सवालों के घेरे में है अमेरिका का ईरान पर हमला: ऑनलाइन मौजूद बच्चियों के स्कूल पर कैसे दागी गई मिसाइल ?
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मुस्लिम नाउ विशेष
पूरी दुनिया इस समय गहरे निराशा और असमंजस के दौर से गुजर रही है। मानवाधिकार, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय कानून की बात करने वाले कई बड़े देश ऐसे समय में चुप्पी साधे हुए हैं, जब दुनिया को युद्ध के मुहाने पर ले जाने वाली दो महाशक्तियाँ—संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़रायल—पश्चिम एशिया में लगातार सैन्य कार्रवाई कर रही हैं। इन हमलों का सबसे बड़ा शिकार आम नागरिक और विशेष रूप से बच्चे बन रहे हैं।
हाल की घटनाओं ने दुनिया को झकझोर दिया है। एक ओर लेबनान में इजरायली हमलों में सौ से अधिक बच्चों की मौत की खबर सामने आई है, तो दूसरी ओर एक खोजी रिपोर्ट ने यह संकेत दिया है कि ईरान के एक लड़कियों के स्कूल पर हुआ विनाशकारी मिसाइल हमला संभवतः जानबूझकर किया गया था।
ब्रिटिश समाचार एजेंसी Reuters की एक विस्तृत जांच ने इस घटना के कई ऐसे पहलुओं को उजागर किया है जो युद्ध में नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

ईरान के गर्ल्स स्कूल पर हमला: क्या यह सचमुच “गलती” थी?
ईरान के दक्षिणी शहर मीनाब में स्थित शजरेह तैय्येबेह गर्ल्स स्कूल पर 28 फरवरी को युद्ध के पहले दिन हमला हुआ था। इस हमले में स्कूल की इमारत पूरी तरह तबाह हो गई और बड़ी संख्या में छात्राओं की मौत हो गई।
ईरान के जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मिशन के राजदूत अली बहरेनी के अनुसार इस हमले में करीब 150 छात्राओं की मौत हुई। वहीं Iranian Red Crescent ने मृतकों की संख्या 175 तक बताई है।
अमेरिकी अधिकारियों ने शुरू में इस हमले को “गलती” बताया था, लेकिन रॉयटर्स की जांच ने इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जांच में पाया गया कि यह स्कूल कोई छिपी हुई या नई इमारत नहीं थी। इसके विपरीत, इस स्कूल की कई वर्षों से स्पष्ट ऑनलाइन मौजूदगी थी।
स्कूल की वेबसाइट पर छात्राओं द्वारा बनाए गए रंगीन चित्र, उनकी गतिविधियों की तस्वीरें और स्कूल के कार्यक्रमों की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी। सोशल मीडिया और स्थानीय व्यवसायिक सूचीकरण वेबसाइटों पर भी इस स्कूल का उल्लेख मौजूद था।
सैटेलाइट तस्वीरों में भी इस इमारत की पहचान एक स्कूल के रूप में साफ दिखाई देती थी—दीवारों पर बने रंगीन चित्र, बच्चों के खेल के मैदान की निशानियाँ और स्कूल का परिसर स्पष्ट रूप से दिखता था।
इससे यह सवाल उठता है कि यदि यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी तो फिर इस इमारत को सैन्य लक्ष्य कैसे समझ लिया गया?

सैन्य परिसर के पास था स्कूल
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार यह स्कूल एक सैन्य परिसर के पास स्थित था, जो Islamic Revolutionary Guard Corps (आईआरजीसी) से जुड़ा हुआ बताया जाता है।
स्कूल और सैन्य परिसर के बीच एक दीवार थी, जिस पर रंग-बिरंगे चित्र बने हुए थे।
युद्ध के पहले दिन हुए हमले में इस पूरे परिसर पर कई मिसाइलें दागी गईं। सैटेलाइट तस्वीरों और वीडियो के विश्लेषण से पता चलता है कि कम से कम सात अलग-अलग विस्फोट हुए थे।
इनमें से एक मिसाइल संभवतः अमेरिकी टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल थी, जिसे समुद्री जहाजों या पनडुब्बियों से दागा जाता है।
उस समय अमेरिकी नौसेना के विध्वंसक जहाज USS Spruance से ऐसी मिसाइलों के प्रक्षेपण की तस्वीरें भी जारी की गई थीं।
वीडियो फुटेज में देखा गया कि मिसाइल के गिरते ही आसपास के इलाके में धुएँ का बड़ा गुबार उठ गया और पूरी इमारत मलबे में बदल गई।

