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अगर मुसलमान होता तो मार दिया जाता: सुमित अवस्थी ने सुनाया 2002 गुजरात दंगों का भयावह अनुभव

मुस्लिम नाउ विशेष

वरिष्ठ पत्रकार सुमित अवस्थी ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में गुजरात दंगों से जुड़ा एक दिल दहला देने वाला अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे दंगों की रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें भीड़ ने घेर लिया और कपड़े उतरवाकर यह देखने की कोशिश की गई कि वे हिंदू हैं या मुसलमान।

अवस्थी ने बताया कि वे कार में रिपोर्टिंग कर रहे थे, जब अचानक स्टील के भगोनों में पत्थर रखकर हमला किया गया। उनके साथ आए अन्य पत्रकारों को भी रोका गया और सभी को निर्वस्त्र किया गया। उन्होंने कहा, “अगर हम में से कोई मुसलमान होता तो शायद उस दिन उसकी जान नहीं बचती।” यह अनुभव उन्हें भारत की सेक्युलर छवि पर सोचने को मजबूर कर गया।

यह बयान सिर्फ एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि 2002 के गुजरात दंगों की भयावहता का प्रमाण है, जिसे अब तक पूरी तरह न्याय नहीं मिल पाया।

इससे पहले सुमित अवस्थी बहुत साफगोई से एक पाॅडकाॅस्ट में बता चुके हैं कि गोदी मीडिया क्यों बदनाम है. उनका कहना है कि 80 प्रतिशत विज्ञापन सरकार से मिलता है. यदि उनके पक्ष में बात नहीं कही जाएगी तो विज्ञापन बंद हो जाएगा और चैनल पर ताला लग जाएगा.


सुप्रीम कोर्ट और एसआईटी की जांच पर सवाल

2022 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य को 2002 दंगों में आपराधिक साजिश के आरोपों से मुक्त कर दिया। कोर्ट के फैसले के बाद तीस्ता सीतलवाड़ और गुजरात पुलिस के पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार किया गया।

27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी में आग लगने से 59 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे। लाखों विस्थापित हुए।

दंगों के दौरान कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की हत्या कर दी गई। उनकी पत्नी जाकिया जाफरी ने मोदी और 63 अन्य लोगों पर आपराधिक साजिश का आरोप लगाया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी गठित की, जिसने 2012 में मोदी को क्लीन चिट दे दी।

जाकिया जाफरी की ओर से 2013 और 2018 में दोबारा याचिकाएं दायर की गईं, जिन्हें कोर्ट ने 2022 में खारिज कर दिया। कोर्ट ने एसआईटी के काम को “थोरो” और “विश्लेषणात्मक” बताया।


एसआईटी की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियाँ

हालाँकि, एसआईटी की रिपोर्ट पर कई गंभीर सवाल उठे हैं। पुलिस अधिकारी राहुल शर्मा ने खुलासा किया कि तत्कालीन गृहमंत्री गोर्धन ज़डाफिया ने उनसे कहा था कि “पुलिस फायरिंग में हिंदुओं की मौत ज्यादा हुई”, जिससे सत्ता पक्ष की मानसिकता का संकेत मिलता है।

राहुल शर्मा ने यह भी बताया कि दंगों के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों को स्थानीय नेताओं ने छुड़वाने का प्रयास किया, और उनके इनकार के बाद उनका तबादला कर दिया गया।

एसआईटी ने इन तथ्यों को गहराई से जांचने के बजाय सरसरी तौर पर खारिज कर दिया। रिपोर्ट में बार-बार राज्य के उन अधिकारियों पर भरोसा किया गया जो खुद हिंसा को रोकने में विफल रहे थे।


जयदीप पटेल और शवों की सुपुर्दगी

गोधरा में मारे गए कारसेवकों के शवों को विश्व हिंदू परिषद के नेता जयदीप पटेल को सौंप दिया गया था। पटेल ने इन शवों को अहमदाबाद ले जाकर सामूहिक अंतिम संस्कार का आयोजन किया, जिससे सांप्रदायिक तनाव और भड़क गया। कॉल डिटेल्स से स्पष्ट है कि पटेल और ज़डाफिया के बीच उस दिन लगातार संपर्क बना रहा।

इस पर एसआईटी ने भी तथ्य संकलित किए लेकिन उसे संदेहास्पद नहीं माना, जबकि एक संवेदनशील स्थिति में एक पक्षपाती संस्था को शव सौंपना कानून-व्यवस्था के लिहाज़ से ग़ैर-जिम्मेदाराना था।


श्रीकुमार और भट्ट की गवाही को खारिज करना

पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार ने बताया कि उन्होंने सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कई रिकॉर्डिंग और सबूत जुटाए थे, जिन्हें उन्होंने बाद में आयोग के सामने प्रस्तुत किया। एसआईटी ने उनके इरादों पर शक जताते हुए कहा कि वह “पदोन्नति न मिलने” से प्रेरित थे।

इसी तरह संजीव भट्ट की गवाही को भी खारिज कर दिया गया, जो दावा करते थे कि 27 फरवरी को मोदी की उपस्थिति में एक बैठक में हिंसा को नजरअंदाज करने का फैसला हुआ था। चौंकाने वाली बात यह है कि एसआईटी ने श्रीकुमार की गवाही भट्ट के खिलाफ तो मानी, पर जब वह सरकार के खिलाफ बोलते हैं तो उन्हें अविश्वसनीय बताया।


दो दशक बाद भी अधूरा न्याय

1984 के सिख विरोधी दंगों की तरह 2002 के गुजरात दंगों में भी जांच आयोगों की रिपोर्ट और उनके निष्कर्षों में भारी अंतर देखा गया। कई बार गवाहों के बयान और निष्कर्ष एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

गुजरात दंगों के दौरान पुलिस की निष्क्रियता, हिंसा में सहयोग और अल्पसंख्यकों के खिलाफ पूर्वाग्रह के बावजूद किसी भी वरिष्ठ अधिकारी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया।

विडंबना यह है कि जो अधिकारी पुलिस और सरकार की विफलता को उजागर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें ही दंडित किया जाता है। संजीव भट्ट और तीस्ता सीतलवाड़ जेल में हैं, जबकि हिंसा के दौरान लापरवाह रहे अधिकारी खुले में घूम रहे हैं।


निष्कर्ष

यह सिर्फ गुजरात या 2002 की बात नहीं है। यह हमारे लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और सेक्युलर ढांचे पर एक गहरा सवाल है। क्या हम अब उस दौर में पहुँच गए हैं जहाँ अन्याय पर सवाल उठाना भी अपराध बन गया है?

जब पत्रकार, पुलिस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता – जो सिर्फ सच सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं – को दंडित किया जाता है, तो यह न्याय नहीं बल्कि एक व्यवस्थित दमन है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।