Muslim World

ग़ज़ा के मलबे पर खड़े होकर इंसाफ़ का ढोंग!

मुस्लिम नाउ विशेष रिपोर्ट

जब ग़ज़ा पूरी तरह बर्बाद हो चुका है, एक लाख के करीब निर्दोष नागरिक इज़रायली बमबारी में मारे जा चुके हैं, छोटे-छोटे बच्चे भूख और पीड़ा से तड़पकर दम तोड़ रहे हैं—तब दुनिया की ज़मीर अचानक जाग रही है। अब ‘फिलिस्तीन के साथ खड़े होने’ का पाखंडी नाटक रचा जा रहा है। वे तमाम देश—चाहे मुस्लिम हों या ग़ैर-मुस्लिम—जो आज मानवाधिकार, इंसानियत और शांति की बातें कर रहे हैं, वही कल तक चुपचाप इज़रायल को इस नरसंहार की छूट दे रहे थे।

इन्हीं देशों में वे शक्तियाँ भी शामिल हैं जो दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ने का दावा करती हैं। पर जब भूखे, नंगे, और हथियारविहीन फिलिस्तीनियों पर बम बरसाए जा रहे थे, तब वे सभी खामोश तमाशबीन बने रहे। क्या यह आतंकवाद नहीं है? अगर मासूम बच्चों की हत्या, अस्पतालों पर बमबारी और नागरिकों की घेराबंदी आतंकवाद नहीं है, तो फिर क्या है?

जब ग़ज़ा की धरती खंडहर बन चुकी है, हर जीवित इंसान घायल और बेसहारा है, तब उनके साथ खड़े होने का क्या मतलब? यह तो ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।

अरब, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश—जिन्हें मुस्लिम दुनिया के स्वयंभू नेता बताया जाता है—ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे केवल अपने राजनीतिक और आर्थिक फ़ायदे के लिए मुसलमानों का इस्तेमाल करते हैं। कभी इस्लाम के नाम पर, कभी अल्लाह और रसूल की दुहाई देकर वे मुस्लिम जनता की भावनाओं से खेलते हैं। लेकिन जब ग़ज़ा में नन्हे-नन्हे बच्चों की लाशें उठ रही थीं, तब उनकी फौजें, उनके डिप्लोमैट और उनके सुल्तान चुप थे। यह चुप्पी गद्दारी से कम नहीं।

ईरान और इज़रायल के बीच चल रही लड़ाई हो या ग़ज़ा की त्रासदी—इन देशों की भूमिका बताती है कि ये असल में मुसलमानों के हितैषी नहीं, बल्कि अवसरवादी हैं। मुसलमानों को इन मुल्कों से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। दरअसल अब वक्त है कि मुसलमान खुद तय करें कि कौन उनके हित में है और कौन एजेंट बनकर उनकी जड़ों को काट रहा है। जो देश मुसलमानों की क़यादत का दावा करें, उनकी असलियत ज़रूर परखें।

आज भारत के भीतर भी ऐसे ही दोहरापन देखने को मिल रहा है। एक तरफ ‘शांति और अहिंसा’ की दुहाई, दूसरी ओर इज़रायल के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग। यह दो नावों की सवारी अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाली। अब तय करना होगा कि भारत को इज़रायल, ईरान और फिलिस्तीन जैसे देशों के साथ संतुलन साधने की असफल कोशिश करनी है या इंसाफ के एक सिरे पर मज़बूती से खड़ा होना है।

ग़ज़ा अब केवल एक भू-भाग नहीं रहा, यह अब एक इम्तिहान है—इंसानियत का, ईमान का और राजनीतिक ज़मीर का। जो इस वक़्त भी खामोश हैं, वे इतिहास में अपराधी की तरह लिखे जाएंगे।