PoliticsTOP STORIES

ईरान संकट पर शिया समुदाय में रार और मौलाना रजानी के सवाल

Table of Contents

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में गहराते तनाव के बीच मुस्लिम जगत, विशेषकर शिया समुदाय के भीतर एक बड़ा वैचारिक युद्ध छिड़ गया है। एक तरफ जहाँ ईरान और उसके समर्थकों द्वारा इजरायल और अमेरिका की आक्रामकता का विरोध किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर समुदाय के भीतर से ही कुछ ऐसी आवाजें उठ रही हैं जो ईरान के वर्तमान नेतृत्व और उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

हाल ही में हुए घटनाक्रमों ने इस दरार को और चौड़ा कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी बमबारी में 170 ईरानी छात्राओं की मौत और 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के दावों ने क्षेत्र में बारूद की गंध भर दी है। इस बीच, सोशल मीडिया पर उन लोगों की सक्रियता बढ़ गई है जो ईरान के भीतर महिलाओं पर होने वाले ‘कथित अत्याचारों’ की पुरानी दास्तानें दोहरा रहे हैं, लेकिन स्कूल पर हुए मिसाइल हमले में मारी गईं निर्दोष बच्चियों पर रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए हैं।

ईरान, गाजा और लेबनान में बच्चों का खून, दुनिया खामोश !

सवालों के घेरे में है अमेरिका का ईरान पर हमला: ऑनलाइन मौजूद बच्चियों के स्कूल पर कैसे दागी गई मिसाइल ?

मौलाना हसन अली रजानी का तीखा हमला

गुजरात के प्रमुख शिया विद्वान मौलाना हसन अली रजानी ने इस मुद्दे पर एक बड़ा बयान देकर बहस को नई दिशा दे दी है। उन्होंने ईरान के प्रति सहानुभूति रखने वाले शिया समूहों पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘प्रायोजित’ करार दिया। मौलाना रजानी ने आरोप लगाया कि ईरान के समर्थन में खड़े कई लोग चंद रुपयों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

उन्होंने भारतीय फिल्म जगत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय ईरानी अभिनेत्री अल-नाज़ नोरौज़ी की जमकर तारीफ की। मौलाना ने कहा, “हमारे शिया विद्वानों को अल-नाज़ जैसी अभिनेत्रियों से सबक लेना चाहिए कि सच का साथ कैसे दिया जाता है।” उन्होंने सीधे तौर पर उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो मीडिया के सामने रोने-धोने का नाटक करते हैं। मौलाना के शब्दों में, “हमें हर जगह 200-200 रुपये वाली औरतें नहीं मिलतीं जो कैमरे के सामने विलाप करें, और न ही हर शिया पैसे का लालची है जो वीडियो बनाकर ईरान से 500 रुपये ऐंठना चाहे।”

अल-नाज़ नोरौज़ी: विरोध का वैश्विक चेहरा

ईरानी मूल की अभिनेत्री अल-नाज़ नोरौज़ी, जो वर्तमान में अक्षय कुमार के साथ एक गेम शो होस्ट कर रही हैं, लंबे समय से तेहरान की सत्ता के खिलाफ मुखर रही हैं। हालिया साक्षात्कारों में उन्होंने खुलासा किया कि वह अपनी मातृभूमि वापस नहीं जा सकतीं क्योंकि वहां उनकी जान को खतरा है। 1990 के दशक में तेहरान में जन्मी अल-नाज़ ने बताया कि ईरान की एक बड़ी आबादी मौजूदा विचारधारा से सहमत नहीं है और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग कर रही है।

अल-नाज़ का कहना है कि बाहर की दुनिया ईरान की आंतरिक सच्चाई को गलत समझती है। उनके अनुसार, ईरानी जनता शिक्षित और प्रबुद्ध है और वे एक अलग राजनीतिक भविष्य का सपना देख रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कभी ईरान के अमेरिका और इजरायल के साथ मजबूत रिश्ते हुआ करते थे।

नैतिकता और मानवाधिकारों का दोहरा मापदंड?

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल मानवाधिकारों के दोहरे मापदंडों का है। एक तरफ जहाँ तालिबान द्वारा महिलाओं की शिक्षा रोकने पर वैश्विक आक्रोश फैलता है, वहीं अमेरिका द्वारा कथित तौर पर एक स्कूल को निशाना बनाए जाने और 170 छात्राओं की जान जाने पर मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी खटकने वाली है।

मौलाना रजानी ने सवाल उठाया कि न्याय और कानून कहाँ है? उन्होंने इस बात का कड़ा विरोध किया कि शियाओं को पूरी दुनिया में पीटकर या डराकर सुप्रीम लीडर खामेनेई के लिए मातम मनाने पर मजबूर किया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि निष्ठा और संवेदना किसी दबाव या पैसे का मोहताज नहीं होनी चाहिए।

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता यह टकराव अब केवल सैन्य सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह घरों और मस्जिदों के भीतर वैचारिक संघर्ष का रूप ले चुका है। जहाँ एक पक्ष इसे साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ जंग मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे ईरान की आंतरिक तानाशाही से मुक्ति के अवसर के रूप में देख रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि शिया समुदाय के भीतर की यह ‘रार’ क्या मोड़ लेती है और क्या अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उन 170 मासूम छात्राओं को न्याय दिला पाएगी जिनकी आवाज मलबे के नीचे दब गई है।