Education

मदरसे से यूपीएससी तक: मौलाना शाहिद रजा खान की सफलता ने तोड़ी रूढ़ धारणाएं

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

देश में अक्सर मदरसों को लेकर कई तरह की धारणाएं बनाई जाती हैं। कई बार यह आरोप भी लगाया जाता है कि मदरसों की शिक्षा आधुनिक प्रतिस्पर्धी दुनिया में युवाओं को आगे नहीं बढ़ा पाती। लेकिन बिहार के एक युवा मौलाना ने इन धारणाओं को चुनौती देते हुए अपनी मेहनत और लगन से एक नई मिसाल पेश की है।

बिहार के गया जिले के अमीनाबाद गांव के रहने वाले Shahid Raza Khan ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की है। उन्होंने यूपीएससी परीक्षा में 751वीं रैंक प्राप्त की। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि शाहिद रजा खान की शुरुआती शिक्षा एक मदरसे से हुई और वे पारंपरिक इस्लामी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र रहे हैं।

लंबी दाढ़ी, सिर पर टोपी और साधारण कुर्ता पहनने वाले शाहिद रजा खान आज कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं। वे उन 53 मुस्लिम युवाओं में शामिल रहे जिन्होंने यूपीएससी की कठिन परीक्षा में सफलता प्राप्त की। उनकी यह उपलब्धि उन रूढ़ धारणाओं को चुनौती देती है जिनमें अक्सर मदरसों को संकीर्ण नजरिए से देखा जाता है।

शाहिद रजा खान ने अपनी शुरुआती शिक्षा अपने गांव के मदरसे से प्राप्त की। दसवीं की परीक्षा उन्होंने बिहार बोर्ड से पास की। इसके बाद उन्होंने अपनी इच्छा से उत्तर प्रदेश के मुबारकपुर स्थित प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थान Al Jamia Ashrafia Mubarakpur में दाखिला लिया।

यह संस्थान आजमगढ़ जिले में स्थित है और पारंपरिक इस्लामी शिक्षा के लिए जाना जाता है। यहां से उन्होंने अलीमिय्या की डिग्री प्राप्त की। इस दौरान उन्होंने धार्मिक अध्ययन के साथ साथ अपने अंदर अनुशासन और आत्मविश्वास को भी विकसित किया।

इसके बाद उन्होंने आधुनिक शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने Jawaharlal Nehru University से अरबी भाषा में स्नातक और फिर इसी विषय में एमए किया। आगे चलकर उन्होंने पश्चिम एशियाई अध्ययन में एमफिल की पढ़ाई पूरी की और शोध कार्य से भी जुड़े रहे।

शाहिद रजा खान का कहना है कि उनकी सफलता में मदरसे की शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। उनका मानना है कि मदरसा शिक्षा ने उनमें आत्मविश्वास पैदा किया। इससे उनके भीतर ईमानदारी और प्रतिबद्धता की भावना विकसित हुई।

उन्होंने एक बातचीत में कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास लक्ष्य हासिल करने का आत्मविश्वास हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती। उन्होंने कहा कि समाज में किसी भी धर्म या शिक्षा प्रणाली को लेकर पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए।

शाहिद रजा खान बताते हैं कि उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा उनकी मां हैं। उन्होंने हमेशा उन्हें पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। परिवार के सहयोग और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी जारी रखी।

यूपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद वे भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में सेवा देने के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि धर्म इंसान को मानवता की सेवा करना सिखाता है। इसी भावना के साथ वे समाज और देश की सेवा करना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि शाहिद रजा खान की सफलता यह दिखाती है कि पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा साथ साथ चल सकती हैं। अगर अवसर और मार्गदर्शन मिले तो किसी भी पृष्ठभूमि का छात्र देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में सफलता हासिल कर सकता है।

आज शाहिद रजा खान की कहानी उन हजारों छात्रों के लिए उम्मीद की किरण बन गई है जो छोटे कस्बों और साधारण परिवारों से निकलकर बड़े सपने देखते हैं। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि मेहनत, विश्वास और शिक्षा के बल पर हर बाधा को पार किया जा सकता है।