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मेवात : मोहब्बत, अमन और इंसानियत की ज़मीन

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नूंह मेवात हरियाणा

हरियाणा का नूंह जिला, जिसे कभी मेवात कहा जाता था, अक्सर गलत कारणों से सुर्खियों में आता है। कुछ ताक़तें लगातार यह साबित करने में लगी रहती हैं कि यह इलाका अपराध, गोकशी या साइबर ठगी का अड्डा है। यह वही सोच है जो समाज को बाँटने का काम करती है। मगर सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा खूबसूरत है। मेवात वो धरती है जहाँ इंसानियत की खुशबू हवा में घुली है, जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर मोहब्बत का चिराग़ जलाते हैं।

सच्चाई यह है कि जैसे हर समाज में कुछ बुरे लोग होते हैं, वैसे ही यहाँ भी होंगे — लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरे इलाके को गलत रंग में रंग दिया जाए। मेवात ने हमेशा अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब से पूरे मुल्क के सामने मिसाल पेश की है। यहां की युवा पीढ़ी आज शिक्षा, समाज सेवा और देश के विकास के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। हाल ही में नूंह के तिरवाड़ा गांव में आयोजित तबलीगी जमात का तीन दिवसीय ऐतिहासिक जलसा इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया।


अमन और मोहब्बत से सराबोर जलसा

शनिवार सुबह से ही तिरवाड़ा की गलियाँ मानो इबादतगाह बन गईं। दूर-दराज़ से लोग नम आँखों और रौशन चेहरों के साथ जलसे में शरीक होने पहुंचे। जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, लाखों की भीड़ मैदान में उमड़ पड़ी। पूरा इलाका इस्लामी रूहानियत से जगमगा उठा। लेकिन इस जलसे की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था — यह इंसानियत, एकता और मोहब्बत का पर्व था।

हिंदू समुदाय के लोगों ने इस आयोजन को सफल बनाने में उतनी ही दिली मेहनत की, जितनी मुस्लिम भाइयों ने। बिरयानी खिलाई, चाय पिलाई, व्यवस्था संभाली और सबसे बढ़कर — एक ऐसे भारत की झलक दिखाई जहाँ धर्म नहीं, इंसान सबसे पहले है।


“मोहब्बत का ज़ायका” — बिरयानी में बसी इंसानियत

पुनहाना शहर के समाजसेवी राजेश गर्ग पुत्र त्रिलोक गर्ग की पहल ने पूरे मेवात का दिल जीत लिया। उन्होंने जलसे में आने वाले मेहमानों के लिए वेज बिरयानी और मीठे चावल (जर्दा) की व्यवस्था की। उनके शब्दों में —

“मेवात की खूबसूरती इसकी एकता में है। यहाँ अगर किसी के घर त्यौहार होता है तो सब उसमें शरीक होते हैं। हमने सोचा कि क्यों न इस बार अपने मुस्लिम भाइयों के जलसे में सेवा करें, इसलिए तीनों दिनों तक बिरयानी और जर्दा खिलाएंगे।”

राजेश गर्ग की टीम हर दिन 100 पतीले बिरयानी और जर्दा तैयार कर रही है, जो लायशा बासमती चावल से बनाए जा रहे हैं। खुशबू ऐसी कि दूर से आने वाला भी ठहर जाए, और स्वाद ऐसा जो दिलों को जोड़ दे। यह सिर्फ भोजन नहीं था, यह था “मोहब्बत का ज़ायका” — जो मेवात की मिट्टी में बसी इंसानियत की गवाही देता है।


“मोहब्बत की चाय” — एक प्याली में भाईचारे की गर्माहट

इसी जलसे में बाम सैफ फाउंडेशन की ओर से लगाया गया “मोहब्बत की चाय” स्टॉल सबकी जुबान पर रहा। इसके आयोजक समय सिंह सलंबा और विजय कुमार उजीना ने बताया कि वे सिर्फ चाय बांटने नहीं आए, बल्कि “मोहब्बत का पैग़ाम” देने आए हैं।

समय सिंह कहते हैं,

“जब देश में हिंदू-मुस्लिम विवाद की बातें होती हैं, तब मेवात जैसे इलाके उम्मीद की किरण बनते हैं। हम चाहते हैं कि लोग देखें कि यहां धर्म नहीं, इंसान की पहचान अहम है — यही असली भारत की तस्वीर है।”

हजारों लोग इस स्टॉल पर रुककर चाय पीते, बातें करते, मुस्कराते — मानो हर प्याली में भाईचारे की मिठास घुली हो।


