Muslim World

ईरान युद्ध पर ट्रंप की उलझी रणनीति: खुफिया नाकामी, सत्ता परिवर्तन की अनिश्चितता और खाड़ी सहयोगियों की अनदेखी

Image
Image
Image
Image

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, वॉशिंगटन।
ईरान पर अमेरिका और इज़रायल की ताज़ा सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के बयानों ने जितने जवाब दिए, उससे कहीं अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सीधे अमेरिकी खुफिया तंत्र, व्हाइट हाउस की रणनीति और उस “अगले दिन” की योजना पर हैं, जिसकी स्पष्टता अब तक सामने नहीं आई है। सबसे अहम प्रश्न यही है कि क्या वाकई अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास ऐसी ठोस और भरोसेमंद जानकारी थी कि ईरान किसी भी क्षण इज़रायल या अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने वाला था। अगर थी, तो उसे सार्वजनिक या संस्थागत रूप से क्यों स्पष्ट नहीं किया गया। और अगर नहीं थी, तो फिर युद्ध जैसा बड़ा फैसला किस आधार पर लिया गया।

खुफिया जानकारी थी या अनुमान

राष्ट्रपति ट्रंप ने ओवल ऑफिस में कहा कि उन्हें यकीन था कि ईरान पहले हमला करने वाला था। यह बयान गंभीर है। युद्ध की वैधता अक्सर खुफिया सूचनाओं पर टिकी होती है। लेकिन पेंटागन के अधिकारियों ने कथित तौर पर कांग्रेस को बताया कि ऐसी कोई पुख्ता इंटेलिजेंस मौजूद नहीं थी जिससे यह साबित हो सके कि ईरान अमेरिका पर तत्काल हमला करने की तैयारी में था। यही विरोधाभास पूरे मामले को संदिग्ध बनाता है।

अगर खुफिया एजेंसियों को ईरान की तैयारी का अंदेशा था, तो क्या यह ठोस सूचना थी या सिर्फ आकलन। और अगर सिर्फ आकलन था, तो क्या उसके आधार पर पहले हमला करना सही ठहराया जा सकता है। अमेरिका पहले भी इराक के मामले में “खुफिया चूक” की कीमत चुका चुका है। ऐसे में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है।

ALSO READ इज़राइल हमला करने वाला था, इसलिए हमने पहले वार किया -मार्को रुबियो का बड़ा खुलासा, ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ पर नए सवाल

ईरान की सैन्य ताकत को कम आंकना

ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की नेवी, एयर फोर्स और एयर डिफेंस लगभग खत्म कर दी गई है। यह दावा आकर्षक जरूर लगता है, लेकिन वास्तविकता इतनी सरल नहीं है। ईरान कोई छोटा या तकनीकी रूप से कमजोर देश नहीं है। उसके पास लंबी दूरी की मिसाइलें हैं। उसके पास ड्रोन नेटवर्क है। उसके पास क्षेत्र में सक्रिय सहयोगी और प्रॉक्सी समूह हैं।

खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकाने ईरानी मिसाइलों की सीधी रेंज में आते हैं। इज़रायल का हर कोना भी सुरक्षित नहीं है। ऐसे में यह कहना कि ईरान की पूरी सैन्य क्षमता खत्म हो गई है, न तो सैन्य विशेषज्ञों को संतुष्ट करता है और न ही क्षेत्रीय वास्तविकताओं से मेल खाता है।

यह भी सवाल उठता है कि अगर ईरान की ताकत सचमुच खत्म हो चुकी है, तो फिर खाड़ी देशों में इतनी चिंता क्यों है। क्यों वहां एयर डिफेंस सिस्टम हाई अलर्ट पर हैं।

इज़रायल ने घसीटा या अमेरिका ने धकेला

प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब पूछा गया कि क्या इज़रायल और प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने अमेरिका को युद्ध में घसीटा, तो ट्रंप ने इससे इनकार किया। उन्होंने उलटे कहा कि संभव है उन्होंने इज़रायल पर दबाव डाला हो।

यह बयान अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio के उस कथन से टकराता है जिसमें उन्होंने कहा था कि वॉशिंगटन ने तभी कार्रवाई की जब उसे पता चला कि इज़रायल हमला करने वाला है।

दोनों बयानों में तालमेल नहीं दिखता। इससे यह आशंका गहराती है कि व्हाइट हाउस के भीतर ही रणनीति को लेकर स्पष्टता का अभाव है। युद्ध जैसे फैसले में यह स्थिति खतरनाक मानी जाती है।

