Muslim World

मुसलमानों के नाम पर संवाद या सियासी नौटंकी?

देश की राजधानी दिल्ली में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी है, जिसने मुसलमानों के बीच ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के एक बड़े वर्ग में भी गहरी बेचैनी और तीखी बहस को जन्म दिया है। यह घटना इसलिए असाधारण है क्योंकि आज़ादी के समय से मुसलमानों के विरुद्ध सक्रिय रहे एक संगठन के कुछ प्रमुख चेहरों को एक ऐसे भव्य संस्थान में फिर से सक्रिय देखा गया, जो “इस्लामिक” नाम से जाना जाता है।

और भी चिंताजनक यह है कि इस संस्थान के भीतर उन्हीं लोगों के साथ मुसलमानों के कुछ तथाकथित ‘ठेकेदारों’ को संवाद करते हुए देखा गया, जिनका उद्देश्य बताया गया—
“पिछले कुछ वर्षों से मुसलमानों को हाशिए पर धकेले जाने, उनकी पहचान मिटाने और उनके धर्मस्थलों को नुकसान पहुँचाने की कोशिशों को कैसे रोका जाए?”

इस पूरे कार्यक्रम को ‘सर्वधर्म संवाद’ का नाम दिया गया, जबकि इसके आयोजक वही मुस्लिम चेहरे थे जिन्हें लंबे समय से एक मुस्लिम-विरोधी संगठन का “मुस्लिम चेहरा” माना जाता रहा है। इससे कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

पहला सवाल
इन मुसलमानों को यह अधिकार किसने दिया कि वे पूरे मुस्लिम समाज की ओर से ऐसे संगठन से संवाद करें, जिसकी पहचान ही मुस्लिम विरोधी रही है? मुसलमानों के किस वर्ग ने उन्हें यह प्रतिनिधित्व सौंपा?

दूसरा अहम सवाल
दिल्ली में कांग्रेस शासनकाल में स्थापित इस ‘इस्लामिक’ संस्थान से चुनाव के बाद बड़ी मुश्किल से उन मुस्लिम चेहरों को बाहर किया गया था, जिन पर आरोप था कि वे पर्दे के पीछे मुस्लिम विरोधी ताकतों के साथ मिलकर समुदाय में फूट डालते रहे हैं। यह संस्थान आज भी एक वरिष्ठ कांग्रेसी के संरक्षण में संचालित हो रहा है।
तो फिर किस मजबूरी में इसने उन्हीं मुस्लिम विरोधी ताकतों को यहां कार्यक्रम करने की अनुमति दी, जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी खुले मंच से इस संगठन की तीखी आलोचना करते रहे हैं?

इस संवाद के दौरान उस मुस्लिम विरोधी संगठन के एक मुस्लिम चेहरे ने यह कहकर खुद को正 ठहराने की कोशिश की—
“कुछ लोग पर्दे के पीछे संगठन से मिलते हैं, मैं खुलेआम मिलता हूं, इसलिए बदनाम हूं।”

इतना ही नहीं, उन्होंने यह दावा भी किया कि यह संगठन आज़ादी के समय से राष्ट्रवाद और देशसेवा में लगा हुआ है।
यहां एक और मौलिक प्रश्न उठता है—
जब इस देश में ऐसे कई मुस्लिम संगठन मौजूद हैं, जिन्होंने न केवल आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि आज भी दीनी तालीम के साथ देशसेवा में लगे हैं, तो उन्हें नज़रअंदाज़ क्यों किया जा रहा है?
उन लोगों से संवाद क्यों किया जा रहा है जो यह कहते हैं कि वे सरकार नहीं चलाते, लेकिन उनके लोग सरकार में भी हैं, और जब पार्टी की नीति के अनुसार ठीक लगता है, तो उनकी बात मान भी ली जाती है?

क्या ऐसे लोगों से संवाद करना उचित है जिन पर मुस्लिम विरोधी होने की गहरी छाप है और जो यह स्वीकार करते हैं कि सरकार उनकी बात तभी सुनती है जब उसे अनुकूल लगता है?
सच्चाई यह है कि ऐसे संवाद महज़ आई-वॉश हैं—एक राजनीतिक नाटक, जो हर बार किसी बड़े चुनाव से पहले शुरू हो जाता है।

जिस पार्टी के वरिष्ठ नेता मंच से यह कहते हों कि “मुसलमान बाहरी हैं” या “मंगलसूत्र छीन लेंगे”, जिस पर पिछले एक दशक से मुस्लिम विरोधी नीतियों को बढ़ावा देने और बेलगाम आंदोलनों को न रोक पाने के आरोप लगते रहे हों—जबकि एक सख्त आदेश से बहुत कुछ रोका जा सकता है—उससे संवाद का आखिर हासिल क्या होगा?

कमरे बंद करके चंद बिके हुए या स्वघोषित प्रतिनिधियों से बातचीत करने से न तो अविश्वास टूटेगा, न ही हालात बदलेंगे।

यदि वास्तव में नीयत साफ है और देश में बढ़ती अशांति को समाप्त करना उद्देश्य है, तो सरकार को स्वयं आगे आकर न्यूट्रल, विश्वसनीय और सर्वस्वीकृत लोगों से खुला संवाद करना चाहिए। उसके बाद एक स्पष्ट नीति बने और देशव्यापी अभियान चलाया जाए। यकीन मानिए, चार–छह महीनों में ही अधिकांश विवाद सुलझ सकते हैं।

यह भी समझना होगा कि लगातार संप्रदायिक राजनीति देश को अंदर से कमजोर कर रही है। एक ओर ट्रंप और जिनपिंग जैसे अंतरराष्ट्रीय “दादा” बैठे हैं, जो किसी भी देश की कमजोरी का फायदा उठाने से नहीं चूकते। वेनेजुएला, ईरान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं—भारत भी इससे अछूता नहीं है।

गलत सुरक्षा और विदेश नीति का परिणाम यह हुआ है कि पिछले एक दशक में देश ने कई बड़े आतंकी हमले झेले, लेकिन ठोस और निर्णायक कार्रवाई नज़र नहीं आई। आज हालात यह हैं कि लगभग सभी पड़ोसी देशों से रिश्ते तनावपूर्ण हैं।

केवल कुछ मुस्लिम देशों से औपचारिक सम्मान मिलने से कोई देश नहीं चलता।
देश चलता है—आंतरिक एकता, निष्पक्ष नीति और ईमानदार संवाद से।