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जिनेवा में 17 फरवरी को अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता संभव, बढ़ा वैश्विक कूटनीतिक दबाव

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से ठप पड़े परमाणु समझौते को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देश 17 फरवरी को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में नए दौर की वार्ता करने जा रहे हैं। यह बैठक ऐसे समय में प्रस्तावित है जब पश्चिम एशिया में तनाव, प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाइयों के बाद स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है।

सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी पक्ष की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर वार्ता में शामिल हो सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में इस मुद्दे पर स्पष्ट संकेत दिए थे कि ईरान के साथ समझौता जरूरी है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि यदि समझौता नहीं हुआ तो परिणाम “बेहद दर्दनाक” हो सकते हैं। ट्रम्प ने इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ अपनी हालिया मुलाकात को “बहुत सकारात्मक” बताते हुए यह भी संकेत दिया कि वॉशिंगटन इस मुद्दे को लेकर गंभीर है।

परमाणु समझौते की पृष्ठभूमि
ईरान का परमाणु विवाद वर्ष 2015 में हुए संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) समझौते से जुड़ा है। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन स्तर को 3.67 प्रतिशत तक सीमित करने और अपने भंडार को 300 किलोग्राम तक घटाने पर सहमति जताई थी। इसके बदले में उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में ढील दी गई थी। लेकिन वर्ष 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अमेरिका को इस समझौते से एकतरफा अलग करने के बाद यह करार लगभग निष्क्रिय हो गया। इसके बाद से दोनों देशों के संबंधों में तीखा तनाव बना रहा।

पिछली वार्ताएँ और सैन्य तनाव
अप्रैल 2025 में ओमान की राजधानी मस्कट और इटली की राजधानी रोम में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता के दौर हुए थे। हालांकि, जून 2025 में ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत अमेरिका ने ईरान के फोर्दो, नतांज़ और इस्फहान स्थित परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए। इन हमलों को लेकर तेहरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन बताया। इसके बाद वार्ता प्रक्रिया लगभग ठप पड़ गई थी।

अब जिनेवा में प्रस्तावित बैठक को दोनों देशों के बीच संवाद बहाली की एक अहम कड़ी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वार्ता सकारात्मक दिशा में बढ़ती है, तो क्षेत्रीय तनाव कम करने और प्रतिबंधों में संभावित राहत का रास्ता खुल सकता है।

इज़राइल और क्षेत्रीय समीकरण
अमेरिका-ईरान वार्ता का सीधा संबंध पश्चिम एशिया की सुरक्षा से भी है। इज़राइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहा है। ट्रम्प-नेतन्याहू मुलाकात के बाद यह स्पष्ट संकेत मिला है कि वॉशिंगटन, तेल अवीव की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए किसी भी समझौते की रूपरेखा तैयार करेगा। ऐसे में जिनेवा वार्ता केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय संतुलन से भी जुड़ी है।

रूस और वैश्विक कूटनीति
इसी दौरान रूसी समाचार एजेंसी के हवाले से यह जानकारी भी सामने आई है कि 17-18 फरवरी को जिनेवा में रूस, यूक्रेन और अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय बैठक भी प्रस्तावित है। हालांकि यह बैठक अलग मुद्दों पर केंद्रित होगी, लेकिन जिनेवा का कूटनीतिक केंद्र के रूप में चयन यह दर्शाता है कि यूरोप एक बार फिर वैश्विक वार्ताओं का मंच बन रहा है।

आगे की राह
विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की गहरी खाई को पाटना आसान नहीं होगा। प्रतिबंधों, सैन्य कार्रवाइयों और राजनीतिक बयानबाज़ी ने दोनों पक्षों के बीच भरोसे को कमजोर किया है। फिर भी, कूटनीति ही वह माध्यम है जिससे समाधान की संभावना बन सकती है।

जिनेवा में होने वाली वार्ता से यह स्पष्ट होगा कि क्या दोनों देश पुराने समझौते को पुनर्जीवित करने या किसी नए ढांचे पर सहमत हो पाते हैं। यदि सहमति बनती है, तो यह न केवल पश्चिम एशिया बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी सकारात्मक संकेत होगा। वहीं, असफलता की स्थिति में क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है।

दुनिया की निगाहें अब 17 फरवरी पर टिकी हैं, जब जिनेवा में अमेरिका और ईरान एक बार फिर आमने-सामने होंगे—यह देखने के लिए कि क्या संवाद से टकराव की राह बदली जा सकती है।