जावेद अख्तर और शबाना आज़मी: सच्चाई की आवाज़ से परेशान नफरत के सौदागर
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली:
साहित्यकार और गीतकार जावेद अख्तर ऐसी शख्सियत के धनी हैं कि जब वे सच्चाई बोलते हैं, तो न केवल पाकिस्तान बल्कि भारत में भी नफरत के सौदागर बुरी तरह असहज हो जाते हैं। यदि विश्वास न हो, तो दोनों देशों के सोशल मीडिया हैंडल्स पर नजर डाल लें। हाल ही में पाकिस्तान में उनके पीछे उनकी पत्नी और मशहूर अभिनेत्री शबाना आज़मी के एक बयान को लेकर जमकर हंगामा हुआ। वहीं भारत में कुछ ऐसे लोग हैं, जो हिंदू-मुस्लिम के नाम पर फॉलोअर्स बढ़ा कर रोज़ी-रोटी चलाते हैं, और शबाना-जावेद के बिना नाम लिए आलोचना करते हैं। सोशल मीडिया पर उनके बयानों के ज़रिए ऐसा दिखाया जाता है कि जैसे भारत की तरक्की केवल उनके दम पर हुई और बाकी सब देश के गद्दार हैं, विशेषकर मुसलमान।

ऐसे ही मुसलमानों के खिलाफ एजेंडा चलाने वाले एक वेबसाइट पत्रकार श्रवण शुक्ला भी हैं। उर्दू के नामवर साहित्यकारों के नाम गिनाना उनकी आदत है, जैसे वे उनकी चाटुकारिता कर रहे हों। उनकी टिप्पणी एक्स पर इस बात का प्रमाण है, जिसमें उन्होंने लिखा—
“सुन बेण्ण्ण्, तेरा ससुर जो कैफ़ी आज़मी था, उसने अपनी औकातानुसार पाकिस्तान चुना। जब मिर्च लगी और आग फैली, तो भाग कर हिंदुस्तान आ गया। तेरी जमात के मंटो, सज्जाद जहीर, साहिर लुधियानवी, बड़े गुलाम अली, कुर्रतुल ऐन हैदर—ऐसे कितने नाम गिनाऊँ? और अब भी बोलते हो कि किसी के बाप का नहीं है हिंदुस्तान। यहाँ आकर प्रोग्रेसिव बनकर भीख माँगने आए।”
जावेद अख्तर का कहना है कि ऐसे लोग देश की आज़ादी और उसके लिए बलिदान देने वालों के महत्व को कभी नहीं समझेंगे। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्होंने लिखा—
“मेरी सभी भारतीय बहनों और भाइयों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह आज़ादी हमें थाली में सजाकर नहीं मिली। आज हमें उन लोगों को याद करना चाहिए और सलाम करना चाहिए, जो हमें आज़ादी दिलाने के लिए जेल गए और फांसी पर चढ़ गए। आइए, इसे हम कभी न खोएँ।”
दरअसल, शबाना और जावेद की यही सच्चाई की आवाज़ नफरत के सौदागर की सबसे बड़ी दुखती रग पर हाथ रख देती है। जब जावेद ने स्वतंत्रता संग्राम में किसी संगठन की भूमिका पर सवाल उठाया, तो ट्रोलर्स उनके पीछे पड़ गए। किसी ने कहा—
“बेटा, जब तुम्हारे बाप-दादा अंग्रेजों के जूते चाट रहे थे, तब मेरे बुजुर्ग देश की आज़ादी के लिए काला पानी झेल रहे थे। अपनी औकात में रहो।”
सुन बे…. तेरा ससुर जो कैफी आजमी था न… उसने अपनी औकातानुसार पाकिस्तान को ही चुना था। जब मिर्ची लगी, आग फैली… तो भाग कर यहाँ हिंदुस्तान आ गया। तेरी ही जमात का मंटो, सज्जाद जहीर..साहिर लुधियानवी… बड़े गुलाम अली.. कुर्रतुल ऐन हैदर. ऐसे कितने नाम गिनाऊ?
— Shravan Shukla ePatrakaar (@epatrakaar) August 16, 2025
और तुम अब भी बोलते हो… https://t.co/uwl4upblzg
फिर भी, जावेद अख्तर अपनी शांति और संयम के साथ देशवासियों को याद दिलाते हैं कि आज़ादी केवल एक अवसर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है—इसे याद रखना और बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है।

