चटगांव की 90 साल पुरानी ‘चक सेमाई’: जिसके बिना बांग्लादेश में ईद का जायका अधूरा है; जानिए इस बेजोड़ परंपरा की पूरी कहानी
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, ढाका (बांग्लादेश)
बांग्लादेश के चटगांव शहर की अपनी एक अलग ही रूह है। यहाँ की गलियों में इतिहास और परंपरा आज भी सांस लेती है। जब रमजान का पवित्र महीना आता है और ईद की आहट सुनाई देती है, तो यहाँ के लोगों की जुबान पर एक नाम ज़रूर आता है। वह नाम है ‘चक सेमाई’। यह कोई आम मिठाई या पकवान नहीं है। यह चटगांव की साख और पहचान है। यहाँ के लोगों का मानना है कि अगर ईद के दस्तरखान पर चक सेमाई न हो, तो त्योहार की खुशियाँ अधूरी रह जाती हैं। आइए आपको ले चलते हैं चटगांव की उस पुरानी गली में, जहाँ पिछले 90 सालों से एक बेकरी इस परंपरा को जिंदा रखे हुए है।
वक्त की धूल से परे: मेसर्स फकीर कबीर बेकरी
चटगांव शहर के चौकबाजार में एक सड़क है कपासगोला रोड। इसी रोड पर तेलिपट्टी नाम की जगह है। यहाँ के प्रवेश द्वार पर एक छोटा और पुराना सा साइनबोर्ड लगा हुआ है। इस पर लिखा है ‘मेसर्स फकीर कबीर बेकरी’। पहली नज़र में देखने पर यह दुकान आपको बहुत साधारण लग सकती है। लेकिन जैसे ही आप इसके अंदर कदम रखते हैं, आपको महसूस होगा कि आप इतिहास के किसी पुराने पन्ने में आ गए हैं। यहाँ आज भी समय ठहरा हुआ सा लगता है।
इस बेकरी की शुरुआत ब्रिटिश काल के दौरान हुई थी। साल 1936 में फकीर कबीर ने एक छोटे से किराए के मकान से अपनी यात्रा शुरू की थी। आज लगभग 90 साल बीत चुके हैं। दुनिया बदल गई, तकनीक बदल गई, लेकिन इस बेकरी में चक सेमाई बनाने का तरीका आज भी वही पुराना और शुद्ध है।
सिर्फ दो चीजें और कारीगरों का जादू
आजकल के दौर में खाने-पीने की चीजों में ढेरों केमिकल्स और बनावटी रंग डाले जाते हैं। लेकिन फकीर कबीर की चक सेमाई की खासियत इसकी सादगी है। इसे बनाने में केवल दो सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। पहली चीज है बेहतरीन क्वालिटी का आटा और दूसरी चीज है खौलता हुआ गरम पानी।
हैरानी की बात यह है कि इसमें न तो नमक डाला जाता है, न चीनी और न ही कोई बाहरी रंग। कारीगर एक साफ-सुथरे और टाइल्स वाले कमरे में काम करते हैं। वे एक बड़ी छड़ी की मदद से आटे और गरम पानी को मिलाकर खमीर तैयार करते हैं। यह काम मेहनत भरा होता है। इसके बाद इस खमीर को एक गोल सांचे में डाला जाता है। कारीगर जब सांचे के लंबे हैंडल को बड़ी फुर्ती से घुमाता है, तो नीचे से सेमाई पतले रेशमी धागों की तरह बाहर निकलने लगती है।
कारीगरों के हाथ इतनी सफाई से चलते हैं कि देखते ही बनता है। वे इन कच्चे धागों को बांस की सींकों पर लपेटकर एक गोल चक्र का आकार देते हैं। इसी चक्र के आकार की वजह से इसे ‘चक सेमाई’ कहा जाता है।
धूप और आग का अनोखा संगम
चक सेमाई बनाने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है इसे सुखाना। कारीगर इसे सांचे से निकालने के बाद खुले मैदान में धूप में सुखाते हैं। बेकरी के लोग बताते हैं कि धूप की गर्मी ही इसकी असली पहचान है। अगर धूप सही न हो, तो सेमाई का वो असली स्वाद और कड़ापन नहीं आ पाता।
जब ये चक पूरी तरह सूख जाते हैं, तो इन्हें एक बड़ी पारंपरिक भट्टी (भट्ठे) में डाला जाता है। भट्टी की आग में पकते ही सेमाई का रंग सुनहरा लाल होने लगता है। कारीगर बड़ी सावधानी से इसे उलटते-पलटते हैं। जैसे ही इसका रंग चटख लाल होता है, समझ लीजिए कि चक सेमाई अब बाजार में जाने के लिए तैयार है। यह पूरी प्रक्रिया किसी तपस्या से कम नहीं है।

