द मुसलमान: 100 साल से स्याही और जज़्बात से लिखी जा रही चेन्नई की एक अनोखी दास्तान
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, चेन्नई
दुनिया आज उस दौर में खड़ी है जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और आधुनिक तकनीक इंसानी दिमाग को पीछे छोड़ने की होड़ में हैं। जब तकनीक की रफ़्तार चांद से आगे बढ़कर सूरज पर घर तलाश रही हो, तो ऐसे समय में दक्षिण भारत के चेन्नई शहर की एक तंग गली से निकलने वाला अखबार ‘द मुसलमान’ किसी अजूबे से कम नहीं लगता। यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा अखबार है, जो डिजिटल क्रांति और छपाई की मशीनी चकाचौंध के बीच आज भी अपनी 100 साल पुरानी परंपरा को पूरी शिद्दत से सीने से लगाए हुए है।

हाथों का जादू: जहाँ हर लफ्ज़ एक इबादत है ‘द मुसलमान’ की सबसे बड़ी खासियत इसका हस्तलिखित (Handwritten) होना है। जिस दौर में पलक झपकते ही खबरें पोर्टल पर अपलोड हो जाती हैं, वहाँ इस अखबार के पन्ने आज भी ‘कातिबों’ (Calligraphers) की उंगलियों के जादू से सजते हैं। उर्दू की खूबसूरत लिखावट, जिसे ‘किताबत’ कहा जाता है, इस अखबार की रूह है। चार पन्नों का यह ब्रॉडशीट अखबार मशीनी सटीकता के साथ हाथ से लिखा जाता है, जिसे देखकर पहली नज़र में कोई भी धोखा खा सकता है कि यह हाथ से लिखा है या प्रिंट हुआ है। यह सिर्फ एक अखबार नहीं, बल्कि एक कला है जिसे चेन्नई के ट्रिप्लिकेन स्थित एक छोटे से 800 स्क्वायर फुट के कमरे में छह समर्पित लोगों की टीम ज़िंदा रखे हुए है。
इतिहास की खुशबू और दादा का सपना इस ऐतिहासिक अखबार की नींव सैयद अज़मतुल्लाह ने साल 1927 में रखी थी। इसका उद्घाटन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गज नेता और स्वतंत्रता सेनानी मुख्तार अहमद अंसारी ने किया था। आज इस विरासत को अज़मतुल्लाह के पोते सैयद आरिफुल्लाह संभाल रहे हैं। आरिफुल्लाह ने मार्केटिंग में MBA किया है और वे चाहते तो किसी कॉर्पोरेट कंपनी में बड़ा ओहदा पा सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने दादा के सपने और उर्दू की इस मरती हुई कला को बचाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। उनके लिए यह अखबार सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि एक मिशन है。
गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल ‘द मुसलमान’ के इतिहास में एक ऐसा किस्सा दर्ज है जो भारत की धर्मनिरपेक्षता और साझा संस्कृति की गवाही देता है। 1960 के दशक की बात है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू चेन्नई के दौरे पर थे। वहां ‘द मुसलमान’ के रिपोर्टर कृष्णा अय्यर उनका इंटरव्यू लेने पहुंचे। नेहरू जी यह देखकर हैरान रह गए कि एक मुस्लिम नाम वाले अखबार के लिए एक हिंदू पत्रकार काम कर रहा है। इसी दौरान कमरे में एक और पत्रकार दाखिल हुआ, जिसने खुद का परिचय ‘द हिंदू’ के रिपोर्टर मोहम्मद असद के रूप में दिया। नेहरू जी यह देखकर निशब्द रह गए कि जहाँ ‘द मुसलमान’ में हिंदू काम कर रहे हैं, वहीं ‘द हिंदू’ में मुस्लिम। बाद में इंदिरा गांधी ने इस वाकये को भारतीय धर्मनिरपेक्षता के एक मॉडल के तौर पर पेश किया था।
अखबार का ढांचा और खास सामग्री यह दैनिक अखबार रोजाना प्रकाशित होता है और इसकी लगभग 21,000 प्रतियां पूरे भारत में पढ़ी जाती हैं। चार पन्नों के इस अखबार का हर पन्ना एक निश्चित उद्देश्य के लिए है:
पहला पन्ना: अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मुख्य खबरों के लिए समर्पित होता है।
दूसरा पन्ना: इसमें संपादकीय (Editorial) लेख होते हैं।
तीसरा और चौथा पन्ना: यहाँ स्थानीय खबरें और विज्ञापन अपनी जगह पाते हैं।

सोमवार का अंक: यह दिन थोड़ा खास होता है क्योंकि इस दिन कुरान की आयतों और इस्लामी इतिहास पर विशेष लेख प्रकाशित किए जाते हैं।
हैरानी की बात यह है कि आज के महंगाई के दौर में भी इस अखबार की एक प्रति की कीमत मात्र 75 पैसे है और इसका सालाना सब्सक्रिप्शन सिर्फ 400 रुपये है।
चुनौतियां और अदम्य साहस आज जब अखबारों के पास कंप्यूटर और हाई-स्पीड इंटरनेट है, तब ‘द मुसलमान’ के कातिब दो पंखों और कुछ बल्बों की रोशनी में घंटों बैठकर स्याही से पन्ने काले करते हैं। किताबत की कला अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है, लेकिन यहाँ काम करने वाले लोग अपनी “आखिरी सांस” तक इस परंपरा को निभाने के लिए तैयार हैं。
हालांकि कुछ लेखों में इसे पहला उर्दू अखबार बता दिया जाता है, जो तकनीकी रूप से गलत है क्योंकि उर्दू पत्रकारिता का इतिहास 1821-22 के ‘जाम-ए-जहाँ नुमा’ और ‘मिरातुल अखबार’ से शुरू होता है। ‘द मुसलमान’ की महानता इस बात में नहीं कि वह पहला है, बल्कि इस बात में है कि वह अपनी तरह का अकेला (Unique) है。
समय के साथ कदमताल भले ही इसकी लिखावट पुरानी शैली की हो, लेकिन सोच आधुनिक है। यह अखबार अब ईमेल के जरिए भी उपलब्ध है। हालांकि भुगतान के लिए वे आज भी बैंक ट्रांसफर के बजाय चेक या ऑफिस आकर पैसे देने जैसे पारंपरिक तरीकों को प्राथमिकता देते हैं।
निष्कर्ष ‘द मुसलमान’ सिर्फ कागज़ और स्याही का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह इंसानी जुनून की वह दास्तान है जो मशीनों को चुनौती दे रही है। यह याद दिलाता है कि हाथ से लिखे गए हर लफ्ज़ में एक जज़्बात होता है, जो टाइप किए गए शब्दों में शायद कहीं खो जाता है。 चेन्नई की गलियों में धड़कने वाला यह अखबार भारतीय संस्कृति, धर्मनिरपेक्षता और कला का एक ऐसा खजाना है जिसे सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी है।

