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क्या मोदी ने इजरायल जाकर कूटनीतिक जोखिम उठाया? जानिए पूरा मामला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया इजरायल दौरे ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से ज्यादा सोशल मीडिया पर बहस को जन्म दिया है। एक ओर सरकार इसे भारत-इजरायल रणनीतिक साझेदारी की मजबूती बता रही है, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का आरोप है कि यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब गाज़ा युद्ध और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर इजरायल वैश्विक आलोचना के घेरे में है।

प्रधानमंत्री ने इजरायल की संसद में सात अक्टूबर के हमास हमले की निंदा करते हुए कहा कि भारत “पूर्ण विश्वास के साथ इजरायल के साथ खड़ा है।” इसी बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई यूजर्स ने इसे भारत की पारंपरिक संतुलित पश्चिम एशिया नीति से विचलन बताया।


गाज़ा युद्ध और पत्रकारों की मौत का मुद्दा

कतर स्थित मीडिया नेटवर्क Al Jazeera English ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि 2025 में पत्रकारों की मौत के मामलों में इजरायल शीर्ष पर रहा।

पत्रकार सुरक्षा संस्था Committee to Protect Journalists (CPJ) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में विश्वभर में 129 मीडिया कर्मियों की मौत हुई, जिनमें से 84 मामलों की जिम्मेदारी इजरायल पर डाली गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गाज़ा में संघर्ष के दौरान प्रेस पर हमलों को लेकर “दंडमुक्ति की संस्कृति” देखने को मिली।

हालांकि, इजरायल ने कई मामलों में यह तर्क दिया है कि कुछ पत्रकारों के सशस्त्र समूहों से संबंध थे—जिसे मीडिया संगठनों ने “घातक आरोप” करार दिया है।


सोशल मीडिया पर ‘एप्सटीन फाइल’ विवाद

प्रधानमंत्री के दौरे के साथ एक और विवाद जुड़ गया—कथित ‘एप्सटीन फाइल’ का। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने दावा किया कि अमेरिकी कारोबारी जेफ्री एप्सटीन ने 2017 में भारत-इजरायल संबंधों को लेकर डींग मारी थी। हालांकि, इन दावों के समर्थन में कोई आधिकारिक या न्यायिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अन्य राजनीतिक टिप्पणीकारों ने इस मुद्दे पर पारदर्शिता की मांग की है। वहीं सरकार या प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से इन आरोपों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर उठने वाले ऐसे आरोपों और वास्तविक कूटनीतिक प्रक्रियाओं के बीच फर्क करना आवश्यक है। जब तक किसी स्वतंत्र जांच या आधिकारिक दस्तावेज से पुष्टि न हो, ऐसे दावे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भर रहते हैं।


इजरायली संसद में विपक्ष की गैरमौजूदगी

एक और चर्चा इस बात को लेकर हुई कि प्रधानमंत्री के संबोधन के दौरान इजरायल के कुछ विपक्षी सांसद मौजूद नहीं थे। बाद में स्पष्ट हुआ कि विपक्ष का बहिष्कार मुख्यतः घरेलू राजनीतिक कारणों से था, जो प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu और न्यायपालिका से जुड़े विवादों से संबंधित था।

हालांकि, सोशल मीडिया पर इसे भारत के लिए “कूटनीतिक झटका” बताया गया। कुछ यूजर्स ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि से जोड़ा, जबकि अन्य ने इसे इजरायल की आंतरिक राजनीति का हिस्सा बताया।


भारत की पश्चिम एशिया नीति: संतुलन या झुकाव?

भारत ऐतिहासिक रूप से पश्चिम एशिया में संतुलित नीति अपनाता रहा है—एक ओर इजरायल के साथ रक्षा, तकनीक और कृषि सहयोग, तो दूसरी ओर फिलिस्तीन के समर्थन का सार्वजनिक रुख।

विश्लेषकों के अनुसार, मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत-इजरायल संबंधों में अभूतपूर्व निकटता आई है—चाहे वह रक्षा सौदे हों, साइबर सुरक्षा सहयोग या कृषि तकनीक का आदान-प्रदान।

लेकिन आलोचकों का तर्क है कि गाज़ा युद्ध के दौरान इजरायल के समर्थन में दिया गया बयान भारत की पारंपरिक ‘दो-राष्ट्र समाधान’ की नीति को कमजोर करता है। वहीं सरकार समर्थक इसे आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और नैतिक रुख बताते हैं।


कूटनीतिक जोखिम या रणनीतिक मजबूती?

विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को खाड़ी देशों, ईरान और इजरायल—सभी के साथ संबंध संतुलित रखने होते हैं। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और व्यापारिक हित इन संबंधों से जुड़े हैं।

यदि भारत पूरी तरह किसी एक पक्ष की ओर झुका हुआ दिखाई देता है, तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय संतुलन पर पड़ सकता है। हालांकि अब तक सऊदी अरब, यूएई या कतर जैसे देशों की ओर से भारत के खिलाफ कोई आधिकारिक आपत्ति सामने नहीं आई है।


राजनीतिक विमर्श बनाम कूटनीतिक यथार्थ

सोशल मीडिया पर ‘मोदी-इजरायल’ हैशटैग ट्रेंड करता रहा। कुछ पोस्ट में प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए उन्हें “इजरायल का समर्थक” बताया गया, तो कुछ ने इसे भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत करने वाला कदम कहा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए बयान अक्सर घरेलू राजनीति में भी प्रतिध्वनित होते हैं। विपक्ष जहां इसे विदेश नीति की चूक बता रहा है, वहीं सत्तापक्ष इसे आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश के रूप में पेश कर रहा है।

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निष्कर्ष: सवाल जारी, जवाब बाकी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ जुड़े विवादों ने इसे राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है।

गाज़ा युद्ध, पत्रकारों की मौत, ‘एप्सटीन फाइल’ जैसे मुद्दे और संसद में विपक्ष की अनुपस्थिति—इन सबने इस यात्रा को केवल एक राजनयिक कार्यक्रम से अधिक बना दिया है।

अंततः, यह समय बताएगा कि यह कदम भारत की वैश्विक कूटनीति को दीर्घकालिक मजबूती देगा या आलोचकों की आशंकाओं को सही साबित करेगा। फिलहाल इतना तय है कि इजरायल दौरा केवल एक विदेश यात्रा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन चुका है।