राहुल गांधी का बड़ा हमला: चुनाव आयोग के ‘गोपनीय संशोधन’ से मोदी सरकार और BJP पर उठे सवाल
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जिस तीखे अंदाज़ में सबूतों के साथ भारत के चुनाव आयोग पर हमला बोला है, उसकी गूंज अब सिर्फ़ आयोग तक सीमित नहीं है। इसकी आंच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तक पहुंचती दिख रही है। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठते सवालों के बीच भाजपा नेताओं का खुलेआम आयोग का बचाव करना अब उनके लिए राजनीतिक सिरदर्द बन सकता है।
राहुल गांधी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर यह बहस छिड़ गई है कि भाजपा की सत्ता में वापसी और नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद पर निरंतर मौजूदगी के पीछे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता कितनी है। कई यूजर्स सीधे आरोप लगा रहे हैं कि “वोट की चोरी” के जरिए भाजपा ने न केवल केंद्र में बल्कि कई राज्यों में भी सत्ता हासिल की है।
इस डिजिटल बहस में स्क्रोल वेबसाइट पर प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार अरविंद गुणसेकर की जून माह की रिपोर्ट और आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह के पुराने आरोपों को लगातार शेयर और उद्धृत किया जा रहा है। वहीं हिंदुस्तान टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा ने टिप्पणी की है कि जब चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों का दर्जा उच्च न्यायालय के जज के समान है, तो ऐसे संवेदनशील मामले में कोर्ट में जाने की सलाह देकर संतोषजनक जवाब देने से बचना बेहद हैरान करने वाला कदम है।
स्क्रोल का खुलासा — चुनावी पारदर्शिता घटाने वाला संशोधन
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, 21 दिसंबर को उसने सबसे पहले खुलासा किया था कि “कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स” (Conduct of Election Rules) में संशोधन कर चुनाव से जुड़ी कई अहम दस्तावेज़ों तक जनता की पहुंच सीमित कर दी गई है। विपक्ष ने इस कदम को चुनावी पारदर्शिता पर सीधा हमला बताया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह संशोधन इतनी तेज़ी से हुआ कि खुद केंद्र के विधि मंत्रालय (Law Ministry) के कानून अधिकारियों ने इसके प्रारंभिक मसौदे पर आपत्ति जताई थी।
दो दिन में तैयार और लागू हुआ नियम
दस्तावेज़ बताते हैं कि 17 दिसंबर को चुनाव आयोग ने विधि मंत्रालय को पत्र लिखकर 1961 के कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स में संशोधन का प्रस्ताव भेजा। मंत्रालय को यह पत्र 19 दिसंबर को मिला।
20 दिसंबर को ही विधि मंत्रालय और चुनाव आयोग के अधिकारियों ने प्रस्तावित संशोधन पर बैठक की, भाषा में बदलाव किया, मसौदा विधि सचिव और केंद्रीय विधि मंत्री ने मंज़ूर किया और उसी दिन इसे आयोग को वापस भेज दिया गया।
आयोग ने उसी दिन संशोधित मसौदा स्वीकार कर लिया और मंत्रालय से अनुरोध किया कि इसे “जल्द से जल्द अधिसूचित” किया जाए। रात 10:23 बजे, 20 दिसंबर को यह संशोधन अधिसूचित कर दिया गया।
पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का आदेश और ‘तेज़’ कार्रवाई
इस पूरी प्रक्रिया से ठीक एक हफ्ता पहले, 9 दिसंबर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया था कि हरियाणा विधानसभा चुनाव से जुड़े पोलिंग बूथों के वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य दस्तावेज़ वकील मह्मूद प्राचा को उपलब्ध कराए जाएं।
संशोधन के बाद यह अनिवार्यता ख़त्म हो गई, जिससे आयोग को ये दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं रही।
कानून मंत्रालय और चुनाव आयोग में टकराव
उस समय रूल 93 (Rule 93) के तहत, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM), उपयोग और अप्रयुक्त बैलेट पेपर, मतदाता सूची की मार्क की गई कॉपी और फ़ॉर्म 17A को छोड़कर, चुनाव से जुड़े सभी अन्य दस्तावेज़ों का सार्वजनिक निरीक्षण संभव था।
इसका मतलब था कि कोई भी व्यक्ति पोलिंग बूथ की सीसीटीवी फुटेज या फ़ॉर्म 17C (जिसमें हर प्रत्याशी को मिले कुल वोटों का ब्योरा होता है) देख सकता था।
मह्मूद प्राचा ने इसी नियम के तहत फ़ॉर्म 17C और सीसीटीवी फुटेज मांगी थी, और हाई कोर्ट ने उनकी मांग को सही ठहराया था।
इसके बाद आयोग ने प्रस्ताव दिया कि रूल 93(2A) में “statutory” (क़ानूनन परिभाषित) शब्द जोड़ा जाए, जिससे गैर-‘statutory’ यानी कई दस्तावेज़ और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जनता की पहुंच से बाहर हो जाएं।
आयोग के तर्क
चुनाव आयोग ने अपने पत्र में कहा कि:
- गैर-‘statutory’ दस्तावेज़ और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में बहुत अधिक मानव संसाधन लगता है।
- चुनाव के बाद प्रशासनिक संसाधन सीमित हो जाते हैं और रिटर्निंग ऑफिसर का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, ऐसे में यह “अनावश्यक बोझ” है।
- “All other papers” शब्द का दायरा बहुत व्यापक है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
कानून मंत्रालय की आपत्ति
विधि मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि:
- “Statutory” शब्द जोड़ने से निरीक्षण के अधिकार और सीमित हो जाएंगे, जो 63 साल पुराने नियमों का उद्देश्य नहीं है।
- “Statutory” की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, जिससे कानूनी अस्पष्टता पैदा होगी।
अंतिम संशोधन में भी सीमित हुई पारदर्शिता
कानून मंत्रालय के दबाव के बाद आयोग ने “statutory papers” की जगह “सभी अन्य दस्तावेज़ जो इन नियमों में निर्दिष्ट हैं” (all other papers specified in these rules) शब्दावली अपनाई।
इस बदलाव के बाद भी, विशेषज्ञों का कहना है कि जनता की पहुंच पहले से कम हो गई है, क्योंकि अब केवल उन्हीं दस्तावेज़ों को देखा जा सकेगा जिन्हें नियमों में विशेष रूप से ‘अनुमति’ दी गई है।
राजनीतिक और कानूनी हलकों में मची हलचल
राहुल गांधी के बयान और स्क्रोल के इस खुलासे ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में बहस छेड़ दी है।
- विपक्ष इसे “चुनावी चोरी को संस्थागत सुरक्षा” देने का तरीका बता रहा है।
- भाजपा का दावा है कि संशोधन प्रशासनिक बोझ कम करने और प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए किया गया है।
लेकिन सोशल मीडिया पर माहौल अलग है — कई यूजर्स पुराने चुनाव परिणामों और भाजपा की जीत की वैधता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
लोकतंत्र में भरोसे का संकट?
चुनाव आयोग को लोकतंत्र का सबसे अहम प्रहरी माना जाता है। ऐसे में नियमों में इस तरह के तेज़ और विवादास्पद बदलाव न केवल उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि यह भी संदेश देते हैं कि पारदर्शिता की जगह ‘गोपनीयता’ को तरजीह दी जा रही है।
अब सवाल यह है कि क्या यह विवाद महज़ एक कानूनी बहस तक सीमित रहेगा या यह भारत के चुनावी ढांचे में जनता के भरोसे की नींव को हिला देगा।