बाजार की चुनौती और अटूट भरोसा
आजकल बाजार में सेमाई के सैकड़ों ब्रांड मौजूद हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी रंग-बिरंगी पैकिंग और विज्ञापनों से लोगों को लुभाती हैं। इससे फकीर कबीर बेकरी की बिक्री पर थोड़ा असर तो पड़ा है, लेकिन उनकी क्वालिटी का आज भी कोई मुकाबला नहीं है।
बेकरी के मैनेजर दिलीप कुमार सिंह पिछले कई सालों से यहाँ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उन्होंने बताया कि रमजान से पहले ही थोक व्यापारी अपनी बुकिंग करा लेते हैं। लेकिन रमजान के आखिरी दिनों में खुदरा खरीदारों की इतनी भीड़ होती है कि संभालना मुश्किल हो जाता है। लोग घंटों लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं।
दिलीप कुमार बताते हैं कि वे आज भी उसी सांचे का इस्तेमाल कर रहे हैं जो 1936 में इस्तेमाल होता था। वे कहते हैं, “बाजार में बहुत से लोग मिलावटी और घटिया सेमाई बेच रहे हैं। लेकिन हमारे पुराने ग्राहक जानते हैं कि शुद्धता क्या होती है। वे सीधे कारखाने चले आते हैं।” रमजान और ईद के दौरान यहाँ रोजाना लगभग 200 किलो सेमाई बिक जाती है। इसकी कीमत 250 टका प्रति किलो के आसपास रहती है।
यादों का जायका: ग्राहकों की कहानी
चक सेमाई चटगांव के लोगों के लिए केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि उनके बचपन की यादें हैं। बेकरी में सेमाई खरीदने आए बकलिया निवासी नूरुल इस्लाम भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं, “जब मैं छोटा बच्चा था और पाकिस्तान का दौर था, तब मेरे पिता ईद पर फकीर कबीर की यही चक सेमाई घर लाते थे। आज मैं बूढ़ा हो गया हूँ, लेकिन स्वाद वही है।”
नूरुल इस्लाम ने इस बार 10 किलो सेमाई खरीदी है। वे इसमें से कुछ हिस्सा अपनी शादीशुदा बेटी के लिए भी भेजेंगे। वे कहते हैं कि आज के दौर में जहाँ हर चीज में मिलावट है, वहाँ ऐसी शुद्ध चीज मिलना किसी सपने जैसा है। यही वजह है कि नई पीढ़ी के लोग भी यहाँ खींचे चले आते हैं।
देश की सरहदों के पार पहुँच रही है पहचान
चटगांव की यह चक सेमाई अब केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। यहाँ से लोग इसे विदेशों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के लिए भी भेजते हैं। मिडिल ईस्ट, यूरोप और अमेरिका में रहने वाले बांग्लादेशी प्रवासी ईद के मौके पर इस सेमाई का इंतज़ार करते हैं। यह उनके लिए अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़ने का एक जरिया बन गई है।
मेसर्स फकीर कबीर बेकरी ने वक्त के साथ खुद को बदला नहीं है। उन्होंने अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए क्वालिटी से समझौता नहीं किया। जहाँ दूसरी बेकरियां मुनाफे के पीछे भाग रही हैं, वहीं यह संस्था अपनी परंपरा और ग्राहकों के भरोसे को बचाने में लगी है।
निष्कर्ष: परंपरा की जीत
चटगांव की चक सेमाई हमें सिखाती है कि सादगी में ही असली स्वाद होता है। आटा, पानी, धूप और आग—इन चार चीजों ने मिलकर एक ऐसी परंपरा को जन्म दिया है जो सदियों से कायम है। अगर आप कभी चटगांव जाएं, तो इस पुरानी बेकरी के दर्शन ज़रूर करें। यहाँ आपको न केवल बेहतरीन सेमाई मिलेगी, बल्कि उस मेहनत और ईमानदारी की खुशबू भी मिलेगी जो आजकल के मिलावटी दौर में कहीं खो गई है।
ईद की सुबह जब दूध और चीनी के साथ यह चक सेमाई दस्तरखान पर सजती है, तो चटगांव का हर घर एक अलग ही मिठास से भर जाता है। यह मिठास है भाईचारे की, परंपरा की और अटूट विश्वास की।

