एएमयू में अनोखा शोध, पेड़ पौधों की ‘तस्बीह’ पर अकादमिक चर्चा, इंजीनियरिंग विभाग को अमेरिका से ग्रांट
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, हैदराबाद
हैदराबाद स्थित Maulana Azad National Urdu University में महिलाओं की साहित्यिक भूमिका और उनके सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। “Women Writing in India: Contemporary Perspectives and New Aesthetics” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में देश के कई विश्वविद्यालयों के शिक्षाविद और शोधार्थी शामिल हुए।
यह एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी अंग्रेजी विभाग और Sahitya Akademi के सहयोग से सीपीडीयूएमटी ऑडिटोरियम में आयोजित की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय साहित्य में महिलाओं की बदलती अभिव्यक्ति, उनके अनुभव और समकालीन साहित्यिक प्रवृत्तियों को समझना था।
संगोष्ठी की शुरुआत अंग्रेजी विभाग के निदेशक और विभागाध्यक्ष डॉ. नागेंद्र कोटा चेरू के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने कहा कि समकालीन साहित्य में महिलाओं की लेखन परंपरा तेजी से मजबूत हो रही है। महिलाओं की आवाज अब साहित्य के केंद्र में दिखाई दे रही है। उनके अनुभव और संघर्ष नई पीढ़ी के लेखन को दिशा दे रहे हैं।
कार्यक्रम की संयोजक और अंग्रेजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गीता ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज में महिलाओं की रचनात्मक अभिव्यक्ति को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। अलग अलग भाषाओं और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाली महिलाओं की लेखन परंपरा भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाती है।
विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर इश्तियाक अहमद ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं के साहित्यिक योगदान पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होना स्वागत योग्य कदम है। ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम नई पीढ़ी के शोधार्थियों को गंभीर अध्ययन के लिए प्रेरित करते हैं।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मैनू अंजुमन ए ख्वातीन की अध्यक्ष अरशिया हसन मौजूद थीं। उन्होंने कहा कि महिलाओं की रचनात्मक आवाज को पहचानना आज के समय की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों को ऐसा बौद्धिक वातावरण तैयार करना चाहिए जहां लैंगिक समानता, प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा हो सके।
विशिष्ट अतिथि के रूप में जानी मानी लेखिका और शोधकर्ता Gogu Shyamala ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि महिलाओं का लेखन समाज में बदलाव लाने की बड़ी ताकत रखता है। हाशिये पर रहने वाले समुदायों के अनुभवों को सामने लाने में महिला लेखकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति Ainul Hasan ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि महिलाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। जब महिलाएं इन क्षेत्रों में आगे आती हैं तो समाज में सकारात्मक और स्थायी बदलाव संभव होता है।
उन्होंने अंग्रेजी विभाग की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे विचारोत्तेजक विषयों पर संगोष्ठी आयोजित करना विश्वविद्यालय की शैक्षणिक परंपरा को मजबूत बनाता है।
उद्घाटन सत्र का समापन डॉ. अकर्म खान के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी अफ्शां मुस्कान ने किया।
संगोष्ठी के दौरान कई महत्वपूर्ण सत्र भी आयोजित किए गए। मुख्य व्याख्यान Nandini Sahu ने प्रस्तुत किया। वह पश्चिम बंगाल स्थित हिंदू यूनिवर्सिटी की कुलपति हैं और भारतीय साहित्य में महिला लेखन पर उनके शोध को व्यापक मान्यता मिली है।
इसके अलावा “Voices Across Languages: Women Writing in Translation” विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा भी आयोजित की गई। इस सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर नागरत्ना वी परांडे ने की। इस चर्चा में प्रोफेसर सुनीता रानी, डॉ. रेनुका एल नायक और डॉ. असमा राशिद ने अपने विचार साझा किए।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम न केवल साहित्यिक विमर्श को आगे बढ़ाते हैं बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका को समझने का नया दृष्टिकोण भी प्रदान करते हैं।
यह संगोष्ठी भारतीय साहित्य में महिलाओं की रचनात्मक शक्ति और उनके अनुभवों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।

