Religion

जब एपीजे अब्दुल कलाम ने तीसरी, दिलीप कुमार ने आखिरी सफ में और फखरूद्दीन अली अहमद ने मस्जिद के दरवाजे पर जूता हटाकर नमाज पढ़ी

मुस्लिम नाउ विशेष

रमज़ान के पवित्र महीने में इबादत के साथ-साथ कुछ ऐसी पुरानी यादें भी ताज़ा हो जाती हैं, जो इस्लाम की मूल आत्मा—बराबरी, सादगी और भाईचारे—को उजागर करती हैं। हाल ही में रामपुर से सांसद मोहिबुल्ला नदवी द्वारा एक पॉडकास्ट में सुनाया गया किस्सा फिर चर्चा में है। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस उसूल की मिसाल है जो मस्जिद की दहलीज पर हर तरह की ऊंच-नीच को खत्म कर देता है।

मोहिबुल्ला नदवी, जो कभी पार्लियामेंट मस्जिद में इमामत कर चुके हैं, बताते हैं कि एक दिन उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के प्रेस सेक्रेटरी एस.एम. खान का फोन आया। संदेश था—“सर, राष्ट्रपति साहब आपके यहां नमाज़ पढ़ना चाहते हैं।” नमाज़ का वक्त हुआ, मस्जिद में सफें भर चुकी थीं। डॉ. कलाम तीसरी सफ में बैठ गए। अगली सफ में बैठे दो लोग सम्मानवश उठ खड़े हुए और आग्रह किया—“सर, आप आगे आ जाइए।”

लेकिन डॉ. कलाम ने मुस्कुराकर कहा—“मस्जिद का उसूल है, जहां जिसे जगह मिले, वहीं बैठे। आप अपनी जगह बैठिए, मैं अपनी जगह बैठता हूं।” यह वाक्य उस शख्स की सादगी का बयान था, जिसने देश का सर्वोच्च पद संभाला, लेकिन इबादत के समय खुद को आम मुसलमान से अलग नहीं माना।

ईद की नमाज़ के बाद जब लोग इमाम से मुसाफ़ा करने के लिए पंक्ति में खड़े हुए, तब भी एक दिलचस्प दृश्य सामने आया। लोग राष्ट्रपति को देखकर लाइन से हटने लगे, ताकि वे पहले मुसाफ़ा कर सकें। मगर डॉ. कलाम ने कहा—“जब मेरी बारी आएगी, तब मैं मुसाफ़ा करूंगा।” यह सिर्फ़ तहज़ीब नहीं थी, बल्कि इस्लामी बराबरी का जीता-जागता उदाहरण था।

ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद का एक वाकया भी याद किया जाता है। एक जुमे की नमाज़ के लिए जब डॉ. कलाम पहुंचे, तो मस्जिद पहले ही भर चुकी थी। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के दरवाज़े के पास ही नमाज़ अदा की। वहीं, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी जब पार्लियामेंट के सामने वाली मस्जिद में जुमे की नमाज़ के लिए आते थे, तो सबसे पिछली सफ में बैठते थे।

लखनऊ का एक और प्रसंग अक्सर दोहराया जाता है। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने एक बार मस्जिद के बाहर जूते हटवाकर सादगी से नमाज़ पढ़ी। वहां कोई प्रोटोकॉल नहीं था, कोई विशेष स्थान नहीं—सिर्फ़ एक बंदा और उसका रब।

मुंबई में एक बुजुर्ग नमाज़ी का बयान भी इन दिनों सोशल मीडिया पर घूम रहा है। उनका कहना है कि उन्होंने मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार को मस्जिद में सबसे पिछली सफ में नमाज़ पढ़ते देखा। न कोई विशेष व्यवस्था, न कोई भीड़ का दबाव—सिर्फ़ वही सादगी, जो इस्लाम की पहचान है।

इन घटनाओं की याद ऐसे समय में हो रही है जब समाज में पहचान और हैसियत के आधार पर विभाजन की राजनीति तेज़ है। कुछ लोग ‘पसमांदा’ और ‘अशराफ’ के नाम पर मुस्लिम समाज में दरार डालने की कोशिश करते हैं। लेकिन मस्जिद की सफ इन सभी विभाजनों को खारिज कर देती है। यहां बादशाह और नौकर एक ही कतार में खड़े होते हैं। मशहूर शेर की पंक्तियां इस दृश्य को बयां करती हैं—
“एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़,
न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा नवाज़।”

यह केवल काव्यात्मक पंक्ति नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश है। इस्लाम में इबादत का मूल भाव यही है कि इंसान अपनी हैसियत, पद और पहचान को पीछे छोड़कर अल्लाह के सामने खड़ा हो। वहां न राष्ट्रपति बड़ा है, न अभिनेता मशहूर, न कोई अधिकारी विशिष्ट। सब बराबर हैं।

गुरुग्राम में ईद की नमाज़ का एक ताज़ा प्रसंग भी इसी भावना को दर्शाता है। एक मुस्लिम पुलिस कमिश्नर को प्रमुख स्थान न मिलने पर वे अपने बेटे के साथ बेसमेंट में नमाज़ पढ़ने चले गए। न कोई शिकायत, न कोई नाराज़गी—बस वही सादगी और अनुशासन।

सोशल मीडिया पर इन घटनाओं को साझा करते हुए कई लोगों ने लिखा कि इस्लाम की यही खूबसूरती है—बराबरी और भाईचारा। यही वजह है कि दुनिया भर में लोग इस संदेश की ओर आकर्षित होते हैं। हालांकि आस्था का विषय व्यक्तिगत होता है, लेकिन बराबरी का सिद्धांत सार्वभौमिक है।

रमज़ान आत्मचिंतन का महीना है। ऐसे में ये किस्से सिर्फ़ प्रेरणादायक नहीं, बल्कि समाज के लिए आईना भी हैं। जब राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में विभाजन की आवाज़ें तेज़ हों, तब मस्जिद की सफ हमें याद दिलाती है कि असली ताकत एकता में है।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन सादगी की मिसाल था। उन्होंने राष्ट्रपति भवन की शानो-शौकत के बावजूद ज़मीन से जुड़ाव बनाए रखा। मस्जिद की तीसरी सफ में बैठना या अपनी बारी का इंतज़ार करना उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा था।

आज जब ये घटनाएं फिर चर्चा में हैं, तो उनका संदेश स्पष्ट है—इस्लाम की बुनियाद में बराबरी है। यहां ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं। मस्जिद की दहलीज पर हर पहचान मिट जाती है, और रह जाता है सिर्फ़ इंसान और उसकी इबादत।

रमज़ान की रौशनी में ये किस्से हमें याद दिलाते हैं कि समाज की असली मजबूती पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि विनम्रता और समानता से आती है। और शायद यही इस्लाम की सबसे बड़ी खूबसूरती है—एक सफ, एक सिजदा, एक खुदा, और सब बराबर।