जॉर्डन, क़तर, तुर्की ने जताई आपत्ति: वेस्ट बैंक पर इज़रायल का कदम विवादों में
मुस्लिम नाउ ब्यूरो | रामल्लाह / येरुशलम / दोहा
इज़रायल की सरकार ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसने पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक (पश्चिमी तट) के बड़े हिस्सों को “राज्य संपत्ति” के रूप में दर्ज करने की योजना को मंजूरी दे दी गई है। इस प्रस्ताव के तहत यदि फ़िलिस्तीनी अपने भूमि स्वामित्व के दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं कर पाते, तो वह ज़मीन इज़रायली राज्य के नाम दर्ज की जा सकेगी। इस फैसले को लेकर फ़िलिस्तीनी नेतृत्व, हमास, क्षेत्रीय देशों और मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और इसे “व्यवहारिक विलय” (De-facto Annexation) करार दिया है।
इज़रायल के सरकारी प्रसारक ‘कान’ के अनुसार यह प्रस्ताव वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच, न्याय मंत्री यारिव लेविन और रक्षा मंत्री इज़रायल काट्ज़ की ओर से पेश किया गया था। स्मोट्रिच ने इसे “सेटलमेंट क्रांति” का विस्तार बताया और कहा कि यह कदम “हमारी सभी ज़मीनों पर नियंत्रण मजबूत करने” की दिशा में उठाया गया है। वहीं न्याय मंत्री लेविन ने इसे सरकार की उस प्रतिबद्धता का हिस्सा बताया जिसके तहत वह पूरे क्षेत्र पर अपनी पकड़ सुदृढ़ करना चाहती है।
यह निर्णय 1967 से जमे एक जटिल भूमि-पंजीकरण विवाद को फिर से सक्रिय करता है। इज़रायल ने वेस्ट बैंक पर 1967 के युद्ध के बाद कब्ज़ा कर लिया था और तब से भूमि स्वामित्व के मामलों में कानूनी प्रक्रियाएँ लगभग ठप पड़ी थीं। अब सरकार भूमि शीर्षक (Land Title) के पंजीकरण की प्रक्रिया फिर शुरू करेगी। इसके तहत किसी भी क्षेत्र में पंजीकरण शुरू होते ही भूमि पर दावा करने वालों को स्वामित्व साबित करने के लिए दस्तावेज़ पेश करने होंगे।
लेकिन यहीं से विवाद गहराता है। दशकों के कब्ज़े, विस्थापन और संघर्ष के कारण फ़िलिस्तीनियों के पास कई बार आवश्यक दस्तावेज़ नहीं बचे हैं। कई रिकॉर्ड युद्धों में नष्ट हो चुके हैं या प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझे रहे हैं। ऐसे में फ़िलिस्तीनी नेतृत्व का कहना है कि यह प्रक्रिया वस्तुतः उनकी ज़मीनें छीनने का एक कानूनी औजार बन सकती है।
फ़िलिस्तीनी राष्ट्रपति कार्यालय ने इस निर्णय को “अंतरराष्ट्रीय क़ानून का घोर उल्लंघन” बताया है। बयान में कहा गया कि यह कदम “एक गंभीर उकसावा” है और इसका उद्देश्य वेस्ट बैंक के क्षेत्रों को धीरे-धीरे इज़रायल में शामिल करना है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।
हमास ने भी इस निर्णय की निंदा करते हुए इसे “अवैध कब्ज़ेदार शक्ति का शून्य और अमान्य फैसला” करार दिया। संगठन का कहना है कि यह कदम वेस्ट बैंक में “जुदाईकरण और सेटलमेंट विस्तार” की नीति को ज़मीन पर लागू करने की कोशिश है। हमास ने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और चौथे जिनेवा कन्वेंशन का खुला उल्लंघन है।
यह योजना वेस्ट बैंक के उस हिस्से पर लागू होगी जिसे ‘एरिया सी’ कहा जाता है। ओस्लो समझौतों के तहत वेस्ट बैंक को तीन हिस्सों—एरिया ए, बी और सी—में बांटा गया था। एरिया सी पर पूर्ण रूप से इज़रायली सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण है। अनुमान है कि यहां तीन लाख से अधिक फ़िलिस्तीनी रहते हैं, जबकि आसपास की बस्तियाँ भी अपनी कृषि और चरागाह भूमि के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं।