‘द टाइम्स ऑफ इज़रायल’ की भूमिका

इज़रायल समर्थक मीडिया हाउस The Times of Israel ने ट्रंप की प्रेस वार्ता को जिस एंगल से पेश किया, वह भी ध्यान देने योग्य है। रिपोर्ट में यह दिखाने की कोशिश की गई कि इज़रायल ने अमेरिका को मजबूर नहीं किया। बल्कि ट्रंप खुद मानते हैं कि उन्होंने हालात भांप कर कदम उठाया।

इस प्रस्तुति से साफ झलकता है कि नेतन्याहू और इज़रायली नेतृत्व को सीधे दोष से बचाने की कोशिश की जा रही है। साथ ही यह संदेश भी दिया जा रहा है कि ईरान पर ताज़ा हमले के लिए इज़रायल अकेला जिम्मेदार नहीं है और न ही फिलहाल ईरानी सुप्रीम लीडर की हत्या की कोई ठोस योजना थी।

खामेनेई के बाद क्या

ट्रंप के बयान का सबसे चिंताजनक हिस्सा ईरान में सत्ता परिवर्तन को लेकर है। उन्होंने कहा कि सबसे बुरी स्थिति यह होगी कि मौजूदा सरकार जितना ही बुरा कोई और व्यक्ति सत्ता में आ जाए। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में बहुत कुछ कहती है।

इसका सीधा अर्थ यह है कि अमेरिका के पास सत्ता परिवर्तन के बाद का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है। न कोई तय चेहरा। न कोई संस्थागत योजना। न कोई संक्रमण मॉडल।

ईरान के निर्वासित शाह के बेटे Reza Pahlavi के बारे में ट्रंप ने कहा कि वह अच्छे आदमी लगते हैं, लेकिन ईरान के भीतर रहने वाला कोई व्यक्ति शायद ज्यादा उपयुक्त होगा। इसका मतलब यह हुआ कि अमेरिका खुद तय नहीं कर पाया है कि वह किसे विकल्प के रूप में देखता है।

बिना योजना के सत्ता परिवर्तन का जोखिम

मध्य पूर्व का इतिहास गवाह है कि बिना स्पष्ट योजना के किया गया सत्ता परिवर्तन अराजकता को जन्म देता है। इराक और लीबिया इसके उदाहरण हैं। ट्रंप के बयानों से यह डर गहराता है कि कहीं ईरान भी उसी रास्ते पर न धकेल दिया जाए।

जब राष्ट्रपति खुद कहते हैं कि डर है कहीं सत्ता किसी बहुत बड़े पागल के हाथ में न चली जाए, तो यह सवाल और तेज हो जाता है कि फिर इस टकराव को शुरू ही क्यों किया गया। अगर अंजाम का अंदेशा इतना खतरनाक है, तो रणनीति इतनी अधूरी क्यों है।

खाड़ी सहयोगियों की चुप्पी में अनदेखी

एक और अहम सवाल खाड़ी देशों से जुड़ा है। यूएई, सऊदी अरब और कतर अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं। ईरानी मिसाइलों का पहला निशाना वही बन सकते हैं। इसके बावजूद ट्रंप की प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन देशों के लिए सहानुभूति का एक शब्द तक नहीं बोला गया।

न यह बताया गया कि उनकी सुरक्षा के लिए क्या अतिरिक्त कदम उठाए जा रहे हैं। न यह कि किसी जवाबी हमले की स्थिति में अमेरिका कैसे खड़ा रहेगा। यह चुप्पी खाड़ी राजधानियों में बेचैनी बढ़ा सकती है।

बातचीत का दरवाज़ा बंद

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में साफ कहा कि ईरान से बातचीत के लिए बहुत देर हो चुकी है। यह बयान कूटनीति के हर विकल्प को लगभग खारिज करता है।

जब संवाद का रास्ता बंद कर दिया जाता है, तो टकराव के रास्ते ही बचते हैं। ऐसे में युद्ध का दायरा बढ़ने का खतरा भी बढ़ता है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका इस लंबे संघर्ष के लिए तैयार है।

निष्कर्ष

ईरान पर हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं है। यह एक बड़ा राजनीतिक और रणनीतिक जुआ है। ट्रंप प्रशासन के बयानों से यह साफ नहीं हो पाया कि यह फैसला ठोस खुफिया जानकारी पर आधारित था या अनुमान पर। ईरान की सैन्य ताकत को लेकर दावे वास्तविकता से मेल खाते नहीं दिखते। सत्ता परिवर्तन के बाद की तस्वीर धुंधली है। और खाड़ी सहयोगियों की चिंताओं को नजरअंदाज किया गया है।

इन तमाम सवालों के बीच यह कहना मुश्किल है कि यह नीति क्षेत्र में स्थिरता लाएगी या एक और लंबे और खतरनाक संघर्ष की नींव रखेगी। दुनिया अब सिर्फ हमलों पर नहीं, बल्कि उस जवाब पर नजर रखे हुए है जो वॉशिंगटन इन सवालों पर देगा।