‘द केरल स्टोरी 2’ पर नया विवाद: मौलाना हसन अली रजनी ने उठाए सवाल, फिल्म पर बैन की मांग
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
भारत में एक बार फिर सिनेमा और समाज के रिश्ते को लेकर बहस तेज हो गई है। वर्ष 2023 में आई चर्चित और विवादास्पद फिल्म द केरल स्टोरी के बाद अब 27 फरवरी 2026 को रिलीज होने जा रही द केरल स्टोरी 2 को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। फिल्म का टीज़र सामने आते ही विभिन्न मुस्लिम संगठनों और धार्मिक नेताओं ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि यह फिल्म भी उसी कथित ‘प्रोपेगेंडा नैरेटिव’ को आगे बढ़ा रही है, जिसने पहले ही देश में सामाजिक तनाव को बढ़ाया था।
‘सांस्कृतिक युद्ध’ की नई कड़ी?
आलोचकों का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में ऐसी फिल्मों की एक श्रृंखला सामने आई है, जिन्हें वे ‘सांस्कृतिक युद्ध’ का हिस्सा मानते हैं। द कश्मीर फाइल्स और अन्य फिल्मों के बाद अब द केरल स्टोरी 2 को भी उसी कड़ी में देखा जा रहा है। विरोध करने वालों का तर्क है कि जब पहली फिल्म की सामग्री को लेकर अदालतों में सवाल उठे और कई दावों को ‘काल्पनिक’ या ‘अतिरंजित’ बताया गया, तो फिर उसी कथानक को आगे बढ़ाने वाली नई फिल्म की अनुमति कैसे दी जा रही है?
मौलाना हसन अली रजनी का बयान
शिया धर्मगुरु मौलाना हसन अली रजनी ने इस फिल्म की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि “यदि पहली फिल्म को लेकर यह स्पष्ट किया गया था कि उसमें कई दावे मनगढ़ंत थे, तो फिर उसके सीक्वल को क्यों अनुमति दी जा रही है?” उन्होंने सेंसर बोर्ड (CBFC) की भूमिका पर भी सवाल उठाए और पूछा कि “कुछ फिल्मों में सीन हटाए जाते हैं, नाम बदले जाते हैं, लेकिन यहां अलग मापदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं?”
मौलाना रजनी ने आरोप लगाया कि फिल्म के टीज़र में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि आने वाले वर्षों में मुसलमान पूरे भारत पर कब्जा कर लेंगे और इस्लामी कानून लागू कर देंगे। उन्होंने कहा, “जब भारत में मुसलमानों की आबादी 20 प्रतिशत से भी कम है, तो शरिया कानून लागू करने का दावा किस आधार पर किया जा रहा है? यह पूरी तरह काल्पनिक और भय पैदा करने वाला नैरेटिव है।”
‘डर का माहौल’ बनाने का आरोप
विरोध करने वालों का कहना है कि देश की लगभग 100 करोड़ हिंदू आबादी को 20 करोड़ मुसलमानों से ‘खतरा’ दिखाकर सामाजिक ध्रुवीकरण की कोशिश की जा रही है। उनका तर्क है कि इतनी बड़ी बहुसंख्यक आबादी के बीच अल्पसंख्यकों को खतरे के रूप में प्रस्तुत करना तार्किक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अविश्वास को बढ़ाने का प्रयास है।
मौलाना रजनी ने यह भी कहा कि फिल्म में गैर-मुस्लिम लड़कियों के जबरन धर्मांतरण, उत्पीड़न और हिंसा जैसे दृश्य दिखाए गए हैं, जो उनके अनुसार “पूरी तरह झूठे और समाज को बदनाम करने वाले” हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी फिल्में सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं और सांप्रदायिक तनाव को जन्म दे सकती हैं।
ईरान मॉडल पर टिप्पणी
दिलचस्प रूप से मौलाना रजनी ने अपने बयान में ईरान के राजनीतिक मॉडल की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि “यदि मुस्लिम बहुल देशों में भी इस्लामी शासन के मॉडल पर मतभेद हैं, तो भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुधर्मी देश में इस तरह के दावे कैसे संभव हैं?” उनके अनुसार, धर्म और राजनीति को मिलाकर भय का माहौल बनाना उचित नहीं है।
सेंसर बोर्ड और कानून पर सवाल
फिल्म को लेकर उठे विवाद के बीच सेंसर बोर्ड की भूमिका भी चर्चा में है। मौलाना रजनी ने सवाल किया कि यदि कुछ फिल्मों में आपत्तिजनक दृश्यों को हटाने या नाम बदलने के निर्देश दिए जाते हैं, तो यहां समान मानदंड क्यों नहीं अपनाए गए? उन्होंने सरकार से अपील की कि सिनेमैटोग्राफ एक्ट के तहत ऐसी फिल्मों की अनुमति देने से पहले उनके सामाजिक प्रभाव का गंभीरता से आकलन किया जाए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी
फिल्म समर्थकों का कहना है कि सिनेमा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माध्यम है और किसी भी विषय पर फिल्म बनाना रचनात्मक अधिकार है। वहीं विरोध करने वाले इसे सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि किसी समुदाय को संदेह और भय के घेरे में खड़ा किया जाए।
आगे क्या?
फिलहाल फिल्म की रिलीज की तारीख नजदीक है और विरोध की आवाजें तेज होती जा रही हैं। कुछ संगठनों ने फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है, जबकि अन्य ने अदालत का दरवाजा खटखटाने की संभावना जताई है।
यह विवाद केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय समाज में सिनेमा की भूमिका, अभिव्यक्ति की सीमा और सामाजिक सद्भाव के संतुलन पर व्यापक बहस का संकेत है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और सेंसर बोर्ड इस पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या यह फिल्म बिना किसी बदलाव के रिलीज हो पाएगी या नहीं।
रिलीज से पहले ही द केरल स्टोरी 2 ने जिस तरह राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दिया है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में रहेगा।

