इज़राइल हमला करने वाला था, इसलिए हमने पहले वार किया -मार्को रुबियो का बड़ा खुलासा, ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ पर नए सवाल
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मुस्लिम नाउ विशेष, वॉशिंगटन
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अमेरिका के विदेश मंत्री Marco Rubio ने सोमवार को एक ऐसा खुलासा किया जिसने वॉशिंगटन की आधिकारिक कहानी को नया मोड़ दे दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि अमेरिका ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले इसलिए किए क्योंकि उसे अंदेशा था कि इज़राइल की कार्रवाई के बाद ईरान सीधे अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा।
कैपिटल हिल में कांग्रेस नेताओं को गोपनीय ब्रीफिंग से पहले पत्रकारों से बात करते हुए रुबियो ने कहा, “हमें पता था कि अगर ईरान पर हमला हुआ, और हमें विश्वास था कि हमला होगा, तो वे तुरंत हमारे पीछे आएंगे।”
यह बयान इसलिए असाधारण है क्योंकि अब तक अमेरिकी प्रशासन यह कहता रहा था कि ईरान से “तत्काल खतरा” था, इसलिए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू किया गया।
“तत्काल खतरा” या “पूर्व तैयारी”?
शनिवार को जब अमेरिका ने ‘Operation Epic Fury’ शुरू किया, तब अधिकारियों ने कहा था कि ईरान अमेरिकी ठिकानों पर पूर्व-नियोजित मिसाइल हमला करने जा रहा था।
लेकिन रविवार को पेंटागन की ओर से कांग्रेस को दी गई ब्रीफिंग में यह स्पष्ट किया गया कि ईरान अमेरिका पर तत्काल हमला करने की तैयारी में नहीं था।
यही विरोधाभास अब बहस का केंद्र बन गया है।
रुबियो के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिका ने हमला इसलिए किया क्योंकि उसे पता था कि इज़राइल ईरान पर वार करेगा, और उसके बाद ईरान की प्रतिक्रिया में अमेरिकी संपत्तियां निशाने पर आ सकती हैं।
Rubio: There was absolutely an imminent threat and it was that we knew that if Iran was attacked and we believe that they would be attacked, that they would immediately come after us and we were not going to sit there and absorb a blow pic.twitter.com/jFDc38ttKR
— Acyn (@Acyn) March 2, 2026
इज़राइल की भूमिका पर सवाल
रुबियो ने कहा कि अमेरिका “इज़राइली इरादों से अवगत” था।
यह बयान उस धारणा को मजबूत करता है कि इज़राइल की कार्रवाई वॉशिंगटन की जानकारी और समर्थन के बिना संभव नहीं थी। इससे पहले रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी स्वीकार किया था कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को निशाना बनाने वाले शुरुआती हमले में अमेरिकी खुफिया जानकारी का उपयोग हुआ।
राष्ट्रपति Donald Trump ने भी कई बार उस हमले का श्रेय लिया है।
इससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका ने इज़राइल की पहल के कारण खुद को युद्ध में झोंक दिया।
रुबियो का तर्क
रुबियो का कहना है कि अगर अमेरिका इंतजार करता और ईरान पहले हमला करता, तो अमेरिकी जानें जातीं।
उन्होंने कहा, “अगर हम इंतजार करते कि वे किसी और के हमले के बाद हम पर वार करें, तो ज्यादा हताहत होते।”
उनका दावा है कि ऑपरेशन “जरूरी” था और समय पर किया गया।
उन्होंने एक और दलील दी। उनके अनुसार, अगर अमेरिका अभी कार्रवाई नहीं करता तो एक साल या डेढ़ साल में ईरान इतनी बड़ी संख्या में शॉर्ट रेंज मिसाइलें और ड्रोन बना लेता कि उसे रोकना मुश्किल हो जाता।
ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका ने स्वीकार कर लिया है कि वह इज़राइल की ओर से “चुना हुआ युद्ध” लड़ रहा है।
उनका कहना है कि कोई तत्काल ईरानी खतरा नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों देशों का खून “इज़राइल फर्स्ट” सोच की वजह से बह रहा है।
क्या शासन परिवर्तन लक्ष्य है?
