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मुस्लिम संगठनों के बयानबाजी से आगे क्यों नहीं बढ़ता गाज़ा पर समर्थन? — एक सख्त लेकिन ज़रूरी पड़ताल

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

भारत के नामी मुस्लिम धार्मिक संगठनों और नेताओं ने हाल ही में गाज़ा में इज़रायली कार्रवाई के खिलाफ एक संयुक्त बयान जारी कर पूरी दुनिया का ध्यान इस त्रासदी की ओर खींचने का प्रयास किया है। इस बयान में उन्होंने गाज़ा में हो रहे “नरसंहार” की निंदा की है और भारत सरकार से लेकर वैश्विक शक्तियों तक से हस्तक्षेप की मांग की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ बयान जारी करने से अंतरराष्ट्रीय जमीनी हालात बदल सकते हैं? क्या इन संगठनों की भूमिका एक संवेदनशील मुद्दे पर सिर्फ़ “प्रतिक्रिया देने” तक ही सीमित रहनी चाहिए?

यह पहला अवसर नहीं है जब भारतीय मुस्लिम संगठनों ने गाज़ा को लेकर चिंता व्यक्त की हो। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने वही पुराना ढर्रा अपनाया — एक प्रेस नोट, कुछ मीडिया बाइट्स, कुछ सोशल मीडिया पोस्ट, और अंत में चुप्पी। इस बार भी यही हुआ। बयान जारी किया गया, गाज़ा के लोगों के साथ एकजुटता दिखाई गई, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कुछ भी ठोस कदम उठाते नहीं दिखे।

गाज़ा पर बयान: नीयत या दिखावा?

सवाल सीधा है — अगर इन नेताओं और संगठनों को गाज़ा की स्थिति पर सचमुच चिंता है, तो क्या उन्होंने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से औपचारिक मुलाकात की? क्या उन्होंने किसी उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल को प्रधानमंत्री कार्यालय या राष्ट्रपति भवन भेजा? क्या उन्होंने संसद में इस मुद्दे को उठवाने के लिए मुस्लिम या सेकुलर सांसदों से संपर्क साधा?

उत्तर है – नहीं।

ऐसे में यह बयानबाजी केवल “दिखावे की हमदर्दी” नहीं तो और क्या है? क्या यह सच नहीं कि यदि भारतीय मुस्लिम समाज गाज़ा पर अपने रुख को लेकर गंभीर होता, तो वह इज़रायली राजदूत से मिलकर अपनी बात रखता? दिल्ली में अरब देशों के दर्जनों दूतावास हैं। क्या किसी संगठन ने उनसे मिलकर इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की कोशिश की?

क्या डर है अरब देशों से?

यह तथ्य छिपा नहीं है कि भारत के कई मुस्लिम संगठन खाड़ी और अन्य मुस्लिम देशों से चंदा और समर्थन प्राप्त करते हैं। क्या इसीलिए वे इन देशों पर दबाव डालने से कतराते हैं? गाज़ा के मुद्दे पर यदि ओआईसी (Organization of Islamic Cooperation) और अरब देश एकजुट होकर कड़ा रुख अपनाएं तो शायद स्थिति कुछ हद तक नियंत्रित की जा सकती है। परंतु दुखद यह है कि भारतीय मुस्लिम संगठन इस मोर्चे पर एकदम मौन हैं।

क्या इन्हें डर है कि अरब देशों से आर्थिक मदद बंद हो जाएगी? यदि ऐसा है, तो यह खतरनाक संकेत है — इससे पता चलता है कि नीतिगत और मानवीय मुद्दों पर भी निर्णय आर्थिक स्वार्थ से निर्देशित हो रहे हैं।

एकजुटता की अपील, लेकिन ज़मीनी निष्क्रियता

संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत सरकार को अपनी ऐतिहासिक परंपरा का पालन करते हुए फ़िलिस्तीन के साथ खड़ा होना चाहिए। लेकिन यह मांग खुद तभी प्रभावी बनती जब बयान देने वाले खुद कोई ठोस कार्रवाई कर उदाहरण प्रस्तुत करते।

क्या इस संयुक्त घोषणापत्र को किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भेजा गया? क्या इसे संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, या OIC जैसी वैश्विक संस्थाओं को सौंपा गया? क्या इसमें भारत के नागरिकों से किसी राष्ट्रीय स्तर के शांतिपूर्ण प्रदर्शन, अकादमिक संगोष्ठियों या जनजागृति अभियानों की स्पष्ट रणनीति शामिल थी?