क्या पुरानी जानकारी के आधार पर हुआ हमला?
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि हमले के पीछे पुराने और अपडेट न किए गए लक्ष्य डेटा की भूमिका हो सकती है।
रक्षा विशेषज्ञ मार्क कैंसियन का कहना है कि युद्ध की स्थिति में अमेरिकी सैन्य कमान के पास पहले से तैयार लक्ष्य सूची होती है।
लेकिन यदि इन सूचियों को नियमित रूप से अपडेट न किया जाए तो ऐसी त्रासदियाँ हो सकती हैं, जहाँ सैन्य लक्ष्य समझकर नागरिक इमारतों पर हमला हो जाता है।
उन्होंने कहा कि इस घटना से सबसे बड़ा सबक यही है कि युद्ध में लक्ष्य सूची की लगातार समीक्षा जरूरी है।

बच्चों की कब्रों की कतार
हमले के बाद जो दृश्य सामने आए, वे बेहद दर्दनाक थे।
सैटेलाइट विश्लेषण से पता चला कि हमले के कुछ दिनों बाद मीनाब के कब्रिस्तान में जमीन में एक साथ कई नई कब्रें खोदी गईं।
2 मार्च को वहाँ बच्चों के शव दफनाए गए। जमीन पर एक के बाद एक लगभग 20 आयताकार कब्रों की कतारें दिखाई दीं—एक ऐसा दृश्य जिसने इस त्रासदी की भयावहता को दुनिया के सामने रख दिया।

लेबनान में भी बढ़ती जा रही है त्रासदी
इसी बीच युद्ध का असर पड़ोसी देश लेबनान पर भी तेजी से दिखाई दे रहा है।
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार हालिया संघर्ष में अब तक 773 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें कम से कम 100 बच्चे और 62 महिलाएँ शामिल हैं।
करीब 1900 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
यह संघर्ष मुख्य रूप से इज़रायल और लेबनान के सशस्त्र संगठन Hezbollah के बीच बढ़ते तनाव का परिणाम माना जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी UNICEF ने चेतावनी दी है कि लेबनान में बच्चों की स्थिति “विनाशकारी” होती जा रही है।
संस्था के जर्मनी स्थित निदेशक क्रिश्चियन श्नाइडर ने कहा कि किसी भी परिस्थिति में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

लाखों लोग बेघर
संघर्ष के कारण लेबनान में मानवीय संकट तेजी से गहराता जा रहा है।
Norwegian Refugee Council के अनुसार केवल दस दिनों के भीतर लगभग 8.16 लाख लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं, जो देश की कुल आबादी का करीब 14 प्रतिशत है।
इस संगठन की लेबनान निदेशक मॉरीन फिलिपॉन ने कहा कि हर गुजरते घंटे के साथ तबाही और विस्थापन का पैमाना बढ़ता जा रहा है।
इज़रायल द्वारा जारी किए गए निकासी आदेश अब लगभग 1470 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर कर चुके हैं, जिसमें दक्षिणी लेबनान, बेरूत के दक्षिणी उपनगर और बेका घाटी के हिस्से शामिल हैं।
शरणस्थलों में अमानवीय हालात
जैसे-जैसे विस्थापित लोगों की संख्या बढ़ रही है, राहत शिविरों की स्थिति भी बदतर होती जा रही है।
करीब 1,22,000 लोग सामूहिक शरणस्थलों में रह रहे हैं, जहाँ भीड़ इतनी ज्यादा है कि एक-एक कक्षा में 15 लोग रह रहे हैं और एक शौचालय पर 20 से अधिक लोगों को निर्भर रहना पड़ रहा है।
कई स्थानों पर पीने के पानी की भारी कमी है। नहाने की व्यवस्था नहीं है और खाना बनाने की सुविधाएँ भी बेहद सीमित हैं।
इस संकट का असर शिक्षा पर भी पड़ा है। अनुमान है कि लगभग 10 लाख बच्चों की पढ़ाई बाधित हो चुकी है।
पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा था लेबनान
लेबनान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। देश की सार्वजनिक सेवाएँ कमजोर थीं और सरकारी संसाधन सीमित थे।
ऐसे में अचानक लाखों लोगों के विस्थापन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
मानवीय संगठनों का कहना है कि यदि हिंसा जल्द नहीं रुकी तो यह संकट और भी गहरा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी
इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि युद्ध में नागरिकों—विशेष रूप से बच्चों—की सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय कानून का मूल सिद्धांत है।
लेकिन जब स्कूलों, घरों और शरणस्थलों पर हमले होते हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या युद्ध के नियमों का पालन किया जा रहा है।
आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वैश्विक शक्तियाँ इस बढ़ती हुई त्रासदी को रोकने के लिए आगे आएंगी, या फिर मासूम बच्चों की मौतें सिर्फ आँकड़ों में बदलकर रह जाएंगी?
पश्चिम एशिया के इस संघर्ष ने एक बार फिर यह याद दिला दिया है कि युद्ध का सबसे बड़ा बोझ हमेशा आम नागरिकों और मासूम बच्चों को ही उठाना पड़ता है।
और जब दुनिया की ताकतवर आवाजें खामोश हो जाएँ, तब इंसानियत की कीमत और भी भारी हो जाती है।

