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भारत में मुस्लिम वाइस-चांसलर नहीं बन सकता,अरशद मदनी के बयान से नई बहस

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

दिल्ली बम ब्लास्ट की जांच के संदर्भ में पहली बार किसी प्रमुख मुस्लिम नेता ने सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यवाही पर खुलकर सवाल उठाए हैं। अल-फलाह यूनिवर्सिटी के विरुद्ध चल रही कार्रवाई को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे “मुसलमानों को दबाने की कोशिश” करार दिया। वे दिल्ली में आयोजित जमीयत के राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

अपने तेज़तर्रार और बेबाक अंदाज़ में मौलाना मदनी ने कहा—

मदनी के इस बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। समाज के एक बड़े तबके का कहना है कि यदि अल-फलाह के संस्थापकों पर धनशोधन के आरोप इतने पुराने थे, तो सरकार और एजेंसियों ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की? इस वर्ग का मानना है कि जांच का तेज़ होना तभी क्यों दिखा जब बम ब्लास्ट के आरोपियों के “तार” अल-फलाह से जोड़े जाने लगे।

मीडिया ट्रायल पर भी कई लोग सवाल उठा रहे हैं। उदाहरण के लिए, नवभारत टाइम्स फरीदाबाद के एक पत्रकार ने यह खबर छाप दी कि आरोपी 15 दिनों तक टॉयलेट नहीं गए और दो हफ्तों में सिर्फ चार बार कमरे से बाहर निकले। मुस्लिम समाज के कई लोग पूछ रहे हैं—अगर पत्रकार के पास इतनी “अंदरूनी सूचना” थी तो उन्होंने पुलिस को समय रहते बताया क्यों नहीं?

कुल मिलाकर, अरशद मदनी का बयान एक नए विमर्श को जन्म दे चुका है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ और मुस्लिम नेता भी जांच प्रक्रिया और एजेंसियों की कार्रवाई पर अपनी आवाज़ बुलंद कर सकते हैं। यूपी में आज़म खान की जौहर यूनिवर्सिटी के साथ जो हुआ, उससे अल-फलाह मामले की तुलना भी खुलकर हो रही है—और आशंका जताई जा रही है कि यूनिवर्सिटी का भविष्य भी कहीं उसी अंधकारमय राह पर न धकेल दिया जाए।


मुफ्ती-ए-आज़म हिंद पर राष्ट्रीय सेमिनार सम्पन्न—देशभर के बुद्धिजीवी हुए शामिल

दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशनल क्लब के मौलानकर हॉल में भारत के इतिहास में ‘मुफ्ती-ए-आज़म हिंद’ के नाम से विख्यात हज़रत मुफ़्ती मोहम्मद किफायतुल्लाह देहलवीؒ की विराट शख्सियत और उनकी अद्भुत सेवाओं पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार शानदार सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। इस ऐतिहासिक आयोजन में देश-विदेश से आए 50 से अधिक शोधपत्रों पर बहस हुई, जिसमें उलमा, इतिहासकार, न्यायविद और बुद्धिजीवियों ने अपनी गहरी अंतर्दृष्टि साझा की।

अंतिम सत्रों की अध्यक्षता जमीयत उलेमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना मोहम्मद सलमान बिजनोरी और दारुल उलूम देवबंद के नायब मोहतमिम मौलाना मुफ़्ती मोहम्मद राशिद आज़मी ने की। संचालन की ज़िम्मेदारी महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन क़ासमी और मुफ्ती मोहम्मद अफ़्फान मंसूरपुरी ने निभाई।


“अकाबिर का फैसला बिल्कुल सही था” — मौलाना महमूद मदनी

अपने प्रभावशाली संबोधन में मौलाना महमूद मदनी ने देश के विभाजन के विरुद्ध जमीयत के पूर्वजों के अडिग और ऐतिहासिक फैसले को याद करते हुए कहा—

“हमारे अकाबिर विभाजन के खिलाफ एकमत थे। उनकी राय दूरदर्शिता पर आधारित थी। कुछ युवा आज हालात देखकर सोचते हैं कि शायद फैसला गलत था—लेकिन मैं पूरी जिम्मेदारी से कहता हूं कि उनका निर्णय बिल्कुल दुरुस्त था। काश उनकी सलाह और प्रस्तावों पर राष्ट्रीय स्तर पर अमल किया गया होता, तो आज देश की तस्वीर अलग होती।”


“एक सदी में जन्म लेने वाली हस्ती” — मौलाना अबुलक़ासिम नुमानी

दारुल उलूम देवबंद के कुलपति, मौलाना मुफ़्ती अबुलक़ासिम नुमानी ने मुफ़्ती साहब की ज़िंदगी को एक “जीवंत इतिहास” कहा। उन्होंने बताया—

“मुफ़्ती किफायतुल्लाहؒ की शख्सियत में विनम्रता, सादगी, विद्वत्ता और राष्ट्र-सेवा का अद्भुत संगम था। उनकी जीवन-यात्रा पिछले सौ वर्षों में उलमा की निर्णायक भूमिका का सशक्त प्रमाण है।”


वैश्विक पहचान—फिक़्ह, फतवा और तक़वा का अद्वितीय संगम

सेमिनार में विभिन्न वक्ताओं ने मुफ़्ती साहब के बहुआयामी व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं पर प्रकाश डाला—

  • मौलाना असगर अली इमाम महदी सलफ़ी (अमीर, मरकज़ी जमीयत अहले हदीस)
    “फिक़्ह, फतवा और तक़वा—इन तीनों का इतना सुंदर संगम बिरले ही देखने को मिलता है।”
  • मौलाना खालिद सिद्दीकी (अध्यक्ष, जमीयत उलेमा नेपाल)
    “मुफ़्ती साहब राजनीति और फिक़्ह—दोनों क्षेत्रों में समान रूप से प्रभावी थे।”
  • मौलाना रहमतुल्लाह मीर कश्मीरी
    “वे अविभाजित हिंदुस्तान की सर्वमान्य नेतृत्वकर्ता शख्सियत थे। उनकी पुस्तक ‘तालीमुल इस्लाम’ दुनिया भर में पढ़ी जाती है।”

गांधी, नेहरू और बोस भी थे प्रशंसक

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और इतिहासकार अनिल नूरिया ने कहा कि महात्मा गांधी, पंडित नेहरू समेत अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने मुफ़्ती साहब की भूमिका को अत्यधिक सम्मान दिया।

इतिहासकार डॉ. सौरभ बाजपेई ने उन्हें “संयुक्त राष्ट्रीयता का मजबूत पैरोकार” बताया।

कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने यह महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया—

“नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने मुफ़्ती साहब को ‘आज़ादी-ए-हिंद का बहादुर रहनुमा’ कहा था।”


समापन

समापन भाषण में मौलाना मुफ़्ती राशिद आज़मी ने मुफ़्ती साहब की सादगी, विनम्रता और सच्चाई को उनकी सबसे बड़ी शक्ति बताया—वे गुण जिनकी बदौलत वे अपने दौर के बड़े आंदोलनों की अगुवाई कर सके।

कार्यक्रम का समापन मौलाना हबीबुल्लाह बांदवी की दुआ से हुआ। दिल्ली और देशभर से आए एक हज़ार से अधिक उलमा और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति ने यह साबित किया कि मुफ़्ती-ए-आज़म हिंद के प्रति सम्मान आज भी उतना ही जीवंत है जितना उनके जीवनकाल में था।