Muslim World

ईरान-इजरायल युद्ध: मुस्लिम देशों की आग में भारत की कूटनीतिक परीक्षा

भारत की राजनीति में इन दिनों एक नया सवाल गूंज रहा है। सवाल यह है कि जब पश्चिम एशिया में आग लगी है तो भारत किसके साथ खड़ा है। एक केंद्रीय मंत्री के एक्स पर लगातार आए बयानों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। उनके शब्दों में यह संकेत था कि भारत आज ईरान के पक्ष में खुलकर इसलिए नहीं बोल रहा क्योंकि अतीत में ईरान ने कुछ मौकों पर भारत का साथ नहीं दिया। उन्होंने यह भी लिखा कि अगर क़ुरान मुस्लिम भाईचारे की बात करता है तो दुबई, ओमान, बहरीन, सऊदी अरब और कतर जैसे इस्लामी देशों पर हमला क्या इस्लाम के खिलाफ नहीं है।

यह बयान आते ही सोशल मीडिया पर मानो बहस का विस्फोट हो गया। कुछ पत्रकारों और विश्लेषकों ने भी इसी तर्क को आगे बढ़ाया। वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार ने लिखा कि भारत में कुछ लोग छाती पीटकर मांग कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत ईरान के साथ खड़े हों, हमले की निंदा करें और आयतुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु पर शोक मनाएं। उन्होंने सवाल उठाया कि ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी के 56 मुस्लिम देशों में से किसने ईरान के पक्ष में ठोस कदम उठाया। ओआईसी ने बैठक तक नहीं बुलाई। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान अपने पड़ोसी मुस्लिम देशों पर हमला कर रहा है और इन देशों में 90 लाख भारतीय रहते हैं, इसलिए भारत को अपनी प्राथमिकता तय करनी चाहिए।

यह तर्क सुनने में व्यावहारिक लगता है। लेकिन क्या पूरा सच यही है। बहस शुरू करने से पहले अजमेर शरीफ की दरगाह के सज्जादानशीन सैयद ज़ैनुल आबेदीन का बयान पढ़ना जरूरी है। उन्होंने कहा कि ईरान और इज़राइल के बीच जो हो रहा है उसे सीधी जंग नहीं कहा जा सकता। यह ताकत का असंतुलन है। यह दबाव की राजनीति है। उनका कहना था कि आयतुल्लाह अली खामेनेई केवल ईरान के सर्वोच्च नेता नहीं थे बल्कि दुनिया भर के शिया मुसलमानों के लिए एक प्रतीक थे।

अब मंत्री के उस दावे पर आते हैं जिसमें उन्होंने लिखा कि 1965 और 1971 की जंग में ईरान ने पाकिस्तान को भारत के खिलाफ धन और हथियार दिए थे। इस दावे का जवाब पत्रकार मधुरेंद्र कुमार ने बिंदुवार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि आयतुल्लाह खामेनेई 1981 से 1989 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे और 1989 में सर्वोच्च नेता बने। 1965 और 1971 की घटनाओं से उनका सीधा संबंध नहीं था। उन्होंने यह भी लिखा कि कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने कई बार भारत के रुख को समझा। चाबहार पोर्ट जैसे सामरिक प्रोजेक्ट पर ईरान ने प्रतिबंधों के बावजूद भारत के लिए दरवाजे खुले रखे। वर्षों तक वह भारत का प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता रहा। यह सब भूल जाना क्या उचित है।

सवाल यहीं खत्म नहीं होते। जब इज़राइल और अमेरिका ने अचानक ईरान पर हमला किया तो क्या खाड़ी के देशों ने खुलकर विरोध किया। क्या सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, ओमान, कुवैत, जॉर्डन या कतर ने स्पष्ट शब्दों में इसकी निंदा की। क्या मुस्लिम वर्ल्ड लीग या ओआईसी ने तुरंत कोई सख्त बयान जारी किया। मुस्लिम वर्ल्ड लीग का एक बयान आया जरूर। उसमें ईरान के खुले हमले की निंदा की गई और उसे धरती पर आतंक और भ्रष्टाचार बताया गया। लेकिन क्या उसी बयान में इज़राइल की ओर से ईरान में एक स्कूल पर बमबारी और बच्चों की मौत का जिक्र था। क्या किसी ने यह पूछा कि निर्दोष नागरिकों का खून किसके हाथों लगा है।

यहां दोहरी चुप्पी दिखती है। एक चुप्पी खाड़ी के देशों की। दूसरी चुप्पी हमारे यहां के उन लोगों की जो हर मुद्दे को केवल धार्मिक चश्मे से देखते हैं। वे शिया और सुन्नी का सवाल उठाकर पूरी बहस को दूसरी दिशा में मोड़ देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इस्लाम के भीतर मतभेद हो सकते हैं, पर बुनियादी आस्था एक ही है। अल्लाह एक है। पैगंबर एक हैं। किताब एक है। मतभेद व्याख्या के हैं, अस्तित्व के नहीं।

