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USCIRF रिपोर्ट में RSS पर प्रतिबंध की मांग,भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर कड़ी टिप्पणी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

मध्य पूर्व में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत की विदेश नीति पर भी नजरें टिकी हुई हैं। भारत की सरकार इस समय कई वैश्विक मुद्दों पर अमेरिका के साथ खड़ी दिखाई देती है। लेकिन इसी दौरान अमेरिका से आई एक रिपोर्ट ने भारत की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

अमेरिका की संस्था United States Commission on International Religious Freedom ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में भारत की सत्तारूढ़ पार्टी और उससे जुड़े संगठनों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में खास तौर पर Rashtriya Swayamsevak Sangh का उल्लेख किया गया है। आयोग ने इसे हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़ा संगठन बताते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है।

रिपोर्ट जारी होते ही यह देश और विदेश में चर्चा का विषय बन गई। कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया। भारत में भी इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।

रिपोर्ट की शुरुआत भारत की सामाजिक और जनसंख्या संरचना से होती है। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताया गया है। देश की आबादी करीब एक अरब चालीस करोड़ है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत की आबादी में लगभग 78.9 प्रतिशत हिंदू हैं। मुसलमानों की आबादी लगभग 14.2 प्रतिशत है। ईसाई समुदाय करीब 2.3 प्रतिशत है। सिख समुदाय लगभग 1.7 प्रतिशत है। इसके अलावा पारसी, बौद्ध, बहाई और यहूदी समुदाय भी भारत में रहते हैं।

भारत का संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है।

लेकिन रिपोर्ट का कहना है कि 2014 के बाद से देश की सत्ता में मौजूद Bharatiya Janata Party की सरकार ने कई ऐसे कानून और नीतियां लागू की हैं जिनका असर धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कई ऐसे कानून लागू हैं जिनका इस्तेमाल अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ किया जाता है। इनमें विदेशी चंदा विनियमन कानून यानी एफसीआरए, गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून यानी यूएपीए, नागरिकता संशोधन कानून यानी Citizenship Amendment Act, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और वक्फ से जुड़े नए कानून शामिल हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इस धारा का उपयोग उन मामलों में किया जाता है जहां किसी धार्मिक भावना को आहत करने का आरोप लगाया जाता है।

रिपोर्ट में धर्म परिवर्तन से जुड़े कानूनों पर भी चर्चा की गई है। देश के 28 राज्यों में से 12 राज्यों में धर्म परिवर्तन विरोधी कानून लागू हैं।

2025 के दौरान कई राज्यों ने इन कानूनों को और सख्त किया। कुछ राज्यों ने नए कानून लागू किए। कई जगह सजा की अवधि बढ़ाई गई और धर्म परिवर्तन की परिभाषा को भी व्यापक किया गया।

पूर्वोत्तर के राज्य Arunachal Pradesh में एक पुराने धर्म परिवर्तन विरोधी कानून को लागू करने की कोशिश की गई। यह कानून कई वर्षों से निष्क्रिय था। इसे लागू करने के प्रयास के बाद ईसाई समुदाय के लोगों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए।

इसी तरह Uttarakhand में एक नया कानून पारित किया गया जिसमें धर्म से जुड़े डिजिटल संदेशों को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया। इस कानून के तहत अवैध धर्म परिवर्तन के मामलों में जेल की सजा को दस साल से बढ़ाकर चौदह साल तक कर दिया गया।

Rajasthan में भी धर्म परिवर्तन से जुड़े कानून को और सख्त किया गया। यहां ऐसे मामलों में आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान रखा गया। इस कानून के तहत अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहता है तो उसे पहले सरकार को दो महीने पहले सूचना देनी होगी।

अगर कोई धार्मिक गुरु या संस्था किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराती है तो उसे भी एक महीने पहले सरकार को सूचना देनी होगी। ऐसा न करने पर तीन साल तक की जेल हो सकती है।

Maharashtra में भी धर्म परिवर्तन रोकने के लिए नए कानून की तैयारी की घोषणा की गई।

Chhattisgarh में प्रस्तावित कानून में धार्मिक प्रार्थना सभाओं और चमत्कार आधारित इलाज के कार्यक्रमों को भी निशाने पर लेने की बात कही गई।

Assam सरकार ने भी एक नया कानून लाने की घोषणा की। इस कानून का उद्देश्य तथाकथित लव जिहाद को रोकना बताया गया। यह शब्द आमतौर पर अंतरधार्मिक विवाहों के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है।

