नफ़रत के दौर में मोहब्बत की मिसाल: मुस्लिम दंपति ने हिंदू बेटे की शादी हिंदू रीति-रिवाज से कराई
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, हैदराबाद
देश में जहां अक्सर हिंदू-मुस्लिम तनाव की खबरें सुर्खियां बनती हैं, वहीं कर्नाटक के बेलगावी जिले से आई एक खबर ने सामाजिक सौहार्द की नई मिसाल पेश की है। हुक्केरी कस्बे के बस्तवाड़ा गांव में एक मुस्लिम दंपति ने अपने गोद लिए हिंदू बेटे की शादी पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ संपन्न कराई।
यह कहानी है मेहबूब हसन नाइकवाड़ी और उनकी पत्नी नूरजहां नाइकवाड़ी की, जिन्होंने लगभग 20 वर्ष पहले एक सड़क दुर्घटना और बीमारी में माता-पिता को खो चुके दो छोटे हिंदू बच्चों को अपनाया था। उन बच्चों में से बड़े बेटे सोमशेखर पुजारी की शादी हाल ही में पूनम के साथ कादासिद्धेश्वर मंदिर में पारंपरिक हिंदू विधि-विधान से कराई गई।

20 साल पुराना वादा, जो आज भी निभाया जा रहा है
करीब दो दशक पहले, गांव के ही निवासी शिवानंद कदैय्या पुजारी और उनकी पत्नी शैला का असमय निधन हो गया था। उस समय सोमशेखर मात्र चार वर्ष के थे और उनका छोटा भाई वसंत उससे भी कम उम्र का था। परिवार में कोई करीबी रिश्तेदार बच्चों की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था।
शिवानंद, मेहबूब हसन के घनिष्ठ मित्र थे। जब हालात गंभीर हुए, तो नूरजहां ने शैला से अस्पताल में वादा किया था—“आप चिंता मत कीजिए, आपके बच्चे अब हमारे भी बच्चे हैं। हम उन्हें अपने बच्चों की तरह पालेंगे।”
यह सिर्फ एक सांत्वना नहीं थी, बल्कि जीवन भर निभाया गया संकल्प था। नाइकवाड़ी दंपति ने अपने पांच बच्चों के साथ इन दोनों अनाथ बच्चों को भी समान स्नेह और अवसर दिए।
शिक्षा, संस्कार और समानता
मेहबूब हसन, जो कर्नाटक राज्य परिवहन निगम (KSRTC) में चालक रहे हैं, सीमित साधनों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई और परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी। सोमशेखर ने विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और वर्तमान में बेलगावी की एक एविएशन कंपनी में कार्यरत हैं।
सोमशेखर कहते हैं, “हमें कभी यह महसूस नहीं हुआ कि हम इस परिवार का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने हमें अपने बच्चों की तरह पढ़ाया-लिखाया और हर जरूरत पूरी की।”
नूरजहां बताती हैं कि उनके घर में हिंदू और मुस्लिम दोनों त्योहार मिलकर मनाए जाते हैं। “हमारे लिए धर्म से पहले इंसानियत है। जब सोमशेखर की शादी हुई, तो मैं उसकी मां की तरह हर रस्म में साथ खड़ी थी,” वे भावुक होकर कहती हैं।
गांव बना गवाह
हुक्केरी के कादासिद्धेश्वर मंदिर में हुई इस शादी में गांव के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। स्थानीय समुदाय के नेताओं ने भी इस पहल की सराहना की। सामाजिक कार्यकर्ता बसवप्रभु वंतामुरी ने समारोह में कहा, “आज जब समाज में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है, मेहबूब हसन का यह कदम पूरे देश के लिए उदाहरण है।”
शादी के दौरान नाइकवाड़ी दंपति ने दूल्हे के माता-पिता की भूमिका निभाई। हर फेरा, हर आशीर्वाद में वे साथ रहे। इस दृश्य ने उपस्थित लोगों की आंखें नम कर दीं।
नफ़रत के माहौल में उम्मीद की किरण
पिछले कुछ वर्षों में देश के कई हिस्सों से सांप्रदायिक तनाव की खबरें सामने आई हैं। ऐसे समय में यह घटना न केवल एक परिवार की कहानी है, बल्कि सामाजिक समरसता का संदेश भी है।
मेहबूब हसन कहते हैं, “मैंने कोई असाधारण काम नहीं किया। इस देश में हर इंसान एक परिवार की तरह है। मुझे संतोष है कि मैंने अपने दोस्त से किया वादा निभाया।”
वे अब अपने दूसरे गोद लिए बेटे वसंत की शादी का इंतजार कर रहे हैं। 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके मेहबूब हसन के पास ज्यादा संपत्ति नहीं है, लेकिन उनके पास जो है—वह है इंसानियत की पूंजी।
एक संदेश, जो दूर तक जाएगा
सोमशेखर ने भी समाज से अपील की, “अगर अलग-अलग धर्म और जाति के लोग हमारे परिवार की तरह साथ रहें, तो नफरत की कोई जगह नहीं बचेगी।”
यह शादी सिर्फ दो दिलों का मिलन नहीं थी, बल्कि दो समुदायों के बीच विश्वास और प्रेम का उत्सव थी।
आज जब समाज में विभाजन की बातें होती हैं, हुक्केरी का यह छोटा-सा गांव हमें याद दिलाता है कि मोहब्बत, विश्वास और इंसानियत किसी भी दीवार से ऊंची होती है।

