बहिष्कार ट्रोल आर्मी मात खा गई, मालदीव को मोदी का 4,850 करोड़ का तोहफा
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मालदीव पर ‘बहिष्कार’ करने वाले अब क्या कहेंगे?
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
कुछ महीने पहले तक जिन सोशल मीडिया योद्धाओं और कथित राष्ट्रवादियों ने मालदीव के खिलाफ आंधी चला दी थी — वो अब क्या कहेंगे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मालदीव में बैठकर सहयोग और साझेदारी के गीत गा रहे हैं?
जिन्होंने मालदीव के नेता उज हुसैन मोहम्मद लतीफ के पुराने बयान की आड़ में “मालदीव टूरिज्म का बहिष्कार करो” जैसे ट्रेंड चलाए, उन्हें अब ज़रा ठहरकर सोचना चाहिए। दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी दो दिवसीय दौरे पर मालदीव पहुंचे, जहां उन्होंने न सिर्फ उपराष्ट्रपति लतीफ से मुलाकात की, बल्कि कई समझौतों और सहयोग कार्यक्रमों को भी आगे बढ़ाया।
इस सबके बीच उन अंधभक्तों की हालत देखने लायक है, जो अभी तक यही समझ रहे थे कि भारत ने मालदीव को ‘सबक’ सिखा दिया। उन्हें अब यह झटका बर्दाश्त करना होगा कि प्रधानमंत्री ने खुद वही हाथ थामा है, जिसे उन्होंने “राष्ट्रविरोधी” करार दे रखा था।
विदेश नीति की ‘लचीली’ रीढ़
प्रधानमंत्री मोदी ने मालदीव के नेताओं से मुलाकात कर “साझा मूल्यों” और “पड़ोसी प्रथम नीति” की दुहाई दी। उन्होंने कहा, “भारत और मालदीव बुनियादी ढांचे, प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं।” लेकिन क्या यही बात वे अंधभक्तों को समझा पाएंगे, जो ट्रोल आर्मी बनकर ट्विटर पर मालदीव को “रद्दी देश” तक कहने लगे थे?
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम भारतीय विदेश नीति की विडंबनाओं की झलक देता है। एक ओर सरकार ‘राष्ट्र की अस्मिता’ के नाम पर कठोर भाषा बोलती है, दूसरी ओर वही सरकार चुपचाप पीछे के दरवाज़े से रिश्तों की मरम्मत भी करती है — बिना यह बताए कि पहले इतना तमाशा क्यों खड़ा किया गया?
बहिष्कार ब्रिगेड की हार
मालदीव की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने संसद अध्यक्ष, उपराष्ट्रपति, विपक्षी नेताओं और प्रवासी भारतीयों से मुलाकात कर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत और मालदीव के रिश्ते सामान्य नहीं, बल्कि “गहरे और विशेष” हैं। अब सवाल यह उठता है — क्या ट्विटर और व्हाट्सएप के बहिष्कार-योद्धाओं की कोई हैसियत विदेश नीति निर्धारण में है?
जिन लोगों ने “Goa > Maldives” जैसे नारे गढ़े, क्या वे अब यह भी कहेंगे कि “Modi > Their Own Slogans”? इस तरह की अंधभक्ति, जिसमें हर सरकारी यू-टर्न को भी “रणनीतिक चातुर्य” बता दिया जाता है, क्या राष्ट्रहित को नुकसान नहीं पहुंचा रही?
भक्तों कैसे लग रहा है??? #maldivesindia pic.twitter.com/21PTjNCmfA
— Zubair (@Zubair99778) July 25, 2025
राष्ट्रवाद का वॉलपेपर, कॉरपोरेट का एजेंडा?
मालदीव को लेकर जितना शोर मचाया गया, उसमें कितनी जनता की समझ और कितनी कॉरपोरेट लॉबी की साजिशें थीं? अब प्रधानमंत्री खुद 4,850 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा दे आए हैं, तो क्या यह जनता का पैसा नहीं है, जो “मित्र देशों” के नाम पर बांटा जा रहा है?
अंधभक्तों को यह सवाल भी पूछना चाहिए:
- जब मालदीव की आलोचना हो रही थी, तब सरकार खामोश क्यों थी?
- अगर मालदीव की नीति या बयान सही नहीं थे, तो आज फिर से रिश्ते क्यों जोड़े जा रहे हैं?
- क्या यह भ्रम फैलाया गया था ताकि घरेलू राजनीति में ‘राष्ट्रवादी उबाल’ पैदा किया जा सके?
प्रवासियों पर गर्व, लेकिन आलोचकों पर वार?
प्रधानमंत्री ने प्रवासी भारतीयों की सराहना करते हुए कहा कि वे “भारत और दुनिया के बीच मजबूत पुल हैं।” लेकिन सवाल उठता है कि जब यही प्रवासी भारत सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हैं — जैसे खालिस्तान, मानवाधिकार या गाजा पर — तो उन्हें “टुकड़े-टुकड़े गैंग” क्यों करार दिया जाता है?
क्या यह दोहरी मानसिकता नहीं है — विदेश में बैठा आलोचक देशद्रोही और विदेश में बैठा समर्थक ‘राष्ट्र गौरव’?
ރައީސުލްޖުމްހޫރިއްޔާ އާއި އިންޑިއާގެ ބޮޑުވަޒީރު ގުޅިފައިވާ ބަޔާން ދެއްވުން#MaldivesIndia
— Humandust (@Humandust___) July 25, 2025
pic.twitter.com/D4K07efKBe
निष्कर्ष: राष्ट्रवाद का नया पाठ
मालदीव प्रकरण हमें यही सिखाता है कि भारत में राष्ट्रवाद अब भावनाओं का खेल बन चुका है। कुछ लोग जोश में बहकर जो नारे लगाते हैं, सरकार उन्हीं लोगों की आंखों में धूल झोंककर वही मुल्कों से रिश्ते मजबूत करती है।
अब जरूरत है जागरूक नागरिक बनने की — न कि अंधभक्त या मौन दर्शक बनने की। बहिष्कार, ट्रेंड, गाली-गलौज की राजनीति को छोड़कर हमें नीति, विवेक और सवाल पूछने के हक की तरफ लौटना चाहिए।
वरना अगली बार सरकार जिस मुल्क से “पार्टी” करेगी, वहां का बहिष्कार शायद हमसे पहले ही खत्म हो चुका होगा — और हमें पता भी नहीं चलेगा।