इज़रायली मानवाधिकार संगठन ‘पीस नाउ’ ने इस कदम को “मेगा लैंड ग्रैब” यानी बड़े पैमाने पर भूमि कब्ज़ा बताया है। संगठन की ‘सेटलमेंट वॉच’ निदेशक हगित ओफरान के अनुसार यदि यह प्रक्रिया पूरी तरह लागू होती है, तो एरिया सी के लगभग 83 प्रतिशत हिस्से पर इज़रायल नियंत्रण स्थापित कर सकता है, जो पूरे वेस्ट बैंक का लगभग आधा हिस्सा है। उनका कहना है कि फ़िलिस्तीनियों को ऐसे कानूनी मानदंडों के तहत स्वामित्व साबित करना होगा जिन्हें पूरा करना लगभग असंभव है।
राजनीतिक विश्लेषक जेवियर अबू ईद का मानना है कि यह “विलय को प्रशासनिक प्रक्रिया में पैक करने” की रणनीति है। उनके अनुसार इज़रायल सरकार सीधे विलय की घोषणा किए बिना ज़मीन पर वही परिणाम हासिल करना चाहती है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे वेस्ट बैंक का कानूनी और प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा और फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण की भूमिका और कमजोर होगी।
इस निर्णय पर क्षेत्रीय देशों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। जॉर्डन के विदेश मंत्रालय ने इसे “अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन” बताया। क़तर, मिस्र और तुर्की ने भी कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इज़रायल का यह कदम शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचाएगा और दो-राष्ट्र समाधान की संभावनाओं को कमजोर करेगा। मिस्र ने विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 (2016) का हवाला दिया, जिसमें वेस्ट बैंक में सेटलमेंट विस्तार को अवैध बताया गया था।
अमेरिका की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि पूर्व अमेरिकी प्रशासन वेस्ट बैंक में सेटलमेंट विस्तार की आलोचना करता रहा है। वर्तमान में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच करीबी संबंधों की चर्चा है। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से वेस्ट बैंक के औपचारिक विलय का समर्थन नहीं किया, लेकिन उनकी सरकार ने सेटलमेंट निर्माण को रोकने के लिए ठोस कदम भी नहीं उठाए हैं।
संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च अदालत ने 2024 में एक सलाहकारी राय में कहा था कि इज़रायल का कब्ज़ा और वेस्ट बैंक में बस्तियाँ अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध हैं और इन्हें समाप्त किया जाना चाहिए। हालांकि यह राय बाध्यकारी नहीं थी, फिर भी उसने वैश्विक स्तर पर बहस को तेज कर दिया।
विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला केवल भूमि पंजीकरण का मामला नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। यदि एरिया सी का बड़ा हिस्सा “राज्य संपत्ति” घोषित हो जाता है, तो वहां नए सेटलमेंट निर्माण, बुनियादी ढांचे के विस्तार और फ़िलिस्तीनियों के विस्थापन की संभावनाएँ बढ़ जाएँगी। इससे क्षेत्र में तनाव और हिंसा की आशंका भी गहरा सकती है।
कुल मिलाकर, वेस्ट बैंक में इज़रायल का यह कदम मध्य पूर्व की पहले से जटिल भू-राजनीति को और उलझा सकता है। फ़िलिस्तीनी इसे अपनी ज़मीन और अधिकारों पर सीधा हमला मान रहे हैं, जबकि इज़रायल इसे प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बता रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे पर कितनी सक्रियता दिखाता है और क्या दो-राष्ट्र समाधान की संभावनाएँ और धुंधली हो जाती हैं।

