  • सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के बजाय नई जांच एजेंसी द्वारा केस की गहन पुनःजांच हो।
  • बरी हुए निर्दोषों और उनके परिवारों को मुआवज़ा दिया जाए।
  • 7/11 विस्फोट में मारे गए और घायल लोगों के पीड़ित परिवारों के लिए न्याय सुनिश्चित किया जाए।
  • जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय की जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।