Religion

एतिकाफ की रूहानियत और शरई मसाइल-क्या छत पर जाना और धूम्रपान जायज है?

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

रमजान का मुकद्दस महीना अपने आखिरी पड़ाव यानी ‘तीसरे अशरे’ में दाखिल हो चुका है। यह वह दौर है जब मोमिनों की इबादत अपने उरूज (चरम) पर होती है। इस आखिरी अशरे की सबसे महत्वपूर्ण और रूहानी इबादत है ‘एतिकाफ’। दुनियादारी की तमाम मसरूफियतों को पीछे छोड़कर अल्लाह की खुशनूदी के लिए मस्जिद के कोने में खुद को महदूद कर लेना ही एतिकाफ है।

लेकिन, अक्सर एतिकाफ में बैठने वाले हजरात के जेहन में कुछ अहम सवाल उठते हैं। जैसे—क्या एतिकाफ की हालत में मस्जिद की छत पर जाया जा सकता है? क्या इफ्तार के बाद बीड़ी-सिगरेट का सेवन जायज है? आज ‘मुस्लिम नाउ’ अपनी इस विशेष रिपोर्ट में वरिष्ठ आलिमों और हदीस के हवाले से इन पेचीदा सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेगा।


एतिकाफ: मुहल्ले की जिम्मेदारी और सवाब का समंदर

इस्लामी नजरिए से एतिकाफ ‘सुन्नत-ए-मुअक्कदा अलल किफ़ाया’ है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर मुहल्ले या इलाके की मस्जिद में कोई एक शख्स भी एतिकाफ में बैठ जाता है, तो पूरे मुहल्ले की तरफ से यह जिम्मेदारी पूरी हो जाती है। लेकिन, अगर पूरी बस्ती में कोई भी शख्स एतिकाफ न करे, तो इस्लामी नजरिए से पूरी बस्ती गुनाहगार मानी जाती है।

कुरान-ए-करीम की सूरह अल-बकरा (आयत 125) में अल्लाह ताला फरमाता है:

“हमने इब्राहीम और इस्माइल को हुक्म दिया कि मेरे घर को तवाफ करने वालों, एतिकाफ करने वालों और रुकू-सजदा करने वालों के लिए पाक-साफ रखो।”

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मदीना हिजरत करने के बाद अपनी वफात तक कभी भी रमजान के आखिरी दस दिनों का एतिकाफ नहीं छोड़ा। एक हदीस (शुअबुल ईमान) के मुताबिक, जो शख्स रमजान के आखिरी अशरे में एतिकाफ करता है, उसे दो हज और दो उमराह के बराबर सवाब मिलता है।


मस्जिद की छत पर जाने का मसला: कब जायज, कब नाजायज?

एतिकाफ करने वाले शख्स (मोतकिफ) के लिए नियम बहुत सख्त हैं। उसे ‘हुदूद-ए-मस्जिद’ यानी मस्जिद की सीमा के अंदर ही रहना होता है। मस्जिद की छत पर जाने को लेकर शरीयत का कानून बड़ा स्पष्ट है:

  1. अंदरूनी सीढ़ियां: यदि मस्जिद की छत पर जाने वाली सीढ़ियां मस्जिद के अंदर से ही हैं, तो मोतकिफ इबादत की नीयत से या हवाखोरी के लिए छत पर जा सकता है। इससे उसके एतिकाफ पर कोई आंच नहीं आएगी।
  2. बाहरी सीढ़ियां: यदि छत पर जाने का रास्ता मस्जिद के मुख्य द्वार से बाहर निकलकर या गली की तरफ से है, तो मोतकिफ का वहां जाना हराम है। अगर वह इन बाहरी सीढ़ियों का इस्तेमाल करता है, तो उसका एतिकाफ टूट जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार का विश्लेषण: यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि एतिकाफ का असल मकसद एकांतवास है। छत पर जाना केवल जरूरत के तहत होना चाहिए, न कि दुनियादारी देखने या लोगों से बात करने के लिए।


धूम्रपान और एतिकाफ: एक ‘नापाक’ आदत और पाकीजा इबादत

एतिकाफ के दौरान या आम दिनों में भी बीड़ी, सिगरेट या हुक्का पीना न केवल सेहत के लिए हानिकारक है, बल्कि इसे इस्लामी विद्वानों ने ‘मकरूह’ (नापसंद) करार दिया है। एतिकाफ की हालत में मस्जिद के अंदर धूम्रपान करना तो सिरे से नाजायज है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:

1. मस्जिद की हुरमत और दुर्गंध

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ऐसी किसी भी चीज को खाकर मस्जिद आने से मना फरमाया है जिससे बदबू आती हो। सही मुस्लिम की हदीस (1136) के मुताबिक, आप (स.) ने लहसुन और प्याज खाकर मस्जिद आने से तब तक मना किया जब तक उसकी गंध न चली जाए। तर्क: जब लहसुन-प्याज जैसी हलाल चीजों की गंध मस्जिद में नापसंद है, तो सिगरेट और बीड़ी की कड़वी और जहरीली गंध—जो दूसरों को तकलीफ पहुंचाती है—मस्जिद में कैसे जायज हो सकती है?

2. खुद को हलाकत (विनाश) में डालना

कुरान (सूरह बकरा, आयत 195) में स्पष्ट है— “अपने हाथों खुद को तबाही में न डालो।” चूंकि सिगरेट फेफड़ों और जान के लिए घातक है, इसलिए इसे इबादत के वक्त अपनाना तकवे (परहेजगारी) के खिलाफ है।


इतिकाफ के दौरान क्या करें और क्या न करें?

  • खामोशी और जिक्र: मोतकिफ को चाहिए कि वह अपना ज्यादातर वक्त कुरान की तिलावत, नमाज और तस्बीह में गुजारे। बेजा बातचीत एतिकाफ की रूह को खत्म कर देती है।
  • जरूरतें: केवल मानवीय जरूरतों (जैसे इस्तेंजा/शौच) के लिए ही मस्जिद से बाहर जाने की इजाजत है। खाना अगर कोई पहुंचाने वाला न हो, तो उसे लाने के लिए बाहर जाया जा सकता है।
  • महिलाओं का एतिकाफ: महिलाएं अपने घरों में एक जगह मुकर्रर (निश्चित) करके एतिकाफ कर सकती हैं। वे इस दौरान घर के हल्के काम भी कर सकती हैं, बशर्ते उनकी तवज्जो इबादत से न हटे।

निष्कर्ष: एतिकाफ केवल रस्म नहीं, रूहानी ट्रेनिंग है

सऊदी अरब के ग्रैंड मुफ्ती से लेकर उपमहाद्वीप के उलेमाओं तक, सबका यही मानना है कि एतिकाफ का मकसद अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगना और ‘लैलतुल कद्र’ (शब-ए-कद्र) को तलाशना है।

धूम्रपान जैसी आदतें या बिना वजह छत पर टहलना इस महान इबादत की गरिमा को कम करती हैं। एतिकाफ एक ऐसी ट्रेनिंग है जो मुसलमान को सिखाती है कि वह अपनी नफ्स (इच्छाओं) पर काबू कैसे पाए। अगर एक शख्स दस दिन तक सिगरेट या फालतू बातों को छोड़ देता है, तो वह ताउम्र इन बुराइयों से लड़ने की ताकत हासिल कर सकता है।

इस रमजान, यदि आप एतिकाफ में हैं, तो अपनी इबादत को इन छोटी-छोटी कोताहियों से बचाएं। याद रखें, मस्जिद खुदा का घर है और वहां की पाकीजगी का ख्याल रखना हर मोमिन का फर्ज है।