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वेस्ट बैंक पर इज़रायल के फैसलों की 20 देशों ने की निंदा, सऊदी अरब का कड़ा रुख

सऊदी अरब, कतर, मिस्र, फ्रांस और तुर्किये समेत 20 देशों ने वेस्ट बैंक में इज़रायल के ताज़ा फैसलों को ‘डी-फैक्टो विलय’ की दिशा में खतरनाक कदम बताते हुए तुरंत पलटने की मांग की है।

सऊदी अरब के नेतृत्व में 20 देशों और दो प्रमुख इस्लामी-क्षेत्रीय संगठनों ने वेस्ट बैंक में इज़रायल के हालिया फैसलों की कड़ी निंदा की है। संयुक्त बयान में कहा गया कि फिलिस्तीनी ज़मीन को तथाकथित “इज़रायली स्टेट लैंड” के रूप में पुनर्वर्गीकृत करना, बस्तियों के विस्तार को तेज़ करना और प्रशासनिक नियंत्रण को और मजबूत करना अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन है।

इस बयान पर सऊदी अरब, फिलिस्तीन, कतर, मिस्र, जॉर्डन, तुर्किये, ब्राज़ील, फ्रांस, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, इंडोनेशिया, आयरलैंड, लक्ज़मबर्ग, नॉर्वे, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, स्पेन और स्वीडन के विदेश मंत्रियों के साथ-साथ Arab League और Organization of Islamic Cooperation के महासचिवों ने हस्ताक्षर किए।

‘अंतरराष्ट्रीय कानून और यूएन प्रस्तावों का उल्लंघन’

बयान में स्पष्ट कहा गया कि इज़रायल की अवैध बस्तियां और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए उठाए गए फैसले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और 2024 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की परामर्शात्मक राय के प्रतिकूल हैं। विदेश मंत्रियों ने कहा कि ये कदम “जमीनी हकीकत बदलने और अस्वीकार्य डी-फैक्टो विलय” को आगे बढ़ाने की स्पष्ट दिशा का हिस्सा हैं।

E1 परियोजना और बस्तियों का विस्तार

विदेश मंत्रियों ने विशेष रूप से E1 परियोजना की मंजूरी और उसके टेंडर जारी करने पर चिंता जताई। उनके अनुसार यह कदम फिलिस्तीनी राज्य की व्यवहार्यता पर सीधा हमला है और दो-राष्ट्र समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) की संभावनाओं को कमजोर करता है।

संयुक्त बयान में कहा गया कि 1967 से कब्ज़े वाले क्षेत्रों—जिसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है—की जनसांख्यिकी, चरित्र और कानूनी स्थिति में किसी भी तरह का स्थायी बदलाव स्वीकार्य नहीं है। “हम किसी भी प्रकार के विलय का विरोध करते हैं,” मंत्रियों ने दोहराया।

बसने वालों की हिंसा पर चिंता

वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के खिलाफ बसने वालों की हिंसा को “चिंताजनक” बताते हुए हस्ताक्षरकर्ताओं ने इज़रायल से दोषियों को जवाबदेह ठहराने और हिंसा पर रोक लगाने की मांग की। बयान में कहा गया कि क्षेत्र में बढ़ता तनाव शांति और स्थिरता के प्रयासों को कमजोर कर रहा है।

रमज़ान में यरुशलम के ‘स्टेटस क्वो’ की हिफाज़त

पवित्र रमज़ान के महीने का उल्लेख करते हुए विदेश मंत्रियों ने यरुशलम और उसके पवित्र स्थलों की ऐतिहासिक और कानूनी यथास्थिति (स्टेटस क्वो) बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस संदर्भ में जॉर्डन की ऐतिहासिक हाशमी संरक्षकता की विशेष भूमिका को मान्यता दी गई। बयान में यरुशलम में यथास्थिति के बार-बार उल्लंघन की निंदा करते हुए इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताया गया।

‘न्यूयॉर्क घोषणा’ और दो-राष्ट्र समाधान

विदेश मंत्रियों ने कहा कि अरब शांति पहल और संबंधित संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के अनुरूप 4 जून 1967 की सीमाओं के आधार पर दो-राष्ट्र समाधान ही स्थायी शांति का मार्ग है। उन्होंने “न्यूयॉर्क घोषणा” का हवाला देते हुए कहा कि इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष का अंत क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और एकीकरण के लिए अनिवार्य है। “केवल एक स्वतंत्र, संप्रभु और लोकतांत्रिक फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना से ही सह-अस्तित्व संभव है,” बयान में कहा गया।

फिलिस्तीनी प्राधिकरण के राजस्व की तत्काल रिहाई की मांग

हस्ताक्षरकर्ताओं ने इज़रायल से फिलिस्तीनी प्राधिकरण के रोके गए कर-राजस्व को तुरंत जारी करने की मांग की। उन्होंने कहा कि पेरिस प्रोटोकॉल के तहत ये राजस्व फिलिस्तीनी प्राधिकरण को हस्तांतरित होना चाहिए और गाज़ा व वेस्ट बैंक में बुनियादी सेवाएं चलाने के लिए यह धन अत्यंत आवश्यक है।

क्षेत्रीय शांति पर असर

बयान में चेतावनी दी गई कि ये फैसले गाज़ा के लिए प्रस्तावित 20-सूत्रीय योजना समेत क्षेत्रीय शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचाते हैं और किसी भी सार्थक क्षेत्रीय एकीकरण की संभावनाओं को खतरे में डालते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वेस्ट बैंक में प्रशासनिक और भू-राजनीतिक बदलावों से जमीनी स्तर पर तनाव बढ़ सकता है, जिसका असर व्यापक मध्य पूर्व पर पड़ेगा।

आगे की राह

विदेश मंत्रियों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप “ठोस कदम” उठाने की प्रतिबद्धता जताई, ताकि अवैध बस्तियों के विस्तार, जबरन विस्थापन और विलय की नीतियों का मुकाबला किया जा सके। उन्होंने इज़रायल से अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान करने और कब्ज़े वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों की कानूनी-प्रशासनिक स्थिति में स्थायी बदलाव से परहेज़ करने का आह्वान किया।


निष्कर्ष:
सऊदी अरब और उसके साथ खड़े 19 देशों का यह संयुक्त रुख संकेत देता है कि वेस्ट बैंक और यरुशलम के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता गहराती जा रही है। दो-राष्ट्र समाधान की पुनर्पुष्टि और राजस्व की तत्काल रिहाई की मांग यह दर्शाती है कि क्षेत्रीय शांति की राह अब भी कूटनीतिक दबाव, कानूनी तर्क और बहुपक्षीय सहमति से होकर ही गुजरती है।