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चंद रुपयों में इलाज, ‘हेल्थ माफिया’ के खिलाफ़ जंग: पटना के खान सर ने खोला सस्ता अस्पताल, गरीबों को बड़ी राहत

प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में चंद रुपयों में तैयारी कराकर कोचिंग माफिया की नींद उड़ाने वाले पटना के मशहूर शिक्षक खान सर ने अब स्वास्थ्य क्षेत्र में भी एक नई मिसाल कायम कर दी है। बिहार जैसे गरीब राज्य में, जहां इलाज अक्सर लोगों की पूरी जमा-पूंजी निगल जाता है, वहां खान सर ने “इलाज को अधिकार” बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। पटना में शुरू किए गए उनके अस्पताल में खून की जांच महज़ 7 रुपये, ईसीजी 25 रुपये में और डायलिसिस जैसी ज़रूरी सेवाएं भी बेहद कम लागत पर उपलब्ध कराई जा रही हैं—जो निजी अस्पतालों की भारी-भरकम फीस के सामने क्रांतिकारी पहल मानी जा रही है।

बिहार में महंगा इलाज और मजबूरी

बिहार में गरीबी की तादाद जितनी ज़्यादा है, स्वास्थ्य समस्याएं भी उतनी ही गहरी हैं। सरकारी अस्पतालों में पिछले वर्षों में सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन आबादी के अनुपात में वे अब भी नाकाफी हैं। नतीजा यह कि निजी अस्पतालों पर निर्भरता बढ़ती है—और वहीं से शुरू होती है आम लोगों की लूट। पटना और गया जैसे शहरों में लंबे इलाज की ज़रूरत पड़ते ही मरीज़ और उसके परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ता है। डायलिसिस जैसे उपचार के लिए रोज़ 5 से 8 हजार रुपये तक वसूले जाना आम बात है। ऐसे में खान सर का सस्ता अस्पताल गरीबों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरा है।

सस्ती जांच, आधुनिक सुविधाएं

पटना स्थित खान सर का अस्पताल आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस है। यहां पूरी तरह चालू डायलिसिस यूनिट है, जिसमें उन्नत मशीनें लगाई गई हैं। ऑपरेशन थिएटर को भी खास तौर पर डिज़ाइन किया गया है—जहां पारंपरिक चमकदार टाइल्स की जगह मेडिकल-ग्रेड एंटी-इन्फेक्शन मैट्स का इस्तेमाल किया गया है, ताकि संक्रमण का जोखिम कम से कम रहे। अस्पताल में जल्द ही ब्लड बैंक और कैंसर ट्रीटमेंट सुविधाएं शुरू करने की भी योजना है।

खान सर ने पटना प्रेस से बातचीत में कहा,

“हमारा मक़सद इलाज को हर किसी की पहुंच में लाना है। यहां इलाज सरकारी अस्पतालों से भी सस्ता होगा, ताकि कोई भी व्यक्ति सिर्फ़ पैसों की वजह से इलाज से वंचित न रहे।”

‘इलाज अधिकार है, व्यापार नहीं’

खान सर लंबे समय से बढ़ती स्वास्थ्य लागत पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका मानना है कि शिक्षा की तरह स्वास्थ्य भी बुनियादी अधिकार होना चाहिए, न कि मुनाफ़े का धंधा। बताया जा रहा है कि इस पहल के पीछे उनकी मां की प्रेरणा है, जो हमेशा कहती थीं कि गरीबी कभी इलाज या शिक्षा में बाधा नहीं बननी चाहिए। उसी सोच को ज़मीन पर उतारते हुए खान सर ने यह अस्पताल शुरू किया।

विरोध और दुष्प्रचार के बावजूद समर्थन

जहां एक ओर आम लोगों में इस पहल को लेकर उत्साह है, वहीं दूसरी ओर तथाकथित ‘हेल्थ माफिया’ की बेचैनी भी साफ़ दिख रही है। सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार के ज़रिये अस्पताल के खिलाफ़ माहौल बनाने की कोशिशें की जा रही हैं—कहीं दवाइयों के दाम बढ़ाने के आरोप, तो कहीं भीड़ का बहाना। यहां तक कि धार्मिक उकसावे के लिए एआई से बनी तस्वीरें तक शेयर की जा रही हैं।

लेकिन खान सर की पहचान यही है कि वे धर्म, जाति और मज़हब से ऊपर इंसानियत को रखते हैं। उनके पुराने वीडियो आज भी मौजूद हैं, जिनमें वे इस्लाम सहित सभी धर्मों की अच्छाइयों की बात करते और आपसी सम्मान की नसीहत देते दिखते हैं। उनके अस्पताल में इलाज पाने वालों का कहना है कि यहां किसी से भेदभाव नहीं होता—सिर्फ़ बीमारी देखी जाती है, पहचान नहीं।

बिहार भर में अस्पतालों का नेटवर्क

खान सर यहीं रुकने वाले नहीं हैं। उन्होंने बिहार के अन्य हिस्सों में भी ऐसे लो-कॉस्ट अस्पताल खोलने की योजना साझा की है, ताकि पटना पर बोझ कम हो और दूर-दराज़ के इलाकों तक सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें। विभिन्न मेडिकल स्पेशियलिटी के साथ अस्पताल खोलने का मक़सद यही है कि भीड़ घटे और मरीज़ों को समय पर बेहतर इलाज मिल सके।

गरीबों के लिए बड़ी राहत

खून जांच 7 रुपये और ईसीजी 25 रुपये में—ये आंकड़े सिर्फ़ सस्ते दाम नहीं, बल्कि एक सोच का प्रतीक हैं। यह पहल बताती है कि अगर नीयत साफ़ हो तो स्वास्थ्य जैसी ज़रूरत को भी मानवीय बनाया जा सकता है। बिहार के हज़ारों परिवारों के लिए यह अस्पताल कर्ज़, ज़मीन-बिक्री और बेबसी के चक्र से बाहर निकलने का रास्ता बन सकता है।

निष्कर्ष

जिस तरह खान सर ने शिक्षा के क्षेत्र में ‘कम खर्च, बेहतर तैयारी’ का मॉडल खड़ा किया, उसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उन्होंने एक नई दिशा दिखाई है। निजी अस्पतालों की मनमानी के बीच उनका सस्ता अस्पताल गरीबों के लिए संजीवनी बनकर सामने आया है। विरोध और अफ़वाहों के बावजूद, ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि इलाज अब कुछ लोगों की जेब तक सीमित नहीं, बल्कि आम आदमी की पहुंच में आने लगा है—और यही इस पहल की सबसे बड़ी जीत है।