स्पष्ट उत्तर फिर वही — नहीं।

नाम बड़े, लेकिन काम?

बयान पर जिन प्रमुख धार्मिक नेताओं और संगठनों के हस्ताक्षर हैं, वे भारत में मुस्लिम समाज की आवाज़ माने जाते हैं — मौलाना अरशद मदनी, मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी, सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी, डॉ. ज़फरुल इस्लाम खान और अन्य। लेकिन सवाल है, इतने प्रभावशाली व्यक्तित्वों के होते हुए भी भारतीय मुस्लिम समाज एक नीतिगत दिशा तय क्यों नहीं कर पाता?

बयान में लिखा गया है कि “हम भारत सरकार से मानवीय गलियारे खोलने की मांग करते हैं।” लेकिन क्या यही मांग संयुक्त अरब अमीरात या सऊदी अरब से भी की गई? क्या इन नेताओं ने OIC से अपील की कि वह इज़रायल पर दबाव बनाएं?

इस संयुक्त बयान में गाज़ा की त्रासदी को गिनाया गया, बच्चों के अनाथ होने, अस्पतालों के ध्वस्त होने, राशन की किल्लत की बात की गई — जो सत्य है — लेकिन समाधान पर गंभीरता और सक्रियता की झलक नहीं मिलती।

क्या विरोध अब केवल ट्विटर तक सीमित है?

आज के दौर में सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम है। लेकिन जब ऐसे गंभीर मानवीय संकट सामने हों, तो प्रतिक्रिया केवल हैशटैग्स तक सीमित रह जाना खतरनाक है। क्या ये संगठन ट्विटर पर बयान पोस्ट कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं? क्या धर्मगुरु केवल बयान जारी कर सच्ची सेवा समझते हैं?

बयान में एक जगह लिखा गया है:
“नरसंहार के सामने चुप रहना या तटस्थ रहना कूटनीति नहीं है – यह न्याय को कायम रखने में विफलता है।”
तो फिर चुप रहने की बजाय क्या गाज़ा को लेकर एक अखिल भारतीय जन आंदोलन शुरू नहीं किया जाना चाहिए?

सुझाव नहीं, कठोर आत्मनिरीक्षण चाहिए

भारत के मुस्लिम संगठनों को अब केवल बयानबाजी से आगे निकलना होगा। उन्हें केवल इज़रायल की आलोचना करके अपने नैतिक धर्म का निर्वहन नहीं समझना चाहिए, बल्कि उन्हें व्यावहारिक, राजनीतिक और कूटनीतिक रास्तों को भी अपनाना चाहिए। जनता को केवल जानकारी नहीं, नेतृत्व चाहिए।

यदि यही संगठन मिलकर सरकार के साथ बैठें, अरब देशों से संपर्क साधें, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपील करें और जनजागरण करें — तो शायद गाज़ा के लिए उनका समर्थन “प्रतिक्रिया” नहीं, “प्रेरणा” बन सकता है।

निष्कर्ष

गाज़ा का संकट केवल एक धार्मिक या भौगोलिक मुद्दा नहीं, यह एक मानवीय आपदा है। भारत के मुस्लिम संगठनों की भूमिका, अगर सही मायनों में संवेदनशील और ईमानदार है, तो उन्हें अब नारे नहीं, नतीजे देने होंगे। नहीं तो यह सवाल हमेशा बना रहेगा — क्या गाज़ा के नाम पर सिर्फ़ ‘सियासी इमोशन’ बेचे जा रहे हैं?

अब वक्त है कि इन संगठनों को सिर्फ़ आवाज़ नहीं उठानी चाहिए, बल्कि वह राह दिखानी चाहिए जो बदलाव लाए — एकजुटता की नहीं, नेतृत्व की।