राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: फतेहपुर-सीकर दरगाह के सज्जादानशीन के हक में आया फैसला
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो,जयपुर/सीकर।
राजस्थान की धार्मिक और सामाजिक हलचलों के बीच एक अहम कानूनी लड़ाई पर आज निर्णायक विराम लग गया। राजस्थान हाई कोर्ट ने 24 फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश सुनाते हुए फतेहपुर-सीकर स्थित दरगाह हज़रत ख्वाजा हाजी मोहम्मद नजमुद्दीन साहिब सुलैमानी चिश्ती अल्फ़ारूक़ी रहमतुल्लाह अलयह के सज्जादानशीन व मुतवल्ली हुज़ूर नसीरे मिल्लत के पक्ष में फैसला दिया और वादी इश्तियाक अहमद का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया।
यह मामला वर्ष 2021 में उस समय शुरू हुआ था, जब इश्तियाक अहमद वल्द गुलाम मोइनुद्दीन ने सिविल कोर्ट फतेहपुर में एक वाद दायर कर पूर्व में माननीय सुप्रीम कोर्ट से हुज़ूर नसीरे मिल्लत के हक में आए फैसलों तथा कथित वसीयत को निरस्त करने की मांग की थी। यह वाद इश्तियाक अहमद बनाम पीर गुलाम नसीर आदि शीर्षक से पेश किया गया था।
निचली अदालत से हाईकोर्ट तक का सफर
फतेहपुर की ए.सी.जे.एम. अदालत ने 10 नवंबर 2022 को आदेश 7 नियम 11 सी.पी.सी. के तहत इस दावे को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया था। अदालत का मत था कि वाद विधिक रूप से टिकाऊ नहीं है और प्रथम दृष्टया स्वीकार्य नहीं बनता।
हालांकि, इस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर ए.डी.जे. फतेहपुर ने 29 सितंबर 2025 को ए.सी.जे.एम. के फैसले को पलटते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए निचली अदालत को लौटा दिया था। यह निर्णय दरगाह प्रबंधन के लिए एक अस्थायी झटका माना गया।
इसी आदेश को चुनौती देते हुए हुज़ूर नसीरे मिल्लत की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर में अपील दायर की गई। लंबी कानूनी बहस के बाद आज हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ए.सी.जे.एम. फतेहपुर का मूल आदेश विधिसम्मत था और ए.डी.जे. का निर्णय न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

25 हजार की लागत, अपील निरस्त
हाईकोर्ट ने न केवल ए.डी.जे. का आदेश निरस्त किया, बल्कि वादी इश्तियाक अहमद पर 25,000 रुपये की लागत भी अधिरोपित की। अदालत ने अपने निर्णय में यह संकेत दिया कि न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है और निराधार दावों को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन से जुड़े विवादों में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जाएगा। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि पूर्व में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों को बिना ठोस आधार के चुनौती देना आसान नहीं होगा।
कानूनी पैरवी और सामाजिक प्रतिक्रिया
निचली अदालतों में हुज़ूर नसीरे मिल्लत की ओर से एडवोकेट दिनेश शर्मा ने प्रभावी पैरवी की, जबकि हाईकोर्ट में एडवोकेट अमित सिंह शेखावत ने पक्ष को मजबूती से रखा। दोनों अधिवक्ताओं की रणनीति और कानूनी दलीलों को इस जीत का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।
फैसले के बाद दरगाह शरीफ के मुरीदीन, मुतवस्सिलीन और तमाम मुहिब्बीन के बीच खुशी की लहर दौड़ गई। फतेहपुर कस्बे में इसे दरगाह की परंपरा और आध्यात्मिक उत्तराधिकार की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।
सामाजिक और धार्मिक महत्व
सीकर जिले के फतेहपुर स्थित यह दरगाह लंबे समय से आध्यात्मिक आस्था और सामाजिक समरसता का केंद्र रही है। सज्जादानशीन का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्तराधिकार का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यह फैसला न केवल कानूनी, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अहम है।
वरिष्ठ सामाजिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अदालत का यह निर्णय संस्थागत स्थिरता और विधिक स्पष्टता की दिशा में एक मजबूत कदम है। दरगाह प्रबंधन के समर्थकों ने इसे “हक और इंसाफ की जीत” करार दिया है।

