Muslim World

ईरान-इजरायल युद्ध के 22 दिन: मोसाद-CIA का भ्रम टूटा, डिमोना परमाणु केंद्र और F-16 पर सटीक प्रहार

मुख्य बिंदु (Quick Highlights):

  • डिमोना: इजरायल के परमाणु केंद्र पर ईरानी मिसाइलों का सीधा प्रहार।
  • F-16: मध्य ईरान में इजरायली फाइटर जेट को निशाना बनाने का दावा।
  • राजनय: ब्रिटेन का साइप्रस बेस इस्तेमाल न करने का फैसला, G7 की युद्धविराम की मांग।
  • बाजार: तेल की कीमतों को संभालने के लिए अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में ढील देने की सुगबुगाहट।

मुस्लिम नाउ ब्यूरो,दुबई/रियाद

मध्य पूर्व (Middle East) में पिछले 22 दिनों से जारी भीषण युद्ध ने दुनिया के सैन्य समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। अमेरिका और इजरायल, जो अपनी खुफिया एजेंसियों—मोसाद और सीआईए—की अचूकता का दंभ भरते थे, आज ईरान की रणनीतिक जवाबी कार्रवाई के सामने बेबस नजर आ रहे हैं। यह युद्ध अब केवल दो देशों के बीच की जंग नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों के सैन्य अहंकार के पतन की गाथा बनता जा रहा है।

डिमोन परमाणु केंद्र पर हमला: इजरायल के ‘अभेद्य’ सुरक्षा कवच में सेंध

युद्ध के 22वें दिन की सबसे बड़ी खबर इजरायल के ‘नेगेव’ रेगिस्तान स्थित डिमोना (Dimona) परमाणु अनुसंधान केंद्र पर ईरानी मिसाइल हमला है। 1958 से संचालित यह केंद्र इजरायल की परमाणु शक्ति का हृदय माना जाता है। ईरान ने स्पष्ट किया कि यह हमला नतांज परमाणु साइट पर हुए हमलों का सीधा जवाब है।

रेस्क्यू सेवाओं के मुताबिक, इस हमले में 10 वर्षीय बालक और 40 वर्षीय महिला सहित लगभग दो दर्जन लोग घायल हुए हैं। हालांकि इजरायल ने हमेशा अपने परमाणु हथियारों पर चुप्पी साधी है, लेकिन डिमोना पर प्रहार ने यह संदेश दे दिया है कि ईरान अब इजरायल के सबसे संवेदनशील और गुप्त ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता रखता है।

हवा में मार गिराया F-16: ईरानी वायु रक्षा प्रणाली का पराक्रम

शनिवार तड़के ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने दावा किया कि उन्होंने मध्य ईरान के ऊपर उड़ान भर रहे एक इजरायली F-16 लड़ाकू विमान को सफलतापूर्वक मार गिराया है। गार्ड्स की वेबसाइट ‘सिपा न्यूज’ के अनुसार, यह कार्रवाई सुबह 3:45 बजे की गई। हालांकि इजरायली सेना ने मिसाइल दागे जाने की पुष्टि की है, लेकिन विमान के नुकसान से इनकार किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर F-16 के गिरने की पुष्टि होती है, तो यह अमेरिकी तकनीक और इजरायली वायु सेना की सर्वोच्चता के लिए एक बड़ा झटका होगा।

पश्चिमी गठबंधन में दरार: नाटो और G7 की छटपटाहट

ईरान की आक्रामक जवाबी कार्रवाई ने पश्चिमी देशों के खेमे में खलबली मचा दी है। कल तक इजरायल के पीछे चट्टान की तरह खड़े नाटो (NATO) देशों ने अब इस युद्ध से पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया है।

  • ब्रिटेन का यू-टर्न: ब्रिटेन ने साइप्रस को आश्वासन दिया है कि वहां स्थित ब्रिटिश एयरबेस ‘आरएएफ अक्रोतिरी’ का उपयोग ईरान पर हमलों के लिए नहीं किया जाएगा। हालांकि, डिएगो गार्सिया और इंग्लैंड के ठिकानों का उपयोग अभी भी जारी है।
  • G7 की अपील: दुनिया की सात सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं (G7) ने ईरान से ‘बिना शर्त’ युद्ध रोकने की अपील की है। जो देश कल तक प्रतिबंधों की भाषा बोलते थे, आज वे वैश्विक ऊर्जा संकट और हिंद महासागर में अपने युद्धपोतों के डूबने के डर से शांति की गुहार लगा रहे हैं।

हिंद महासागर में खौफ: अमेरिका-ब्रिटेन के ठिकानों पर प्रहार

ईरान ने युद्ध के दायरे को केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रखा है। 4,000 किलोमीटर दूर हिंद महासागर में स्थित ब्रिटेन-अमेरिका के संयुक्त सैन्य ठिकानों पर हुए हमले ने वाशिंगटन को हिलाकर रख दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा में एक अमेरिकी युद्धपोत को तारपीडो से डुबोए जाने की खबरों ने यह साबित कर दिया है कि ईरान की ‘असिमेट्रिकल वॉरफेयर’ (Asymmetrical Warfare) रणनीति के सामने पारंपरिक नौसैनिक बेड़े लाचार हैं।

खुफिया एजेंसियों की विफलता: मोसाद और CIA का ‘डेटा भ्रम’

दशकों से यह माना जाता रहा कि मोसाद और सीआईए के पास दुनिया के हर कोने की सटीक जानकारी है। ईरान के 50 से अधिक नेताओं की टारगेटेड हत्याओं और सीसीटीवी हैकिंग के बाद इजरायल को लगा था कि ईरान घुटने टेक देगा। लेकिन वेनेजुएला के उदाहरण की तरह, ईरान ने इस संकट को अवसर में बदल दिया।

ईरान ने उन ठिकानों पर हमला किया है जिनकी सुरक्षा का डेटा सीआईए के पास भी नहीं था। यह युद्ध अब डेटा और तकनीक की नहीं, बल्कि ‘इच्छाशक्ति और रणनीतिक गहराई’ की जंग बन चुका है। अमेरिका ने अब धीरे-धीरे प्रतिबंधों में ढील देने और वैश्विक तेल बाजार को स्थिर करने के लिए ईरानी तेल पर से दबाव कम करने के संकेत दिए हैं।

निष्कर्ष: बदलता हुआ वैश्विक निजाम

आज 22वें दिन, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऑपरेशंस को सीमित करने के संकेत और जी7 की अपील यह स्पष्ट करती है कि ईरान को कमजोर समझने की भूल अमेरिका-इजरायल को भारी पड़ी है। बड़े मुल्क जो जासूसी और तोड़फोड़ के दम पर धाक जमाते थे, आज वे खुद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।