प्रशासन और समाज — साथ-साथ

इस जलसे की सफलता के पीछे प्रशासन और समाज दोनों का सामूहिक प्रयास रहा। एक हज़ार से अधिक वालंटियर दिन-रात व्यवस्थाओं में जुटे रहे — ट्रैफिक नियंत्रण, सफ़ाई, बिजली और पानी की व्यवस्था सबकुछ सलीके से चलता रहा।

नगर पालिका चेयरमैन बलराज सिंगला खुद मैदान में रहकर निगरानी कर रहे थे। वहीं हरियाणा वक्फ बोर्ड के प्रशासक चौधरी जाकिर हुसैन, पूर्व विधायक चौधरी रहीस खान और भाजपा प्रत्याशी चौधरी ऐजाज़ ख़ान भी जलसे में पहुंचकर तैयारियों का जायज़ा लेते रहे। यह सब इस बात का प्रतीक था कि जब बात समाज की एकता की हो, तो राजनीति भी पीछे नहीं रहती।


मौलाना साद साहब की मौजूदगी और लाखों की भीड़

जलसे का केंद्र बिंदु रहे तबलीगी जमात के अंतरराष्ट्रीय अमीर हजरत मौलाना साद साहब। उनके बयान को सुनने के लिए लाखों लोग तिरवाड़ा पहुंचे। मौलाना साहब ने अपने प्रवचन में कहा —

“इस्लाम मोहब्बत और अमन का पैग़ाम देता है। हमें बुराइयों से दूर रहकर अच्छाई के रास्ते पर चलना चाहिए, क्योंकि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।”

27 अक्टूबर की आख़िरी दुआ में लाखों हाथ आसमान की ओर उठेंगे — हिंदुस्तान की सलामती, अमन और भाईचारे की दुआ के साथ।


“ना हिंदू बुरा, ना मुसलमान बुरा…” — मेवात की आवाज़

जलसे में मौजूद समाजसेवी संजय कुमार ने एक शेर पढ़ा जिसने हर दिल को छू लिया —

“ना हिंदू बुरा है, ना मुसलमान बुरा है,
ना गीता बुरी है, ना कुरान बुरी है,
ना भगवान बुरा है, ना अल्लाह बुरा है,
दिल के अंदर जो बैठा है, वही शैतान बुरा है।”

यह शेर जलसे का नहीं, पूरे मेवात का पैग़ाम बन गया। यह बताने के लिए कि धर्म तो जोड़ता है — अगर कोई तोड़ता है, तो वो हमारी नफ़रतें हैं।


मेवात — इंसानियत की ज़मीन, मोहब्बत का बाग़

लायशा बासमती कंपनी के मालिक संजीव गुप्ता भी जलसे में पहुंचे। उन्होंने कहा —

“मैंने बहुत जगह धार्मिक आयोजन देखे, लेकिन मेवात जैसा भाईचारा कहीं नहीं देखा। यहां लोग धर्म से पहले इंसानियत को मानते हैं।”

वाकई, यह इलाका उस भारत की तस्वीर पेश करता है जहाँ मंदिर की घंटियाँ और मस्जिद की अज़ान साथ गूंजती हैं। जहाँ एक के त्योहार पर दूसरा मिठाई बांटता है। जहाँ बच्चों को नाम से नहीं, दिल से पहचाना जाता है।


जलसा नहीं, इंसानियत का उत्सव

तिरवाड़ा का यह जलसा सिर्फ़ धार्मिक आयोजन नहीं रहा — यह एक इंसानियत का उत्सव बन गया। वेज बिरयानी की खुशबू, जर्दे की मिठास और मोहब्बत की चाय की गर्माहट ने यह साबित कर दिया कि जब दिल साफ़ हों, तो धर्म दीवार नहीं, पुल बनता है।

मेवात की इस मिसाल ने हरियाणा ही नहीं, पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है — कि अगर मोहब्बत से जिया जाए, तो हर जलसा अमन का पैग़ाम बन सकता है।


मेवात का संदेश — “हम एक हैं”

मेवात के लोगों का यह कहना आज भी गूंज रहा है —

“मेवात की मिट्टी में नफ़रत की जगह नहीं,
यहाँ हर धर्म का फूल एक ही बग़ीचे में खिलता है।”

तिरवाड़ा का जलसा इस बात की गवाही बन गया कि हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कोई नारा नहीं, बल्कि इस ज़मीन की सच्चाई है। इससे पहले फिरोजपुर झिरका में हुए तबलीगी जलसे ने भी यही दिखाया था — कि जब दिल एक हों, तो कोई फर्क मायने नहीं रखता।

मेवात ने एक बार फिर साबित किया है कि यहाँ के लोग सिर्फ अपने मज़हब के नहीं, बल्कि मोहब्बत, अमन और इंसानियत के पुजारी हैं। यही असली भारत है — जहाँ दिल मिलते हैं, धर्म नहीं टकराते।