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ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामनेई की मौत पर भारत में उबाल: शिया-सुन्नी एकजुट, मोदी सरकार से हस्तक्षेप की मांग तेज

ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामनेई की इजरायल-अमेरिका के संयुक्त हमले में कथित मौत की खबर ने भारत समेत पूरी दुनिया में सियासी और सामाजिक हलचल तेज कर दी है। भारत सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक और स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है, लेकिन देश के मुस्लिम समाज में गहरा आक्रोश और शोक देखा जा रहा है।

दिल्ली, लखनऊ, सहारनपुर, कश्मीर के करगिल-लेह और जम्मू के बठिंडी इलाके तक शिया-सुन्नी समुदाय एक मंच पर आकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। जगह-जगह इजरायल के पुतले फूंके जा रहे हैं, घरों पर काले झंडे लगाए गए हैं और तीन दिन के मातम का ऐलान किया गया है।

शिया-सुन्नी एक मंच पर, ‘उत्पीड़ितों की आवाज’ के रूप में याद

लखनऊ के प्रमुख शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद ने इसे “सदी के सबसे दुखद शब्दों में से एक” बताया। उनका कहना है कि खामनेई ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने “मजलूमों की आवाज बुलंद की और कभी किसी सुपरपावर के आगे सिर नहीं झुकाया।” उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी ताकतें इस आवाज को खामोश करना चाहती थीं ताकि वे खुलकर अत्याचार कर सकें।

वहीं, लखनऊ इस्लामिक सेंटर के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि “ईरान एक संप्रभु राष्ट्र है। उस पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है।” उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से तत्काल हस्तक्षेप कर युद्ध रोकने की मांग की।

ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद राशिदी ने अमेरिका को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि “उन्हें वर्ल्ड कोर्ट में कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।”

झारखंड में ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना सैयद तहजीबुल हसन रिजवी ने इसे “सोची-समझी साजिश” बताया। उनका कहना था कि यह सिर्फ शिया समुदाय का शोक नहीं, बल्कि हर उस इंसान का दुख है जो इंसाफ में यकीन रखता है।

सियासी प्रतिक्रियाएं: कांग्रेस, वाम और कर्नाटक सरकार की चिंता

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “दुनिया ने एक बहादुर नेता खो दिया। इतिहास उन्हें ऐसे नेता के रूप में याद रखेगा जिसने प्रतिबंधों के बावजूद अपने देश को मजबूत बनाने की कोशिश की।”

कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने हमले को “उकसावे के बिना किया गया हमला” बताया और भारत सरकार से तत्काल युद्धविराम की अपील करने को कहा। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि उनके पति इस समय संघर्ष क्षेत्र में फंसे हुए हैं।

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि केरल के लाखों प्रवासी खाड़ी देशों में रहते हैं, ऐसे में स्थिति बेहद चिंताजनक है।

कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी भारतीयों की सुरक्षा को प्राथमिकता बताते हुए कहा कि “दुनिया में इस तरह बच्चों की निर्मम हत्या नहीं होनी चाहिए।”

सड़कों पर उबाल: लखनऊ से करगिल तक प्रदर्शन

लखनऊ के चौक इलाके में शिया समुदाय ने घरों पर काले झंडे लगाए हैं। करगिल और लेह में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। जम्मू-कश्मीर के रामबन में भी विरोध प्रदर्शन हुए। सहारनपुर में लोगों ने इजरायल और अमेरिका के खिलाफ नारेबाजी की।

मौलाना यासूब अब्बास ने तीन दिन के मातम का ऐलान करते हुए कहा कि “दुनिया यह न समझे कि खामनेई के जाने से ईरान खत्म हो जाएगा। जवाब मिलेगा।” वहीं मौलाना सैफ अब्बास ने इसे “आतंकी हमला” करार देते हुए कहा कि “यह पूरी खाड़ी को युद्ध की आग में झोंक चुका है।”

वैश्विक असर की आशंका: तेल, व्यापार और भारतीयों की सुरक्षा

पूर्व भारतीय राजनयिक केपी फेबियन ने चेतावनी दी है कि ईरान यदि घिरा हुआ महसूस करता है तो जवाबी कार्रवाई करेगा। उन्होंने आशंका जताई कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर मार्गों पर नाकेबंदी वैश्विक व्यापार को झटका दे सकती है, जिससे तेल की कीमतें बढ़ेंगी और भारत पर सीधा असर पड़ेगा।

बेंगलुरु में इंडो-ईरान चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सैयद हकीम रज़ा ने इसे “क्षेत्रीय युद्ध” की शुरुआत बताया। उनका दावा है कि तेहरान समेत कई शहरों पर हमले हुए हैं और जवाबी कार्रवाई में खाड़ी के कई देशों को निशाना बनाया गया है।

उत्तराधिकार पर सस्पेंस

इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स के वरिष्ठ फेलो डॉ. फज्जुर रहमान सिद्दीकी का मानना है कि खामनेई के उत्तराधिकार का फैसला जल्दबाजी में नहीं होगा। उन्होंने संकेत दिया कि उनके बेटे संभावित उत्तराधिकारियों में हो सकते हैं, लेकिन औपचारिक घोषणा में समय लग सकता है।

शांति की अपील: ‘भारत बुद्ध की धरती है’

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्कॉलर रैयान अख्तर कासमी ने कहा, “युद्ध कभी समाधान नहीं रहा—चाहे वह यूक्रेन-रूस हो या अफगानिस्तान। भारत खुद को शांति का प्रतीक बताता है, ऐसे में उसे सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।”

उनका कहना है कि भारत के मुसलमान ही नहीं, बल्कि सभी नागरिक युद्ध के खिलाफ हैं और चाहते हैं कि भारत मध्यस्थता कर क्षेत्र में शांति स्थापित करे।

मोदी के इजरायल दौरे के बाद हमले पर सवाल

देश में एक और बहस यह भी छिड़ी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया इजरायल दौरे के 24 घंटे के भीतर यह हमला क्यों हुआ? हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है।

पूर्व राजनयिक फेबियन ने भी इशारा किया कि भारत के “इजरायल के साथ खड़े होने” वाले बयान के बाद ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद प्रभावित हो सकता है।

निष्कर्ष: भारत के लिए कूटनीतिक अग्निपरीक्षा

आयतुल्लाह अली खामनेई की मौत की खबर ने भारत में सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ही नहीं, बल्कि विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा जैसे गंभीर सवालों को भी केंद्र में ला दिया है।

एक ओर देश का मुस्लिम समाज शिया-सुन्नी विभाजन से ऊपर उठकर एकजुटता दिखा रहा है, तो दूसरी ओर सियासी गलियारों में यह बहस तेज है कि भारत को इस संकट में किस भूमिका में सामने आना चाहिए—सिर्फ दर्शक या सक्रिय मध्यस्थ?

खाड़ी में करीब 90 लाख भारतीयों की मौजूदगी, तेल आपूर्ति पर निर्भरता और वैश्विक व्यापार मार्गों की अस्थिरता को देखते हुए यह संकट भारत के लिए केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक चुनौती भी है।

आने वाले दिनों में नई दिल्ली का रुख न सिर्फ घरेलू राजनीति, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की छवि तय करेगा—क्या भारत शांति की अपील से आगे बढ़कर कोई ठोस पहल करेगा, या फिर बदलते पश्चिम एशियाई समीकरणों के बीच संतुलन साधने की कोशिश में चुप्पी साधे रहेगा?