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ईरान, गाजा और लेबनान में बच्चों का खून, दुनिया खामोश !

मुस्लिम नाउ विशेष

दुनिया के नक्शे पर एक बार फिर मासूम बच्चों और महिलाओं का खून बहा है। ईरान से लेकर लेबनान और गाजा तक, तस्वीरें विचलित करने वाली हैं। मलबे के नीचे दबी किताबें, टूटी हुई बेंच और खामोश हो गई किलकारियां, एक भयावह मंजर बयां कर रही हैं। लेकिन, इस तबाही से भी ज्यादा हैरान करने वाली बात दुनिया की रहस्यमयी खामोशी है। वह खामोशी, जो उन गलियारों से आ रही है जहां कभी महिला अधिकारों और मानवाधिकारों की गूंज सबसे तेज होती थी।

विभिन्न विश्वसनीय सूत्रों से यह दिल दहला देने वाली खबर सामने आ रही है कि अमेरिका ने ईरान में लड़कियों के एक स्कूल पर मिसाइल हमला किया है। यह हमला उस वक्त हुआ जब मासूम बच्चियां अपनी क्लास में पढ़ाई कर रही थीं। आसमान से बरसी मौत ने उनके सुनहरे भविष्य को मलबे में तब्दील कर दिया। इस हमले में एक सौ सत्तर से ज्यादा छात्राएं अपनी किताबों के साथ बेंच के नीचे दबकर दम तोड़ गईं। यह केवल एक हमला नहीं, बल्कि शिक्षा और भविष्य पर एक सीधा प्रहार है।

इस भयावह घटना के बाद, एक बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर वे तमाम ‘पैरोकार’ अब कहां हैं? वे लोग, जो अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं की दुर्दशा पर छाती पीटते थे। वे संस्थाएं, जो ईरान में महिलाओं की “आजादी” के लिए बड़े-बड़े आंदोलन चलाती थीं। वे नेता, जो मुस्लिम महिलाओं को बुर्का और हिजाब से निजात दिलाने की वकालत करते थे और तीन तलाक जैसे कानून बनाकर महिलाओं को इंसाफ दिलाने का दावा करते थे। आज उन सबकी बोलती बंद है।

नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई, जो दुनिया भर में लड़कियों की शिक्षा और अधिकारों के लिए एक बड़ा चेहरा मानी जाती हैं, उनकी तरफ से भी इस घटना पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई है। वह मलाला, जो ईरान में बुर्के के खिलाफ महिलाओं की आवाज बनती थीं, आज अमेरिका के इस कृत्य पर मौन हैं। यह खामोशी कई सवाल खड़े करती है। क्या मानवाधिकारों की परिभाषा भौगोलिक सीमाओं और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बदल जाती है?

सिर्फ मलाला ही नहीं, बल्कि ‘बेटी बचाने’ का नारा देने वाले और महिला अधिकारों को सर्वोपरि मानने वाले यूरोपीय और अमेरिकी मुल्क भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनकी यह चुप्पी अपराधियों को शह देने जैसी है। यहां तक कि इस्लामिक देशों के संगठन (OIC), जो अक्सर मुस्लिम हितों की बात करता है, उसे भी इस वक्त जैसे लकवा मार गया है। ओआईसी की यह खामोशी भी कम हैरान करने वाली नहीं है।

वे लोग भी अब परिदृश्य से गायब हैं, जो तालिबान सरकार को इसलिए मान्यता नहीं देने की वकालत करते थे क्योंकि उसने महिलाओं के पढ़ने और नौकरी करने के अधिकार छीन लिए हैं। क्या अमेरिका द्वारा स्कूल पर मिसाइल दागना महिलाओं के अधिकारों का हनन नहीं है? क्या एक सौ सत्तर लड़कियों की जान की कोई कीमत नहीं है? यह दोहरा मापदंड दुनिया के सामने उजागर हो गया है।

दुखद पहलू यह है कि यह हिंसा केवल ईरान तक सीमित नहीं है। ईरान के इस हमले के एक दिन पहले ही, इजरायल ने लेबनान में हमला कर सौ बच्चों को मौत के घाट उतार दिया। इससे पहले, गाजा में इजरायल के हमलों में हजारों बच्चों की जान जा चुकी है। गाजा में इजरायल के लगातार हमलों के कारण तकरीबन तीस हजार बच्चे विभिन्न गंभीर रोगों के शिकार हो गए हैं। वहां भी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। लेकिन, कथित तौर पर बच्चों और बच्चियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन इस पर भी खामोश हैं।

कानून और तमाम धार्मिक पुस्तकों में यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि जालिम के साथ खड़ा रहने वाला व्यक्ति भी जालिम ही होता है। कानून तोड़ने वाले की वकालत करने वाला भी उतना ही गुनाहगार होता है। आज अमेरिका और इजरायल के इन कथित गुनाहों में जो भी देश, संगठन या व्यक्ति शामिल हैं, उनका नाम भी इतिहास में दर्ज होगा। इतिहास कभी किसी को माफ नहीं करता।

जब हम हिंदू और मुस्लिम राजाओं की सेनाओं का नेतृत्व करने वाले सेनापतियों को उनके कारनामों के लिए याद करते हैं, तो आज के गुनहगारों को भी नहीं भूला जाएगा। जिस तरह अकबर, औरंगजेब और बाबर के हिंदू दरबारियों को याद किया जाता है, और बताया जाता है कि शिवाजी महाराज की सेना की कमान किस मुसलमान ने संभाल रखी थी, उसी तरह आज के इन दोहरे मापदंडों को भी याद रखा जाएगा। इतिहास याद रखेगा कि कैसे दुनिया के तथाकथित ‘सभ्य’ और ‘मानवाधिकारों के रक्षक’ मुल्क छोटी बच्चियों और बच्चों के हत्यारे अमेरिका और इजरायल के साथ बेशर्मी से खड़े रहे।

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यह खामोशी केवल राजनीतिक नहीं है, यह एक नैतिक पतन का संकेत है। जब मासूमों का खून बह रहा हो और दुनिया मूकदर्शक बनी रहे, तो समझ लेना चाहिए कि इंसानियत शर्मसार हो रही है। अब समय आ गया है कि दुनिया इन दोहरे मापदंडों को त्यागे और हर इंसान के अधिकारों के लिए एक समान आवाज उठाए, चाहे अपराधी कोई भी हो और पीड़ित कहीं का भी।