जब रुबियो से पूछा गया कि क्या ईरान में शासन परिवर्तन अमेरिकी लक्ष्य है, तो उन्होंने कहा कि अमेरिका ऐसा होते देखना चाहेगा, लेकिन यह मौजूदा अभियान का घोषित उद्देश्य नहीं है।
उन्होंने कहा, “हमारा मिशन मिसाइल क्षमता और उत्पादन को नष्ट करना है। साथ ही उनकी नौसैनिक क्षमता को खत्म करना।”
हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप पहले सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि ईरानी जनता को मौजूदा शासन को उखाड़ फेंकना चाहिए।
यहां भी नीति में अस्पष्टता दिखती है।
लक्ष्यों में बदलाव?
रुबियो के बयान से पहले ट्रंप ने चार लक्ष्य गिनाए थे।
मिसाइल क्षमता नष्ट करना।
नौसेना खत्म करना।
ईरान को परमाणु हथियार से रोकना।
और प्रॉक्सी मिलिशिया को समर्थन से वंचित करना।
रुबियो ने एक और लक्ष्य जोड़ा। ड्रोन खतरे को निष्क्रिय करना।
इससे आलोचकों का कहना है कि युद्ध के उद्देश्य लगातार बदल रहे हैं।
स्कूल पर हमले का सवाल
रुबियो से दक्षिणी ईरान के एक बालिका प्राथमिक विद्यालय पर हमले के बारे में भी पूछा गया, जिसमें कथित तौर पर 160 से अधिक लोगों की मौत हुई।
उन्होंने कहा कि रक्षा विभाग जांच कर रहा है और अमेरिका “जानबूझकर स्कूल को निशाना नहीं बनाएगा।”
यह बयान विवाद को शांत नहीं कर सका। नागरिक हताहतों की संख्या बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ रहा है।
डेमोक्रेट्स संतुष्ट नहीं
कांग्रेस में डेमोक्रेट नेताओं ने सरकार की दलीलों पर सवाल उठाए।
इंटेलिजेंस कमेटी के शीर्ष डेमोक्रेट सीनेटर मार्क वार्नर ने कहा कि अमेरिका पर कोई तत्काल खतरा नहीं था। खतरा इज़राइल पर था।
सीनेट डेमोक्रेटिक लीडर चक शूमर ने ब्रीफिंग को “पूरी तरह अपर्याप्त” बताया।
दूसरी ओर, रिपब्लिकन स्पीकर माइक जॉनसन ने हमले को “रक्षात्मक कार्रवाई” कहा और कहा कि इज़राइल अमेरिका के समर्थन के साथ या बिना कार्रवाई करने को तैयार था।
असली सवाल
अब असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका ने अपने हित में कदम उठाया या इज़राइल के निर्णय के कारण खुद को युद्ध में झोंक दिया।
अगर तत्काल खतरा नहीं था, तो “पूर्व-आक्रमण” की वैधता पर सवाल उठेंगे।
अगर खतरा केवल संभावित था, तो क्या यह पर्याप्त आधार था।
आगे क्या
अमेरिका का कहना है कि यह अभियान सीमित है। लेकिन जमीनी हालात अलग कहानी कह रहे हैं।
ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता अभी भी सक्रिय है। क्षेत्र में अमेरिकी ठिकाने अलर्ट पर हैं। तेल बाजार अस्थिर है।
कांग्रेस में बहस तेज हो रही है कि क्या राष्ट्रपति ने बिना स्पष्ट खतरे के युद्ध का विस्तार किया।
निष्कर्ष
मार्को रुबियो का बयान केवल एक स्पष्टीकरण नहीं है। यह पूरी रणनीति पर नए सवाल खड़े करता है।
क्या यह हमला “आसन्न खतरे” के जवाब में था।
या यह एक ऐसी स्थिति थी जहां अमेरिका ने अनुमान के आधार पर कदम उठाया।
कूटनीति पीछे छूटती दिख रही है। बयानबाजी आगे है।
और इस सबके बीच, युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है।
अब दुनिया की नजर वॉशिंगटन और तेहरान दोनों पर है।
क्या यह संघर्ष सीमित रहेगा।
या यह एक लंबे और व्यापक युद्ध का शुरुआती अध्याय है।

