हल्द्वानी में रमज़ान के दौरान धार्मिक सहूलियत की पहल: रोहित शर्मा बने भाईचारे की मिसाल
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, देहरादून
उत्तराखंड को लेकर अक्सर सियासी और सामाजिक बहसें तेज़ रहती हैं। कभी इसे सख़्त प्रशासनिक फैसलों की प्रयोगशाला कहा जाता है, तो कभी साम्प्रदायिक तनाव की खबरें सुर्खियां बनती हैं। लेकिन इसी उत्तराखंड की धरती पर समय-समय पर ऐसे चेहरे सामने आते रहे हैं, जो नफ़रत की लकीरों को मिटाकर इंसानियत की नई इबारत लिखते हैं। कोटद्वार के ‘मोहम्मद दीपक’ के बाद अब हल्द्वानी के बनभूलपुरा से एक और ऐसी ही मिसाल सामने आई है, जहां एक हिंदू युवक रोहित शर्मा ने रमज़ान के दौरान मुस्लिम दुकानदारों और रोज़ेदारों को सहूलियत दिलाने के लिए प्रशासन से पहल की है।
हल्द्वानी के संवेदनशील माने जाने वाले बनभूलपुरा क्षेत्र में रमज़ान के मद्देनज़र रात्रिकालीन पाबंदियां लागू थीं। इन पाबंदियों के चलते बाज़ारों और दुकानों को निर्धारित समय के बाद बंद करना अनिवार्य था। जबकि रमज़ान के महीने में मुस्लिम समुदाय की दिनचर्या सामान्य दिनों से अलग होती है। इफ़्तार के बाद बाज़ारों में रौनक बढ़ती है, तरावीह की नमाज़ देर रात तक अदा की जाती है और सहरी की तैयारी के लिए भी लोग रात में सक्रिय रहते हैं। ऐसे में रात्रि प्रतिबंध रोज़ेदारों और दुकानदारों के लिए व्यावहारिक दिक्कतें पैदा कर रहा था।
इसी पृष्ठभूमि में रोहित शर्मा ने पहल करते हुए प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने मांग की कि रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान मुस्लिम दुकानदारों को देर रात तक दुकानें खोलने की अनुमति दी जाए, ताकि वे अपनी धार्मिक और आर्थिक गतिविधियां सहज रूप से संचालित कर सकें। रोहित का यह कदम केवल एक प्रशासनिक अनुरोध नहीं, बल्कि धार्मिक समरसता का प्रतीक बनकर उभरा।
ज्ञापन में यह स्पष्ट किया गया कि रमज़ान इबादत, संयम और आध्यात्मिक साधना का महीना है। इस दौरान मस्जिदों में देर रात तक नमाज़ अदा की जाती है और समुदाय शांतिपूर्ण ढंग से अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करता है। बनभूलपुरा क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और पार्षदों के प्रतिनिधिमंडल ने भी प्रशासन को आश्वस्त किया कि क्षेत्र में कानून व्यवस्था की स्थिति सामान्य रहती है और बाजारों में रात के समय सीमित गतिविधियां होती हैं। इसलिए रात्रिकालीन पाबंदी में अस्थायी राहत दी जानी चाहिए।
रोहित शर्मा का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर यह पहल की। उन्होंने यह संदेश दिया कि धार्मिक अधिकारों की रक्षा केवल संबंधित समुदाय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। जब एक हिंदू युवक रमज़ान के दौरान मुस्लिम दुकानदारों की सुविधा के लिए आगे आता है, तो यह भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब की सजीव तस्वीर बन जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रात्रि पाबंदी के कारण सहरी की तैयारी और आवश्यक खरीदारी में दिक्कतें आती थीं। कई परिवारों को आवश्यक वस्तुएं समय पर नहीं मिल पाती थीं। ऐसे में यह पहल रोज़मर्रा की समस्याओं के समाधान की दिशा में सकारात्मक कदम है। प्रतिनिधिमंडल ने प्रशासन से अनुरोध किया कि रमज़ान की अवधि तक विशेष छूट दी जाए, ताकि धार्मिक गतिविधियों में किसी प्रकार की बाधा न आए।
यह घटना उस व्यापक सामाजिक संदेश को भी रेखांकित करती है, जो भारत की पहचान है—विविधता में एकता। हाल ही में कोटद्वार में दीपक कुमार ने भीड़ के उग्र होने पर शांति और इंसानियत का परिचय देते हुए धार्मिक सौहार्द का उदाहरण पेश किया था। अब हल्द्वानी में रोहित शर्मा ने एक और अध्याय जोड़ दिया है। यह सिलसिला बताता है कि समाज में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो विभाजन की राजनीति से ऊपर उठकर साझा संस्कृति को मजबूत करने में विश्वास रखते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक निर्णयों में स्थानीय सामाजिक ताने-बाने को समझना आवश्यक है। जब समुदाय स्वयं आश्वस्त करे कि शांति और कानून व्यवस्था बनी रहेगी, तो धार्मिक पर्वों के दौरान लचीला रवैया अपनाना सामाजिक समरसता को मजबूत करता है। रोहित शर्मा और अन्य जनप्रतिनिधियों की यह पहल इसी दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है।
रमज़ान केवल मुसलमानों का धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग और संवेदनशीलता की भी परीक्षा है। रोज़ा संयम, धैर्य और आत्मानुशासन का प्रतीक है। ऐसे समय में यदि समाज के अन्य वर्ग सहयोग का हाथ बढ़ाते हैं, तो यह आपसी विश्वास को गहरा करता है। बनभूलपुरा की यह पहल यही संदेश देती है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकती है।
अब निगाहें प्रशासन के फैसले पर टिकी हैं। क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि प्रशासन सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएगा और रमज़ान के दौरान आवश्यक राहत प्रदान करेगा। यदि ऐसा होता है, तो यह केवल एक आदेश नहीं होगा, बल्कि भाईचारे और पारस्परिक सम्मान की जीत होगी।
हल्द्वानी की यह घटना बताती है कि तमाम बहसों और आरोप-प्रत्यारोप के बीच भारत की आत्मा अभी भी जीवित है। यहां इंसानियत की आवाज़ कभी पूरी तरह दब नहीं सकती। जब रोहित शर्मा जैसे युवा आगे आते हैं, तो वे साबित करते हैं कि सेक्युलर भारत केवल एक नारा नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत है। यही वह भावना है, जो देश को जोड़ती है और हर चुनौती के बीच उम्मीद की नई किरण जगाती है।

