ढाका से सियासी बदलाव के संकेत: बीएनपी की वापसी, क्षेत्रीय समीकरणों पर नई बहस
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, ढाका
बांग्लादेश के 13वें राष्ट्रीय संसद चुनाव के अनौपचारिक नतीजों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) लगभग दो दशकों बाद पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटने जा रही है। 300 में से 299 सीटों के उपलब्ध रुझानों के मुताबिक ‘धान की बाली’ प्रतीक पर लड़ रहे बीएनपी उम्मीदवारों ने 175 सीटों पर जीत दर्ज की है—जो सरकार बनाने के लिए आवश्यक 151 के आंकड़े से काफी ऊपर है।
Jamaat-e-Islami के उम्मीदवार 56 सीटें जीत चुके हैं, जबकि जातीय नागरिक पार्टी (एनसीपी) को 6 सीटें मिली हैं। निर्दलीय और अन्य दलों के खाते में 11 सीटें गई हैं। शेष 42 सीटों के परिणाम प्रक्रियाधीन हैं, परंतु सत्ता समीकरण लगभग तय माना जा रहा है।
शीर्ष नेतृत्व की जीत और नई सरकार का चेहरा

बीएनपी अध्यक्ष Tarique Rahman ने ढाका-17 और बोगरा-6 दोनों सीटों से भारी अंतर से जीत दर्ज की है। पार्टी पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि सत्ता में आने पर वही प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। 17 वर्षों के निर्वासन के बाद 25 नवंबर को देश लौटे तारिक रहमान का यह पहला आम चुनाव था। 9 जनवरी को पार्टी की स्थायी समिति ने औपचारिक रूप से उन्हें अध्यक्ष घोषित किया था, इससे पहले 30 दिसंबर को बीएनपी प्रमुख Khaleda Zia का निधन हो गया था।
दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी के अमीर Shafiqur Rahman ने ढाका-15 से जीत हासिल की है। इस बार जमात के नेतृत्व वाला 11 दलों का गठबंधन मुख्य विपक्षी दल बनने की स्थिति में है—जो बांग्लादेशी राजनीति में एक नई परिस्थिति है।
‘बेगम युग’ के बाद का पहला बड़ा चुनाव
यह चुनाव उस दौर के बाद हो रहा है जिसे लंबे समय तक ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ कहा जाता रहा—बीएनपी की खालिदा जिया और अवामी लीग की शेख हसीना के बीच प्रतिस्पर्धा का काल। अवामी लीग पर प्रतिबंध और 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद यह पहला आम चुनाव है। विपक्षी प्रदर्शनों और महीनों तक चले राजनीतिक अस्थिरता ने रोजमर्रा की जिंदगी और प्रमुख उद्योगों—खासकर परिधान (गारमेंट्स) सेक्टर—को प्रभावित किया था। ऐसे में स्पष्ट जनादेश को स्थिरता की शर्त माना जा रहा है।
संसदीय गणित और जनमत
बांग्लादेश में सरकार बनाने के लिए 151 सीटें आवश्यक हैं। बीएनपी का अकेले इस आंकड़े को पार करना उसे मजबूत स्थिति देता है। चुनाव आयोग के अनुसार, 2,000 से अधिक उम्मीदवार मैदान में थे और 50 से अधिक दलों ने भाग लिया—जो एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड है। मतदान के साथ ‘नेशनल चार्टर 2025’ पर जनमत संग्रह भी हुआ, जिसमें तटस्थ अंतरिम सरकार की व्यवस्था, द्विसदनीय संसद, महिलाओं की प्रतिनिधित्व वृद्धि, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और प्रधानमंत्री के लिए दो कार्यकाल की सीमा जैसे प्रस्ताव शामिल हैं।
भारत-पाकिस्तान समीकरण: कितनी निकटता, किस हद तक?
नई सरकार के गठन के साथ ही सबसे बड़ा सवाल क्षेत्रीय कूटनीति का है। चुनाव से पहले बीएनपी नेतृत्व ने भारत के साथ संबंध सुधारने की बात कही थी, परंतु किस स्तर तक—यह अभी स्पष्ट नहीं। 2024 के बाद अंतरिम सरकार के दौरान इस्लामाबाद के साथ निकटता बढ़ने के संकेत मिले थे। यदि ढाका-इस्लामाबाद रिश्ते और प्रगाढ़ होते हैं, तो नई दिल्ली के लिए यह चिंता का विषय बन सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि बीएनपी को संतुलन साधना होगा—भारत के साथ व्यापार, सुरक्षा और जल-साझेदारी जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर सहयोग बनाए रखते हुए, पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक कटुता को सीमित रखने की नीति अपनानी पड़ सकती है। चीन की बढ़ती सक्रियता भी इस त्रिकोणीय समीकरण को जटिल बनाती है।
तारिक रहमान की राजनीतिक यात्रा
तारिक रहमान 1980 के दशक में इरशाद विरोधी आंदोलन के दौरान सक्रिय हुए। 1988 में बोगरा के गबतौली उपजिला बीएनपी से उनकी औपचारिक राजनीतिक शुरुआत हुई। 2002 में वे वरिष्ठ संयुक्त महासचिव बने और 2009 में वरिष्ठ उपाध्यक्ष। 2018 में खालिदा जिया के जेल जाने के बाद उन्होंने कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व संभाला और अवामी लीग सरकार के खिलाफ संयुक्त आंदोलनों का नेतृत्व किया।

आगे की राह
स्पष्ट बहुमत बीएनपी को निर्णायक नीति-निर्माण का अवसर देता है, लेकिन अपेक्षाएं भी उतनी ही बड़ी हैं—भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, महंगाई से राहत, रोजगार सृजन और निवेश माहौल में सुधार। गारमेंट्स सेक्टर की बहाली और विदेशी निवेश का भरोसा लौटाना प्राथमिकता होगी।
साथ ही, विपक्ष की मजबूत मौजूदगी संसद में तीखी बहसों का संकेत देती है। क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए ढाका को संतुलित विदेश नीति और आंतरिक सुधारों का रोडमैप स्पष्ट करना होगा।
कुल मिलाकर, 13वां संसदीय चुनाव बांग्लादेश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत करता दिख रहा है—जहां बीएनपी की वापसी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समीकरणों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की दिशा तय करने वाला मोड़ बन सकती है।

