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चुनाव आयोग बना ‘पार्टी विशेष’ का विभाग? मकान नंबर 107 बना लोकतंत्र का मज़ाक!

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, पटना

बिहार की सियासत में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक और चिंताजनक संकेत है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह पार्टी, जो खुद को अकेले बहुमत लाने का सपना दिखा रही थी, अब बौखलाहट में लोकतंत्र की जड़ों पर ही चोट करने पर आमादा है। पहले तो समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशें की गईं, लेकिन बिहार की ज़मीन—जहां वामपंथ, समाजवाद और सेक्युलरिज़्म की गहरी जड़ें हैं—पर यह एजेंडा फेल हो गया।

इसके बाद आई फूट डालो और राज करो की नीति। जब ये चाल भी न चली तो अब सत्ता की ताकत के दम पर चुनाव आयोग को ‘अपने हिसाब’ से काम करने पर मजबूर करने की कोशिशें हो रही हैं।

अब नया खेल क्या है?
एक खास वर्ग—ख़ासकर राजद समर्थक समुदाय—के वोटर कार्ड रद्द करने की साज़िश चल रही है। वहीं दूसरी ओर, एक पार्टी विशेष के समर्थकों के घरों में वोटरों की बाढ़ आ गई है। मकान संख्या 107 इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है, जहां एक ही पते पर दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों वोटर दर्ज हैं। ब्लॉगर और वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने जब इस धांधली का खुलासा किया, तो सत्ता पक्ष ने उनके ख़िलाफ़ ही मुकदमा दर्ज कर दिया।

राजद नेता तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर इस फर्ज़ीवाड़े से जुड़े कई पुख़्ता सबूत सार्वजनिक किए हैं। उन्होंने तंज कसते हुए लिखा:

“मकान नंबर 107 को चुनाव आयोग ज़िला क्यों नहीं घोषित कर देता?”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि SIR (Special Intensive Revision) के तहत हुए इस ‘पुनरीक्षण’ का मकसद पूरी तरह पक्षपातपूर्ण था, ताकि भाजपा से जुड़े अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद लाभ दिया जा सके।

तेजस्वी यादव की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली:


@Bahujan_Hiteshi ने लिखा:

“ये सीधा-सीधा मतदाता सूची के साथ खिलवाड़ है, और इसकी गंध साफ़-साफ़ चुनावी साज़िश की ओर इशारा करती है।”

@Yatharthwadi ने मांग की:

“आपलोग चुनाव का बहिष्कार कीजिए।”

@BihariSarpanch ने कहा:

“जब ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत न हो, तो आप लोकतंत्र के पहरेदार नहीं, सत्ता के ठेकेदार बन जाते हैं।”


लेकिन सत्ता समर्थकों ने भी इसपर प्रतिक्रियाएं दीं, जिनमें तेजस्वी यादव के निजी जीवन से लेकर मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया तक का मज़ाक बनाया गया।

@sugam__x ने एक कथित मतदाता की उम्र और फोटो साझा करते हुए तंज कसा:

“410 नंबर पर चचा की उम्र और फोटो देखिए 😂”

@niteshbhu001 ने मीडिया की चुप्पी पर सवाल उठाया:

“सरकारी पत्रकार ज़बाब देंगे नहीं”

@DilipMali69875 ने अफसरों की योग्यता पर सवाल उठाया:

“लगता है अधिकारी 9वीं फेल है”


इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि बिहार चुनाव में इस बार निष्पक्षता खतरे में है।
जब चुनाव आयोग पर भरोसा टूटता है, तो लोकतंत्र केवल काग़ज़ पर रह जाता है। एक मकान में डेढ़ सौ वोटर हों या मतदाता सूची से वंचित करने की साज़िश—यह सब भारत की लोकतांत्रिक साख पर सीधा हमला है।

अब सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र ‘मकान नंबर 107’ में ही सिमट कर रह जाएगा?