मिडिल ईस्ट में महायुद्ध की आहट: सऊदी अरब ने ईरानी सैन्य अधिकारियों को निकाला
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प्रमुख बिंदु (Key Highlights)
- निष्कासन: ईरान के मिलिट्री अताशे समेत 5 अधिकारियों को 24 घंटे में सऊदी छोड़ने का आदेश।
- उल्लंघन: रियाद ने कहा- ईरान ने ‘बीजिंग समझौते’ और UNSC प्रस्तावों की धज्जियां उड़ाईं।
- एकजुटता: मिस्र के राष्ट्रपति सिसी और एमबीएस ने क्षेत्रीय सुरक्षा पर की गहन मंत्रणा।
- चेतावनी: सऊदी अरब ने आत्मरक्षा के लिए UN चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत कार्रवाई की बात दोहराई।
रियाद/जेद्दा | विशेष संवाददाता
पश्चिम एशिया (Middle East) का रणक्षेत्र अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ से वापसी की राहें धुंधली पड़ती जा रही हैं। 22 दिनों से जारी ईरान-इजरायल युद्ध की लपटें अब खाड़ी के सबसे शक्तिशाली मुल्क सऊदी अरब तक पहुँच गई हैं। शनिवार देर रात रियाद ने एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अपने यहाँ तैनात ईरानी सैन्य अताशे (Military Attache) और उनके पूरे स्टाफ को देश छोड़ने का फरमान सुना दिया है।
बीजिंग समझौता ताक पर: रियाद का सख्त एक्शन
सऊदी विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर घोषणा की है कि ईरानी दूतावास के सैन्य अताशे, सहायक सैन्य अताशे और तीन अन्य स्टाफ सदस्यों को ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ (अवांछनीय व्यक्ति) घोषित कर दिया गया है। उन्हें 24 घंटे के भीतर सऊदी अरब की सीमा छोड़ने का अल्टीमेटम दिया गया है।
यह कदम न केवल राजनयिक संबंधों में कड़वाहट को दर्शाता है, बल्कि 2023 में चीन की मध्यस्थता में हुए ‘बीजिंग समझौते’ के पूरी तरह विफल होने की भी पुष्टि करता है। सऊदी अरब ने स्पष्ट कहा है कि ईरान द्वारा उसकी संप्रभुता, नागरिक बुनियादी ढांचे और राजनयिक मिशनों पर किए जा रहे हमले अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2817 (2026) का खुला उल्लंघन हैं।
जेद्दा में क्षेत्रीय एकजुटता: एमबीएस और अल-सिसी की आपात बैठक
ईरान के बढ़ते खतरों के बीच, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी के बीच जेद्दा में एक उच्चस्तरीय आपातकालीन बैठक हुई।
- सुरक्षा कवच पर चर्चा: दोनों नेताओं ने ईरान द्वारा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों और उनके महत्वपूर्ण आर्थिक हितों को निशाना बनाए जाने पर गहरी चिंता जताई।
- मिस्र का साथ: राष्ट्रपति अल-सिसी ने दोटूक शब्दों में कहा कि सऊदी अरब की सुरक्षा और संप्रभुता के खिलाफ किसी भी खतरे की स्थिति में काहिरा (Cairo) रियाद के साथ मजबूती से खड़ा है।
- आत्मरक्षा का अधिकार: सऊदी अरब ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 का हवाला देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए ‘किसी भी सीमा तक’ जाने और आवश्यक सैन्य उपाय करने के लिए तैयार है।
युद्ध का नया मोर्चा: हिंद महासागर से लाल सागर तक तनाव
ईरान द्वारा इजरायल के डिमोना परमाणु केंद्र पर हमले और अमेरिकी-ब्रिटिश ठिकानों को निशाना बनाने के बाद अब सऊदी अरब का यह रुख युद्ध को एक नई दिशा दे रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के प्रॉक्सी समूहों और सीधे ईरानी मिसाइल हमलों ने सऊदी के तेल प्रतिष्ठानों के पास फिर से हलचल तेज कर दी है।
सऊदी अरब ने चेतावनी दी है कि ईरान की इन ‘दुस्साहसिक’ कार्रवाइयों का असर न केवल संबंधों पर पड़ेगा, बल्कि यह पूरे क्षेत्र में एक ऐसी आग लगा सकता है जिसे बुझाना नामुमकिन होगा।
CIA और मोसाद की विफलता या ईरान की नई रणनीति?
जहाँ एक ओर इजरायल और अमेरिका ईरान के भीतर अपने ऑपरेशन फेल होने से बैकफुट पर हैं, वहीं ईरान द्वारा पड़ोसी अरब देशों को उकसाने की नीति ने वाशिंगटन की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ का इस्तेमाल कर इजरायल के साथ-साथ उन सभी देशों को युद्ध में खींचना चाहता है जो अमेरिका के सहयोगी रहे हैं।
हालाँकि, सऊदी अरब ने अब तक इस युद्ध में सीधे उतरने से परहेज किया था, लेकिन ईरानी सैन्य अधिकारियों का निष्कासन यह संकेत है कि रियाद का धैर्य अब जवाब दे चुका है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संकट के बादल
अमेरिका द्वारा ईरानी तेल पर प्रतिबंधों में ढील देने की खबरों के बीच सऊदी अरब का यह कड़ा रुख कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में एक बार फिर आग लगा सकता है। यदि लाल सागर और फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ता है, तो दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है।
जी7 (G7) देशों की ‘बिना शर्त युद्धविराम’ की अपील अब और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच सीधा टकराव शुरू होता है, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ‘ब्लैक होल’ साबित होगा।
क्या होगा अगला कदम?
आने वाले 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण हैं। क्या ईरान इन निष्कासनों का जवाब तेहरान में सऊदी राजनयिकों को निकाल कर देगा? या फिर खाड़ी के पानी में मिसाइलों की गूँज और तेज होगी?
जेद्दा में हुई बैठक के बाद यह साफ है कि अरब जगत अब ईरान के ‘विस्तारवादी’ और ‘आक्रामक’ रवैये के खिलाफ एक मोर्चा बनाने की तैयारी में है। सऊदी क्राउन प्रिंस ने संकेत दिया है कि क्षेत्र की स्थिरता से समझौता नहीं किया जाएगा, चाहे इसके लिए युद्ध के मैदान में कोई भी फैसला लेना पड़े।

