ग़ज़ा के भविष्य पर वैश्विक मंथन: UAE की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में एंट्री, मोदी और पुतिन को भी न्योता
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो | अबू धाबी
ग़ज़ा संकट के समाधान और युद्ध के बाद स्थिरता बहाल करने की दिशा में एक अहम कूटनीतिक पहल के तहत संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नहयान ने अमेरिका के उस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है, जिसके तहत उन्हें ग़ज़ा के लिए प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया गया था। यह जानकारी यूएई के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन ज़ायद अल नहयान ने दी।
शेख अब्दुल्ला बिन ज़ायद ने इस फैसले को यूएई की उस प्रतिबद्धता से जोड़ा, जिसके तहत वह ग़ज़ा में स्थायी शांति, पुनर्निर्माण और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। उन्होंने कहा कि यूएई का यह निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 20-सूत्रीय शांति योजना के पूर्ण और प्रभावी क्रियान्वयन के महत्व को दर्शाता है। उनके मुताबिक, यही योजना फ़िलिस्तीनी जनता के वैध अधिकारों की प्राप्ति और ग़ज़ा में दीर्घकालिक शांति का रास्ता खोल सकती है।
विदेश मंत्री ने राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए कहा कि वैश्विक शांति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पहले भी दिखाई दे चुकी है, जिसका उदाहरण ऐतिहासिक अब्राहम समझौते (Abraham Accords) हैं। शेख अब्दुल्ला ने दोहराया कि यूएई ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के मिशन में पूरी सक्रियता के साथ योगदान देने के लिए तैयार है, ताकि सहयोग, स्थिरता और समृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके। यूएई के विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह बोर्ड क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ग़ज़ा के भविष्य को नई दिशा देने का काम करेगा।
पुतिन और मोदी को भी न्योता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पहल के तहत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी ‘ग़ज़ा बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने पुष्टि की कि पुतिन उन विश्व नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें इस बोर्ड के लिए आमंत्रित किया गया है।
जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन को बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिया है, तो ट्रंप ने कहा,
“हां, वह उन लोगों में से एक हैं। ये सभी विश्व नेता हैं, और जवाब है—हां।”
इसके अलावा, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस बोर्ड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है। यह संकेत देता है कि अमेरिका इस पहल को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व के मंच के रूप में विकसित करना चाहता है।
‘20-सूत्रीय शांति योजना’ और बोर्ड की भूमिका
‘ग़ज़ा बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन राष्ट्रपति ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना के दूसरे चरण (Phase 2) के तहत किया जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को समाप्त करना, ग़ज़ा में युद्ध के बाद स्थिरता सुनिश्चित करना और व्यापक पुनर्निर्माण की निगरानी करना है।
हालांकि शुरुआत में यह बोर्ड ग़ज़ा तक सीमित पहल के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि इसका दायरा आगे चलकर वैश्विक संघर्षों की मध्यस्थता तक भी बढ़ सकता है।
व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान के अनुसार, प्रस्तावित एग्जीक्यूटिव बोर्ड के सदस्य ग़ज़ा की स्थिरता और दीर्घकालिक सफलता से जुड़े अहम पोर्टफोलियो की निगरानी करेंगे। इनमें शामिल हैं—
- शासन व्यवस्था को मज़बूत करना (Governance Capacity-Building)
- क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का समन्वय
- ग़ज़ा का पुनर्निर्माण
- निवेश आकर्षित करना
- बड़े पैमाने पर वित्तपोषण
- पूंजी जुटाने और संसाधनों का प्रबंधन
स्थायी सीट के लिए आर्थिक शर्त
इस बोर्ड की संरचना को लेकर एक अहम शर्त भी सामने आई है। जिन देशों या भागीदारों द्वारा कम से कम 1 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान किया जाएगा, उन्हें बोर्ड में स्थायी सीट मिलेगी। वहीं, जो देश यह राशि देने में सक्षम नहीं होंगे, वे भी बोर्ड में शामिल हो सकते हैं, लेकिन उनकी सदस्यता तीन साल की अवधि तक सीमित रहेगी।
इस प्रावधान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज़ हो गई है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह व्यवस्था आर्थिक योगदान को प्राथमिकता देती है, जबकि अन्य इसे पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने का व्यावहारिक तरीका बता रहे हैं।
ग़ज़ा के भविष्य पर अंतरराष्ट्रीय नज़र
यूएई की भागीदारी, रूस और भारत जैसे बड़े देशों को दिए गए निमंत्रण और अमेरिका की अगुवाई में यह पहल संकेत देती है कि ग़ज़ा के भविष्य को लेकर वैश्विक कूटनीति एक नए चरण में प्रवेश कर रही है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर समर्थकों का मानना है कि यदि इसे निष्पक्षता, पारदर्शिता और फ़िलिस्तीनी जनता के अधिकारों के सम्मान के साथ लागू किया गया, तो यह ग़ज़ा में स्थायी शांति और पुनर्निर्माण की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि किन-किन देशों की औपचारिक भागीदारी होती है और यह बोर्ड ज़मीनी स्तर पर ग़ज़ा के हालात को किस तरह बदल पाता है। लेकिन फिलहाल, यूएई राष्ट्रपति द्वारा निमंत्रण स्वीकार किया जाना इस बहुप्रतीक्षित पहल को अंतरराष्ट्रीय वैधता और गति देने वाला कदम माना जा रहा है।