खाड़ी के देशों की स्थिति भी समझनी होगी। वे दशकों से अमेरिका और पश्चिमी ताकतों के साथ रणनीतिक साझेदारी में रहे हैं। उनकी अर्थव्यवस्था तेल, पर्यटन और विदेशी निवेश पर टिकी है। वे खुली टकराव की राजनीति से बचना चाहते हैं। लेकिन यह भी सच है कि जब कोई बड़ा हमला होता है तो उनकी चुप्पी सवालों को जन्म देती है। लोग पूछते हैं कि क्या आर्थिक हित नैतिकता से बड़े हैं।

भारत की स्थिति अलग है। भारत का पश्चिम एशिया से संबंध बहुआयामी है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। उनकी सुरक्षा भारत की प्राथमिक जिम्मेदारी है। दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते हैं। चाबहार पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का द्वार है। ऊर्जा सुरक्षा में ईरान की भूमिका रही है। ऐसे में भारत के लिए संतुलन बनाना आसान नहीं।

लेकिन संतुलन का अर्थ चुप्पी नहीं होना चाहिए। जब कहीं निर्दोषों का खून बहता है तो कम से कम मानवीय संवेदना की आवाज उठनी चाहिए। यही अपेक्षा लोग अपने नेताओं से करते हैं। बहस का असली केंद्र यही है। क्या विदेश नीति केवल हितों की गणना है या उसमें नैतिक स्वर भी होना चाहिए।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि ईरान ने खाड़ी के देशों को अस्थिर कर दिया है। इससे पर्यटन और निवेश प्रभावित होंगे। संभव है। क्षेत्र में अस्थिरता का असर सब पर पड़ता है। लेकिन यह भी देखना होगा कि तनाव की जड़ें कहां हैं। क्या केवल ईरान जिम्मेदार है। या दशकों की भू-राजनीतिक खींचतान, प्रतिबंध और गुप्त अभियानों ने यह आग भड़काई है।

भारत में जो लोग खुलकर इज़राइल और अमेरिका के पक्ष में खड़े हैं, वे यह तर्क देते हैं कि वे आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं। लेकिन क्या हर सैन्य कार्रवाई आतंकवाद विरोधी होती है। क्या हर विरोध करने वाला आतंकवादी है। यह सवाल भी उतना ही जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते। स्थायी हित होते हैं। यह बात हर देश जानता है। इसलिए यह मान लेना कि कोई महाशक्ति किसी को गले लगाकर सदा के लिए साथ खड़ी रहेगी, भोला विश्वास है।

इतिहास गवाह है कि जब हित बदलते हैं तो समीकरण भी बदलते हैं। पश्चिम एशिया में यह कई बार हुआ है। कभी अमेरिका ने इराक का साथ दिया, फिर वही अमेरिका उसके खिलाफ खड़ा हो गया। कभी किसी समूह को समर्थन मिला, फिर वही समूह दुश्मन घोषित हो गया। ऐसे में भावनाओं के बजाय विवेक से सोचना होगा।

आज जरूरत है शांत दिमाग से तथ्यों को देखने की। भारत को अपनी जनता की सुरक्षा, अपनी ऊर्जा जरूरतों और अपनी रणनीतिक परियोजनाओं को ध्यान में रखना होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्षेत्र में स्थिरता कैसे लौटे। युद्ध किसी का भला नहीं करता। हर बम के साथ केवल इमारतें नहीं गिरतीं, भरोसा भी टूटता है।

बहस जरूरी है। सवाल पूछना भी जरूरी है। लेकिन सवाल आधे सच पर नहीं होने चाहिए। यदि हम 1965 और 1971 को याद करते हैं तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उसके बाद दुनिया बदल चुकी है। नेतृत्व बदल चुका है। समीकरण बदल चुके हैं। अगर हम मुस्लिम भाईचारे की बात करते हैं तो हमें यह भी देखना होगा कि क्या हम खुद उस भाईचारे को निभा पा रहे हैं। और अगर हम राष्ट्रीय हित की बात करते हैं तो हमें यह भी तय करना होगा कि वह हित केवल आर्थिक है या नैतिक भी।

अंत में यही कहा जा सकता है कि पश्चिम एशिया की आग दूर से देखने पर छोटी लग सकती है, पर उसकी लपटें बहुत दूर तक जाती हैं। भारत जैसे देश को हर कदम सोच समझकर रखना होगा। न भावनाओं में बहना है, न अंध समर्थन करना है। सच का सामना करना है। और जहां निर्दोषों का खून बहे, वहां कम से कम इंसानियत की आवाज जरूर उठनी चाहिए। यही एक जिम्मेदार राष्ट्र की पहचान है।