इन कानूनों के खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों से इन कानूनों के औचित्य पर जवाब मांगा।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ मामलों में विदेशी धार्मिक नेताओं को भारत आने की अनुमति नहीं दी गई। उदाहरण के तौर पर अमेरिकी ईसाई प्रचारक रेवरेन्ड फ्रैंकलिन ग्राहम को वीजा देने से इनकार किए जाने की बात भी सामने आई।

रिपोर्ट में गोहत्या से जुड़े कानूनों के नाम पर होने वाली हिंसा का भी जिक्र किया गया है।

2025 के दौरान कई घटनाएं सामने आईं जिनमें भीड़ ने मुसलमानों पर हमला किया। इन हमलों को अक्सर गो संरक्षण के नाम पर अंजाम दिया गया।

मई में Uttar Pradesh में कुछ लोगों पर बीफ ले जाने का आरोप लगाकर हमला किया गया।

जून में Assam में ईद के दौरान कथित रूप से गाय काटने के आरोप में 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

हालांकि राज्य में गोहत्या पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। लेकिन 2021 के असम मवेशी संरक्षण कानून के तहत उन इलाकों में बीफ बेचने और गाय काटने पर रोक है जहां हिंदू, सिख या जैन समुदाय बहुसंख्यक हैं।

रिपोर्ट में जेलों में बंद धार्मिक अल्पसंख्यकों का भी उल्लेख किया गया है।

2025 के दौरान कई लोगों को जबरन धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। महाराष्ट्र में एक अमेरिकी नागरिक जेम्स वॉटसन और दो भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया।

सरकार पर यह आरोप भी लगाया गया है कि आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल कुछ मामलों में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ किया गया।

रिपोर्ट में Umar Khalid और Sharjeel Imam का उल्लेख भी किया गया है। दोनों को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए आंदोलन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार वे कई वर्षों तक बिना मुकदमे के जेल में रहे।

ब्रिटेन के नागरिक Jagtar Singh Johal का भी जिक्र किया गया है। एक अदालत ने उन्हें एक मामले में बरी कर दिया था। लेकिन अन्य मामलों के चलते वह अब भी जेल में हैं।

रिपोर्ट में एक और मामले का जिक्र किया गया है जिसमें एक मुस्लिम प्रोफेसर Ali Khan Mahmudabad को गिरफ्तार किया गया। उन पर सोशल मीडिया पर कश्मीर से जुड़े बयान देने का आरोप लगाया गया था।

इसी तरह उत्तर प्रदेश में “आई लव मोहम्मद” लिखे पोस्टर लगाने को लेकर भी कई लोगों को गिरफ्तार किए जाने की बात सामने आई। काशीपुर में इस मामले में सैकड़ों लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया।

रिपोर्ट में अमेरिका और भारत के कूटनीतिक संबंधों का भी जिक्र है।

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने फरवरी में प्रधानमंत्री Narendra Modi को वाशिंगटन बुलाया था। दोनों नेताओं के बीच कई मुद्दों पर बातचीत हुई। लेकिन सार्वजनिक चर्चा में धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा ज्यादा सामने नहीं आया।

अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance ने भी भारत का दौरा किया और व्यापार समझौते पर चर्चा की।

इसी दौरान कश्मीर में एक बड़ा हमला हुआ। भारत ने इसके लिए पाकिस्तान के लोगों को जिम्मेदार ठहराया। अमेरिका ने इस मामले में भारत का समर्थन किया।

अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के नेताओं से बातचीत की और क्षेत्र में शांति बनाए रखने की अपील की।

अमेरिका की टॉम लैंटोस मानवाधिकार आयोग में भी भारत से जुड़े मामलों पर सुनवाई हुई। इसमें कुछ गवाहों ने आरोप लगाया कि भारतीय सरकार विदेशों में रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाती है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है। इसमें कहा गया है कि भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लेकिन कुछ कानून और राजनीतिक माहौल ऐसे हैं जिनसे अल्पसंख्यक समुदायों के सामने चुनौतियां पैदा होती हैं।

आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में अमेरिकी विदेश मंत्रालय से सिफारिश की है कि भारत को धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े गंभीर मामलों के कारण विशेष निगरानी वाले देशों की सूची में रखा जाए। इसे कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न कहा जाता है।

अगर ऐसा होता है तो यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मुद्दा बन सकता है। फिलहाल इस रिपोर्ट ने भारत की राजनीति, लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।